891 एशियाई शेर और उनका सिमटता भूगोल

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भारत में संरक्षण की सफलता और छत्तीसगढ़ का अनुत्तरित सवाल

विश्व शेर दिवस पर ऐतिहासिक वितरण, वर्तमान स्थिति और संरक्षण रणनीति की पड़ताल

रायपुर, 10 अगस्त 2026। वाय के न्यूज।

भारत में एशियाई शेरों की संख्या 2025 में बढ़कर 891 हो गई है। 2015 में इनकी संख्या 523 और 2020 में 674 थी। इस तरह 2015 से 2025 के बीच शेरों की संख्या में लगभग 70.4 प्रतिशत और 2020 से 2025 के बीच लगभग 32.2 प्रतिशत वृद्धि हुई है। यह आंकड़ा एशियाई शेरों के संरक्षण कार्यक्रमों की दीर्घकालिक सफलता को दर्शाता है।

लेकिन वर्तमान संख्या को समझने के लिए शेर के ऐतिहासिक वितरण और पिछले दो-तीन शताब्दियों में उसके भूगोल में आए बदलाव को देखना जरूरी है।

Dipadih shiv Mandir

भारत में कभी व्यापक था एशियाई शेरों का वितरण

गुजरात वन विभाग के अनुसार एशियाई शेरों का ऐतिहासिक वितरण भारतीय उपमहाद्वीप में वर्तमान गुजरात से कहीं अधिक व्यापक था। उत्तर और पश्चिम भारत के बड़े हिस्सों से लेकर उत्तर भारत तथा पूर्व में बिहार तक इनके पाए जाने के प्रमाण मिलते हैं। विभाग के ऐतिहासिक विवरण में नर्मदा नदी को शेरों की ऐतिहासिक दक्षिणी सीमा के रूप में भी उल्लेखित किया गया है।

वैज्ञानिक अध्ययनों में भी एशियाई शेरों के ऐतिहासिक क्षेत्र के तेजी से सिकुड़ने का उल्लेख मिलता है। 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान शिकार, आवास का क्षरण और मानव गतिविधियों के विस्तार ने इस प्रजाति के वितरण को लगातार सीमित किया।

मध्य भारत के पुराने प्राकृतिक इतिहास और औपनिवेशिक अभिलेखों में शेरों की मौजूदगी के प्रमाण मिलते हैं। दमोह, सागर और रीवा क्षेत्र से संबंधित ऐतिहासिक विवरण इस व्यापक वितरण की पुष्टि करते हैं।

हालांकि पुराने स्रोतों में दर्ज प्रत्येक स्थान को वर्तमान राज्य की सीमा के आधार पर सीधे नहीं जोड़ा जा सकता। तत्कालीन प्रशासनिक सीमाएं आज की सीमाओं से अलग थीं और कई स्रोत केवल व्यापक भौगोलिक क्षेत्र का उल्लेख करते हैं।

गिर तक कैसे पहुंचा शेर

19वीं शताब्दी के अंत तक एशियाई शेर अपने अधिकांश ऐतिहासिक भारतीय क्षेत्र से समाप्त हो चुके थे। गुजरात का गिर क्षेत्र उनकी अंतिम प्रमुख प्राकृतिक आबादी का आश्रय बन गया।

गुजरात वन विभाग के अनुसार जूनागढ़ के नवाब द्वारा शेरों के शिकार पर नियंत्रण और बाद में संरक्षण व्यवस्था मजबूत किए जाने से गिर की आबादी को बचाने में मदद मिली। 1911 से शेरों के शिकार पर कठोर नियंत्रण का उल्लेख सरकारी इतिहास में मिलता है।

इसके बाद गिर क्षेत्र में संरक्षित क्षेत्र की व्यवस्था विकसित हुई। 1965 में गिर को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया और 1975 में इसके कोर क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया।

इन संरक्षण उपायों के बाद आबादी में लगातार वृद्धि दर्ज हुई।

177 से 891 तक

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1968 में गिर क्षेत्र में शेरों की संख्या 177 थी। 2015 में यह संख्या 523, 2020 में 674 और 2025 में 891 हो गई।

