30 फसलों पर 17 सौर प्रणालियों का परीक्षण, खोजा जा रहा खेती और बिजली का सही मेल

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कृषि-वोल्टेइक तकनीक में पैनल की ऊंचाई, दूरी और ट्रैकिंग सिस्टम का भी अध्ययन; एक ही जमीन पर फसल के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन की तैयारी

नई दिल्ली, 9 सितंबर, वाय के न्यूज। खेती की जमीन पर सौर पैनल लगाने से फसल उत्पादन प्रभावित न हो और किसान को बिजली से भी आय मिले, इसके लिए भारत में 30 अलग-अलग फसलों पर 17 तरह की सौर प्रणालियों का परीक्षण किया जा रहा है। इन परीक्षणों के जरिए यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि किस फसल और क्षेत्र के लिए सौर पैनल की कितनी ऊंचाई, उनके बीच कितनी दूरी और किस तरह की ट्रैकिंग प्रणाली सबसे उपयुक्त होगी।

केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने बुधवार को नई दिल्ली में 7वें एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन-2026 के पूर्व समारोह में यह जानकारी दी। उन्होंने पुणे स्थित बीएआईएफ के ग्रामीण नवाचार केंद्र में चल रहे शोध का उदाहरण देते हुए कहा कि कृषि-वोल्टेइक तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए अलग-अलग फसलों, जलवायु और भौगोलिक क्षेत्रों के हिसाब से उपयुक्त मॉडल विकसित करना जरूरी है।

पैनल की ऊंचाई से ट्रैकिंग सिस्टम तक परीक्षण

शोध में केवल सौर पैनल और फसल को एक साथ लगाने पर ही ध्यान नहीं दिया जा रहा, बल्कि पैनल की ऊंचाई, उनके बीच की दूरी, ट्रैकिंग सिस्टम और व्यावसायिक मॉडल का भी परीक्षण किया जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐसा संयोजन तैयार करना है, जिसमें खेती के लिए पर्याप्त जगह और रोशनी बनी रहे तथा सौर ऊर्जा उत्पादन भी आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो।

जोशी ने कहा कि भारत जैसे देश में यह तकनीक खास महत्व रखती है, क्योंकि यहां 85 प्रतिशत से अधिक किसान लघु एवं सीमांत हैं और दो हेक्टेयर से कम भूमि पर खेती करते हैं। कृषि-वोल्टेइक मॉडल में किसान को खेती या सौर ऊर्जा में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं होगी। एक ही जमीन पर फसल और स्वच्छ ऊर्जा दोनों का उत्पादन किया जा सकता है।

ट्रैक्टर और हार्वेस्टर के लिए भी डिजाइन पर जोर

केंद्रीय मंत्री ने उद्योग और नवप्रवर्तकों से ऐसी सौर संरचनाएं विकसित करने को कहा, जिनके नीचे ट्रैक्टर और हार्वेस्टर आसानी से चल सकें। स्थानीय मौसम की परिस्थितियों के अनुरूप संरचनाओं के निर्माण और सौर प्रणालियों की लागत कम करने के लिए नई सामग्री तथा माउंटिंग सिस्टम विकसित करने पर भी जोर दिया गया।

उन्होंने कहा कि कृषि-वोल्टेइक तकनीक किसानों के लिए आय का अतिरिक्त स्रोत बन सकती है। किसान फसल बेचने के साथ डिस्कॉम को सौर बिजली बेचकर और सिंचाई में डीजल की बचत से भी लाभ हासिल कर सकता है।

पीएम-कुसुम के अगले चरण में अलग घटक

जोशी ने बताया कि पीएम-कुसुम के अगले चरण में कृषि-वोल्टेइक ऊर्जा के लिए समर्पित घटक लाने की योजना है। इसमें छोटे और सीमांत किसानों, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और पंचायतों पर ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि भूमि का स्वामित्व किसान के पास ही रहेगा।

7वां एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन 2026, 21 से 23 अक्टूबर तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होगा। सम्मेलन में कृषि और सौर ऊर्जा के एकीकरण से जुड़े किसान, शोधकर्ता, नीति निर्माता, उद्योगपति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे।

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