42 मरीजों के रक्त नमूनों पर हुआ नया विश्लेषण; कुछ मापों में 3 से 4 साल कम दिखी अनुमानित जैविक उम्र, लेकिन वैज्ञानिकों ने कहा- अभी उम्र घटने का दावा जल्दबाजी
नई दिल्ली, 8 सितंबर, वाय के न्यूज़। क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से विकसित कोई दवा इंसान की जैविक उम्र को पीछे कर सकती है? इस सवाल को लेकर सामने आए एक नए शोध ने उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन वैज्ञानिकों ने अभी इसे उम्र घटाने की दवा मानने से सावधानी बरतने को कहा है। Nature Biotechnology में 7 सितंबर 2026 को प्रकाशित अध्ययन में AI की मदद से विकसित दवा rentosertib लेने वाले मरीजों में छह अलग-अलग प्रोटिओमिक एजिंग क्लॉक्स ने कम अनुमानित जैविक उम्र का संकेत दिया।
यह अध्ययन नया क्लिनिकल ट्रायल नहीं, बल्कि पहले हो चुके Phase 2a ट्रायल के रक्त नमूनों का नया विश्लेषण है। मूल ट्रायल में इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस (IPF) से पीड़ित 71 मरीज शामिल थे। इनमें से 42 मरीजों ने इस प्रोटिओमिक विश्लेषण के लिए सहमति दी। उनके उपचार से पहले और उपचार के दूसरे, चौथे तथा 12वें सप्ताह के रक्त नमूनों का विश्लेषण किया गया।
छह अलग-अलग ‘एजिंग क्लॉक’ ने दिया एक जैसा संकेत
शोधकर्ताओं ने रक्त में मौजूद प्रोटीनों के पैटर्न का छह अलग-अलग प्रोटिओमिक एजिंग क्लॉक्स से विश्लेषण किया। ये मॉडल रक्त में प्रोटीनों के स्तर के आधार पर व्यक्ति की अनुमानित जैविक उम्र का आकलन करते हैं।
अध्ययन की खास बात यह रही कि सभी छह मॉडलों ने इलाज पाने वाले समूहों में कम अनुमानित जैविक उम्र का संकेत दिया। शोधकर्ताओं के अनुसार अलग-अलग मॉडल और अलग-अलग पद्धतियों के बावजूद परिणामों में यह समानता महत्वपूर्ण है।
सबसे स्पष्ट प्रभाव 30 मिलीग्राम दिन में दो बार वाले समूह में चौथे सप्ताह के आसपास देखा गया। कुछ क्लॉक्स में मरीजों की अनुमानित जैविक उम्र लगभग 2.7 से 3.5 वर्ष कम दिखाई दी। कुछ अन्य विश्लेषणों में कमी इससे अधिक भी रही, लेकिन सभी छह क्लॉक्स में प्रभाव की मात्रा एक जैसी नहीं थी और 12 सप्ताह तक भी समान रूप से कायम नहीं रही।
दवा असल में किस बीमारी के लिए है?
Rentosertib को उम्र घटाने के लिए नहीं, बल्कि इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस के इलाज के लिए विकसित किया गया है। यह TNIK नामक प्रोटीन को निशाना बनाने वाली दवा है। इसके लक्ष्य की पहचान और दवा के विकास में generative AI का इस्तेमाल किया गया था। दवा अब IPF के लिए आगे के क्लिनिकल विकास के चरण में है।
नए अध्ययन का उद्देश्य यह देखना था कि किसी बीमारी के इलाज के लिए चल रहे क्लिनिकल ट्रायल में ऐसे जैविक संकेतकों को भी शामिल किया जा सकता है या नहीं, जिनसे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया पर संभावित प्रभाव का आकलन हो सके। शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में एक ही क्लिनिकल ट्रायल से बीमारी के इलाज और aging से जुड़े प्रभावों दोनों का अध्ययन किया जा सकता है।
‘जैविक उम्र कम’ का मतलब व्यक्ति का छोटा होना नहीं
शोध की सबसे महत्वपूर्ण सीमा यही है। एजिंग क्लॉक में तीन या चार साल कम जैविक उम्र दिखने का अर्थ यह नहीं है कि मरीज वास्तव में तीन-चार साल छोटा हो गया या उसकी जीवन प्रत्याशा उतने साल बढ़ गई।
शोधकर्ताओं ने खुद चेताया है कि केवल प्रोटिओमिक एजिंग क्लॉक्स से यह तय नहीं किया जा सकता कि देखे गए बदलाव वास्तविक aging प्रक्रिया के धीमे होने के कारण हुए या फेफड़ों की बीमारी पर दवा के प्रभाव के कारण। यानी अभी यह स्पष्ट नहीं है कि दवा ने aging को धीमा किया या बीमारी के कारण बदले हुए प्रोटीन पैटर्न को सामान्य किया।
स्वस्थ लोगों में परीक्षण अभी बाकी
अध्ययन में शामिल सभी मरीज IPF से पीड़ित थे। इसलिए स्वस्थ लोगों में rentosertib का ऐसा ही प्रभाव होगा या नहीं, यह अभी पता नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके लिए बड़े और लंबे क्लिनिकल ट्रायल की जरूरत होगी, जिसमें स्वस्थ लोगों अथवा अन्य आयु-संबंधी स्थितियों में भी इसके प्रभाव का परीक्षण किया जाए।
इस लिहाज से नया शोध उम्र घटाने वाली दवा की खोज की घोषणा नहीं, बल्कि AI-आधारित दवा विकास और जैविक उम्र मापने वाली तकनीक के बीच संभावित नए रास्ते का शुरुआती प्रमाण है। छह अलग-अलग एजिंग क्लॉक्स में एक जैसा संकेत मिलना शोध की सबसे दिलचस्प बात है, जबकि छोटे नमूने और बीमारी से जुड़े प्रभाव को अलग न कर पाना इसकी सबसे बड़ी सीमा है।