वर्षशेरों की संख्या
1968177
2010411
2015523
2020674
2025891

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि पिछले पांच दशकों में एशियाई शेरों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

हालांकि केवल संख्या बढ़ना संरक्षण की पूरी तस्वीर नहीं है। शेरों का सुरक्षित आवास, प्राकृतिक शिकार-आधार, आवागमन के कॉरिडोर, रोग नियंत्रण और मानव-वन्यजीव संघर्ष का प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

Dipadih in Balrampur

गिर से बाहर बढ़ा शेरों का क्षेत्र

शेरों की संख्या बढ़ने के साथ उनका वितरण भी गिर राष्ट्रीय उद्यान की सीमाओं से बाहर विस्तारित हुआ है। सरकारी दस्तावेजों में Greater Gir Landscape में शेरों की मौजूदगी का उल्लेख है।

केंद्र सरकार के अनुसार शेर अब संरक्षित वन क्षेत्रों के साथ-साथ नदी कॉरिडोर और कुछ राजस्व भूमि वाले क्षेत्रों में भी पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों के बीच सुरक्षित आवाजाही बनाए रखने के लिए कॉरिडोर प्रबंधन, घासभूमि सुधार और शिकार-आधार बढ़ाने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।

इसका अर्थ यह है कि वर्तमान संरक्षण रणनीति केवल गिर राष्ट्रीय उद्यान की सीमा के भीतर शेरों को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है।

891 के बाद अगली चुनौती

एशियाई शेरों की मौजूदा आबादी गुजरात के Greater Gir Landscape से जुड़ी हुई है। इसलिए संरक्षण विशेषज्ञों के सामने आबादी के लिए अतिरिक्त सुरक्षित आवास विकसित करने और किसी एक बड़े भौगोलिक परिदृश्य पर निर्भरता कम करने की चुनौती है।

यह चिंता केवल सैद्धांतिक नहीं है। एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में किसी प्रजाति की बड़ी आबादी होने पर संक्रामक बीमारी, प्राकृतिक आपदा या किसी बड़े पर्यावरणीय बदलाव का प्रभाव व्यापक हो सकता है।

इसी कारण Project Lion में आवास संरक्षण, रोग निगरानी, पशु चिकित्सा सुविधाओं, समुदाय की भागीदारी और नए आवासों के विकास को शामिल किया गया है।

Barda को दूसरे आवास के रूप में विकसित किया जा रहा

गुजरात का Barda Wildlife Sanctuary शेरों के लिए दूसरे महत्वपूर्ण आवास के रूप में विकसित किया गया है। केंद्र सरकार ने 2026 में बताया है कि Barda को शेरों के लिए दूसरा घर बनाने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए गए हैं।

इस रणनीति का उद्देश्य केवल शेरों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करना नहीं है। शेरों की प्राकृतिक आवाजाही, नए आवासों में उनका विस्तार और विभिन्न उप-आबादियों के बीच संपर्क बनाए रखना भी इसका हिस्सा है।

अब छत्तीसगढ़ का प्रश्न

भारत में शेरों के ऐतिहासिक वितरण की चर्चा करते समय छत्तीसगढ़ का प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है।

मध्य भारत के वर्तमान मध्य प्रदेश क्षेत्र में शेरों के ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं। पूर्व में पलामू तक शेरों के पाए जाने के पुराने उल्लेख भी मिलते हैं। दूसरी ओर गुजरात वन विभाग नर्मदा को शेरों की ऐतिहासिक दक्षिणी सीमा के रूप में बताता है।

लेकिन इन तथ्यों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वर्तमान छत्तीसगढ़ में भी जंगली शेर निश्चित रूप से पाए जाते थे।

छत्तीसगढ़ की वर्तमान भौगोलिक सीमा के भीतर जंगली एशियाई शेर की उपस्थिति का कोई ऐसा प्राथमिक और स्थान-विशिष्ट प्रमाण अभी सामने नहीं आया है, जिसे निर्णायक माना जा सके।

यही इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक निष्कर्ष है।

पुरातत्व में सिंह, लेकिन क्या वह जंगली शेर का प्रमाण है?

