हनुमान के आगे छूटा टेक्नोलॉजी का पसीना

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क्रेन और भारी मशीनें भी नहीं हिला सकीं 8 फीट की प्रतिमा, अब IIT इंदौर की टीम करेगी वैज्ञानिक जांच

उज्जैन, 9 सितंबर, वाय के न्यूज।

सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के बीच उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाए जा रहे एक मंदिर की आठ फीट ऊंची खड़े हनुमान की प्रतिमा ने प्रशासन और इंजीनियरों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। मंदिर का ढांचा हट चुका है, लेकिन प्रतिमा को कई प्रयासों के बावजूद उसके स्थान से हिलाया नहीं जा सका। अब इसके पीछे की तकनीकी वजह जानने के लिए IIT इंदौर के विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है।

मामला कंठाल चौराहे से छत्री चौक की ओर जाने वाले मार्ग का है। सिंहस्थ-2028 और महाकाल की सवारी के मद्देनजर इस मार्ग के चौड़ीकरण का काम चल रहा है। इसी की जद में सतीगेट क्षेत्र का खड़े हनुमान मंदिर आया है। प्रशासन प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए बिना दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करना चाहता था।

क्रेन, मशीनें और तकनीक सब बेअसर

प्रतिमा को हटाने के लिए क्रेन और दूसरी भारी मशीनों की मदद ली गई। कई दिनों तक प्रयास किए गए, लेकिन प्रतिमा अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। अलग-अलग रिपोर्टों में प्रयासों की संख्या अलग-अलग बताई गई है, इसलिए फिलहाल निश्चित संख्या के बजाय इतना स्पष्ट है कि कई प्रयास विफल रहे हैं।

प्रतिमा को नुकसान पहुंचने की आशंका को देखते हुए अब जल्दबाजी में और बल लगाने के बजाय उसकी संरचना और जमीन से जुड़ाव की तकनीकी जांच का निर्णय लिया गया है। IIT इंदौर की टीम मौके पर पहुंच चुकी है और वैज्ञानिक तरीके से यह समझने की कोशिश करेगी कि प्रतिमा किस तरह स्थापित है और उसे सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित किया जा सकता है या नहीं।

आस्था में चमत्कार, विशेषज्ञों के सामने तकनीकी सवाल

प्रतिमा के नहीं हिलने की खबर फैलते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौके पर पहुंचने लगे हैं। कई भक्त इसे हनुमान जी का संकेत और चमत्कार मान रहे हैं। विरोध के बीच मंगलवार को हनुमान चालीसा और भजन-कीर्तन भी हुए। बुधवार को पुलिसकर्मियों के बैंड-बाजे के साथ वहां पहुंचने की खबर भी सामने आई है।

हालांकि प्रतिमा के न हिलने को चमत्कार मानना धार्मिक आस्था का विषय है। इसकी वास्तविक तकनीकी वजह वैज्ञानिक जांच के बाद ही सामने आ सकेगी।

प्रतिमा कितनी पुरानी, इस पर भी सवाल

मंदिर की उम्र को लेकर मीडिया रिपोर्टों में करीब 160 से 170 वर्ष का उल्लेख है। वहीं विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमन सोलंकी के हवाले से कुछ रिपोर्टों में प्रतिमा के मालवा क्षेत्र की बेसाल्ट शिला परंपरा से जुड़े होने और इसे लगभग एक हजार वर्ष पुराना होने की संभावना जताई गई है। यह अभी विशेषज्ञ का अनुमान है, प्रमाणित पुरातात्विक निष्कर्ष नहीं।

अब तकनीकी और पुरातात्विक जांच से दो अहम सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद है—प्रतिमा जमीन के भीतर किस संरचना से जुड़ी है और इसे बिना नुकसान पहुंचाए हटाना संभव है या नहीं। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही प्रशासन आगे की कार्रवाई तय करेगा।

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