नई दिल्ली, 4 सितंबर, वाय के न्यूज।
भारत अब सौर और पवन ऊर्जा के साथ धरती के भीतर मौजूद गर्मी को भी ऊर्जा के बड़े स्रोत के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देश में करीब 10,600 मेगावाट की सैद्धांतिक भूतापीय ऊर्जा क्षमता आंकी गई है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने देशभर में 381 गर्म जलस्रोतों की मैपिंग की है और 10 भू-तापीय प्रांतों की पहचान की है।
इनमें महानदी भू-तापीय प्रांत भी शामिल है, जिससे छत्तीसगढ़ के लिए भी भूतापीय ऊर्जा के क्षेत्र में संभावनाओं का रास्ता खुलता है।
भूतापीय ऊर्जा पृथ्वी की सतह के नीचे मौजूद प्राकृतिक गर्मी से प्राप्त होती है। गर्म पानी और भाप को गहरे कुओं के जरिए सतह पर लाकर टरबाइन चलाकर बिजली पैदा की जा सकती है। इसका बड़ा फायदा यह है कि सौर और पवन ऊर्जा की तरह यह मौसम पर निर्भर नहीं है और उपयुक्त संसाधन उपलब्ध होने पर 24 घंटे ऊर्जा उपलब्ध कराने वाला स्रोत बन सकता है।
लद्दाख में देश के पहले दो भूतापीय कुएं
भारत ने इस क्षेत्र में जुलाई 2026 में महत्वपूर्ण कदम उठाया। ओएनजीसी ऊर्जा केंद्र ने लद्दाख की पूगा घाटी में देश के पहले दो भूतापीय कुओं को चालू किया। समुद्र तल से 14,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित पूगा घाटी अपने गर्म जलस्रोतों और भू-तापीय संसाधनों के लिए जानी जाती है।
लगभग 1,000 मीटर गहराई वाले इन कुओं से भू-तापीय जलाशय की क्षमता का आकलन किया जा रहा है। इन्हें आगे 1 मेगावाट की प्रदर्शन-आधारित भूतापीय ऊर्जा परियोजना की नींव के रूप में देखा जा रहा है।
सितंबर 2025 में बनी राष्ट्रीय नीति
भारत सरकार ने सितंबर 2025 में भूतापीय ऊर्जा पर राष्ट्रीय नीति अधिसूचित की थी। इसका उद्देश्य देश में उपलब्ध भू-तापीय संसाधनों की व्यवस्थित खोज, मूल्यांकन और विकास के लिए स्पष्ट ढांचा तैयार करना है।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) इस नीति के क्रियान्वयन के लिए नोडल मंत्रालय है। नीति में अनुसंधान, ड्रिलिंग, जलाशय प्रबंधन, प्रत्यक्ष ताप उपयोग, हीटिंग-कूलिंग और ग्राउंड-सोर्स हीट पंप जैसी तकनीकों को बढ़ावा देने का प्रावधान है।
छत्तीसगढ़ भी भू-तापीय मानचित्र पर
भारत के जिन 10 भू-तापीय प्रांतों की पहचान की गई है, उनमें महानदी और गोदावरी जैसे प्रांत शामिल हैं। इसके अलावा हिमालयी, नागा-लुसाई, अंडमान-निकोबार, सोन-नर्मदा-तापी, पश्चिमी तट, कैम्बे ग्रैबेन, अरावली और दक्षिण भारतीय क्रेटनिक क्षेत्र भी सूची में हैं।
महानदी भू-तापीय प्रांत का शामिल होना छत्तीसगढ़ के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य में तत्काल बड़े पैमाने पर भू-तापीय बिजली परियोजना शुरू होने जा रही है। वास्तविक विद्युत उत्पादन की संभावना तय करने के लिए स्थानीय स्तर पर भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, तापमान, जलाशय की गहराई, जल प्रवाह और ड्रिलिंग संबंधी विस्तृत अध्ययन जरूरी होगा।
बंद तेल-गैस कुओं से भी ऊर्जा की संभावना
भूतापीय नीति का एक दिलचस्प पहलू पुराने और अनुत्पादक तेल-गैस कुओं के संभावित पुन: उपयोग से जुड़ा है। तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता पाए जाने पर ऐसे कुओं को भू-तापीय परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
इससे पुराने कुओं, ड्रिलिंग विशेषज्ञता, उपलब्ध भूवैज्ञानिक आंकड़ों और मौजूदा बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ती है।
गुजरात से तेल-गैस कुओं के पुन: उपयोग का परीक्षण
गुजरात के अंकलेश्वर में अनुत्पादक तेल और गैस कुओं को रेट्रोफिट कर बिजली उत्पादन की संभावना जांचने वाली पायलट परियोजना पर काम हुआ है।
गांधीनगर में सौर और भूतापीय ऊर्जा के एकीकरण पर आधारित प्रदर्शन परियोजना में तीन भूतापीय कुएं खोदे गए हैं। यहां 70 से 80 डिग्री सेल्सियस तापमान वाला भू-तापीय द्रव प्राप्त हो रहा है और परियोजना में 50 से 90 किलोवाट विद्युत उत्पादन क्षमता का प्रदर्शन किया गया है।
अरुणाचल प्रदेश के तवांग में पांच भू-तापीय स्थलों पर संसाधनों का आकलन किया जा रहा है, जबकि तेलंगाना में भू-तापीय शीतलन प्रणाली पर शोध चल रहा है।
सिर्फ बिजली नहीं, खेती और हीटिंग में भी उपयोग
भूतापीय ऊर्जा का इस्तेमाल केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। जमीन के भीतर की गर्मी का सीधे उपयोग हीटिंग, कूलिंग, कृषि, जलीय कृषि और अन्य तापीय जरूरतों में किया जा सकता है।
यही कारण है कि कम तापमान वाले भू-तापीय संसाधन भी उपयोगी हो सकते हैं, भले ही उनसे बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन संभव न हो।
अभी व्यावसायिक बिजली उत्पादन शुरू नहीं
सरकार के अनुसार भारत में भूतापीय क्षेत्र अभी शुरुआती और प्रदर्शन चरण में है। देश में व्यावसायिक स्तर पर भूतापीय बिजली उत्पादन अभी शुरू नहीं हुआ है। हालांकि संसाधनों की मैपिंग, अनुसंधान, कुओं की ड्रिलिंग और पायलट परियोजनाओं के जरिए इसके लिए आधार तैयार किया जा रहा है।
भारत की राष्ट्रीय नीति, अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय सहयोग इस क्षेत्र में तकनीक तथा निवेश के अवसर बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर भी भूतापीय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ रहा है। 2025 के अंत तक दुनिया की स्थापित भूतापीय विद्युत क्षमता करीब 15.67 गीगावाट थी। इंडोनेशिया, अमेरिका, फिलीपींस, तुर्किए और न्यूजीलैंड इस क्षेत्र के प्रमुख देशों में हैं।
भारत के लिए चुनौती अब संसाधन खोजने से आगे बढ़कर उन्हें तकनीकी रूप से व्यवहार्य और आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी परियोजनाओं में बदलने की है। यदि यह संभव होता है तो भूतापीय ऊर्जा सौर और पवन ऊर्जा के बीच एक ऐसे स्थिर ऊर्जा स्रोत की भूमिका निभा सकती है, जो मौसम पर निर्भर नहीं होगा।