छत्तीसगढ़ में सिंह की आकृतियां और सिंह से जुड़े सांस्कृतिक प्रतीक मिलते हैं।

बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के तुरतुरिया में 8वीं–9वीं शताब्दी से संबंधित पुरातात्विक अवशेषों में एक शिल्प का उल्लेख मिलता है जिसमें तलवारधारी पुरुष और शेर से संबंधित आकृति दिखाई देती है। पुराने पर्यटन विवरणों में इसे शेर के शिकार के दृश्य के रूप में वर्णित किया गया है।

लेकिन किसी मूर्ति या शिल्प में शेर का चित्रण उस क्षेत्र में वास्तविक समय में जंगली शेर की मौजूदगी का प्रमाण नहीं होता।

भारतीय कला और धार्मिक परंपरा में सिंह का प्रयोग व्यापक रहा है। इसलिए तुरतुरिया का शिल्प सांस्कृतिक/कलात्मक प्रमाण है, वन्यजीव वितरण का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं।

इसी तरह सिरपुर, मल्हार और बस्तर क्षेत्र में सिंह से संबंधित कला और प्रतीक मिलना भी अपने आप में जंगली शेरों की मौजूदगी सिद्ध नहीं करता।

इतिहास की खोज अभी पूरी नहीं हुई है

छत्तीसगढ़ में शेरों की ऐतिहासिक मौजूदगी के प्रश्न को निर्णायक रूप से हल करने के लिए केवल आधुनिक वन्यजीव साहित्य पर्याप्त नहीं होगा।

इसके लिए तत्कालीन रियासतों और प्रशासनिक क्षेत्रों के पुराने दस्तावेजों की जांच आवश्यक है। विशेष रूप से—

  • बस्तर राज्य के शिकार और प्रशासनिक अभिलेख,
  • कांकेर रियासत के रिकॉर्ड,
  • रायगढ़ राज्य के राजकीय शिकार विवरण,
  • सरगुजा और कोरिया के प्रशासनिक दस्तावेज,
  • जशपुर तथा आसपास की रियासतों की शिकार डायरी,
  • Central Provinces के पुराने District Gazetteers,
  • वन विभाग की शुरुआती रिपोर्ट और
  • औपनिवेशिक काल के game records

महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

यदि इन दस्तावेजों में किसी निश्चित स्थान पर “lion” के देखे जाने या शिकार का उल्लेख मिलता है और उसकी पहचान अन्य बड़े मांसाहारी जीवों से स्पष्ट रूप से अलग की जा सकती है, तो छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक शेर-वितरण पर नई जानकारी सामने आ सकती है।

संरक्षण की उपलब्धि और भविष्य की चुनौती

2025 में 891 एशियाई शेरों का आंकड़ा भारत के संरक्षण प्रयासों की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन संरक्षण का लक्ष्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं है।

आगे की रणनीति में तीन बातें महत्वपूर्ण रहेंगी—सुरक्षित और पर्याप्त आवास, आबादी के बीच सुरक्षित संपर्क तथा किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना।

भारत ने एशियाई शेर को विलुप्त होने से बचाने में सफलता हासिल की है। अब चुनौती यह है कि बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त सुरक्षित भू-दृश्य उपलब्ध रहे और मानव गतिविधियों के विस्तार के बीच शेरों के प्राकृतिक आवागमन के क्षेत्र सुरक्षित रहें।

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में फिलहाल उपलब्ध प्रमाण इतना ही कहते हैं कि राज्य का भूगोल ऐतिहासिक मध्य भारतीय शेर-क्षेत्रों के निकट था, लेकिन वर्तमान छत्तीसगढ़ में जंगली एशियाई शेरों के प्राकृतिक आवास की पुष्टि करने वाला निर्णायक प्राथमिक प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है।

इसलिए यह प्रश्न फिलहाल निष्कर्ष नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक शोध का विषय है।

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