प्रकृति, कृषि और आदिवासी ज्ञान परंपरा को जोड़ता छत्तीसगढ़ का पहला लोकपर्व
आलेख : आकांक्षा तिवारी “वर्षा “
छत्तीसगढ़ में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते। वे मिट्टी से निकलते हैं, खेतों में सांस लेते हैं और जंगलों की हरियाली के साथ जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ का पहला लोकपर्व माने जाने वाला हरेली तिहार महज उत्सव नहीं, बल्कि मनुष्य, प्रकृति, पशुधन, कृषि और लोकविश्वास के बीच संबंधों का जीवंत दस्तावेज है।
हरेली का शाब्दिक संबंध हरियाली से है। सावन की अमावस्या के आसपास जब खेतों में धान के पौधे अपनी हरित आभा बिखेरने लगते हैं, तब किसान उस हरियाली के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। खेतों में बोआई-रोपाई का महत्वपूर्ण चरण पूरा हो चुका होता है और कृषि औजारों को विश्राम देकर उनकी पूजा की जाती है। छत्तीसगढ़ शासन भी हरेली को कृषि और मानसून से जुड़ा प्रमुख लोकपर्व बताते हुए कृषि यंत्रों की पूजा और पशुधन के सम्मान को इसकी प्रमुख परंपराओं में गिनाता है।
लेकिन हरेली की कहानी हल, बैल और खेत तक सीमित नहीं है। इसके भीतर प्रकृति के साथ जीने वाली उस लोकसंस्कृति की स्मृतियां भी हैं, जिसने जंगल को केवल संसाधन नहीं, बल्कि औषधालय, देवस्थान और जीवनदाता माना।
जब औजार भी बन जाते हैं पूज्य
हरेली के दिन किसान अपने हल, नांगर, गैंती, कुदाली, फावड़ा, हंसिया और खेती में इस्तेमाल होने वाले दूसरे उपकरणों को साफ करते हैं और उनकी पूजा करते हैं। यह कर्मकांड देखने में सरल है, लेकिन इसके पीछे श्रम के प्रति सम्मान की गहरी भावना छिपी है।
जिस औजार ने धरती को चीरकर बीज के लिए जगह बनाई, उसी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना दरअसल किसान के श्रम और धरती दोनों को प्रणाम करना है।
गाय-बैल और दूसरे कृषि-पशुओं को भी नहलाकर, सजाकर और पारंपरिक रूप से भोजन अथवा औषधीय मिश्रण देकर सम्मानित किया जाता है। कई क्षेत्रों में नीम की डालियां घरों के द्वार पर लगाई जाती हैं। लोकविश्वास में नीम और अन्य वनस्पतियां रोग, कीट और अनिष्ट से रक्षा करने वाली मानी जाती हैं।
यानी हरेली का संदेश बहुत सीधा है—धरती को पूजिए, श्रम को सम्मान दीजिए, पशुओं का ऋण स्वीकारिए और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलिए।
बैगा समाज में हरेली केवल पर्व नहीं, ज्ञान की पाठशाला
हरेली की सबसे अद्भुत परंपराओं में से एक छत्तीसगढ़ के बैगा समुदाय से जुड़ी है। बैगा परंपरा में वनस्पतियों और औषधीय ज्ञान का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा से होता रहा है।
हरेली के दिन बैगा समुदाय में शिष्यों को औषधीय वनस्पतियों, पेड़-पौधों और उनके गुणों का ज्ञान देना शुरू किया जाता है। यह शिक्षण परंपरा लगभग 15 दिनों तक चलती है और ऋषि पंचमी के दिन शिष्यों की परीक्षा ली जाती है। सफल शिष्य को बैगा यानी पारंपरिक उपचारक के रूप में काम करने योग्य माना जाता है।
यह परंपरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सावन का मौसम वनस्पतियों की वृद्धि का समय होता है। जंगल में औषधीय पौधे सहज उपलब्ध होते हैं। यानी प्रकृति स्वयं उस समय एक खुली पाठशाला बन जाती है और बैगा गुरु अपने शिष्य को उसी जीवित पाठशाला में पढ़ाता है।
हरेली से ऋषि पंचमी तक का यह काल इसलिए केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आदिवासी ज्ञान के संरक्षण और हस्तांतरण की अनूठी व्यवस्था भी है।
आज जब दुनिया औषधीय पौधों, पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक चिकित्सा के महत्व को नए सिरे से समझने की कोशिश कर रही है, तब बैगा समाज की यह परंपरा हमें एक महत्वपूर्ण सवाल देती है—क्या विकास के साथ हम अपने पारंपरिक ज्ञान को भी बचा पा रहे हैं?
हरेली इस सवाल को सामने रखने का अवसर है।
नीम, बेल, बहेड़ा, हर्रा, आंवला, शतावरी जैसी वनस्पतियों का उपयोग भारतीय लोक और आयुर्वेदिक परंपराओं में लंबे समय से होता आया है। बैगा जैसे समुदायों के पास जंगल और वनस्पतियों से जुड़ा स्थानीय अनुभवजन्य ज्ञान रहा है। इस ज्ञान को अंधविश्वास कहकर खारिज करना भी उचित नहीं और बिना वैज्ञानिक परीक्षण के हर लोकमान्यता को चिकित्सा-सत्य मान लेना भी उचित नहीं। जरूरत है लोकज्ञान के दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक अध्ययन की।
हरेली के साथ सूर्यग्रहण का संयोग
वर्ष 2026 की हरेली इसलिए विशेष चर्चा में है क्योंकि 12 अगस्त को सावन अमावस्या के दिन सूर्यग्रहण भी पड़ रहा है। यह 2026 का अंतिम पूर्ण सूर्यग्रहण है, हालांकि भारत में यह दिखाई नहीं देगा। इसलिए भारत में इसके कारण सामान्य सूतक मानने की बात भी लागू नहीं होती।फिर भी ज्योतिषीय और आध्यात्मिक दृष्टि से ग्रहण का समय भारतीय परंपरा में विशेष माना गया है। ग्रहण को आत्मचिंतन, जप, ध्यान और अंतर्मुखी साधना का अवसर मानने की परंपरा रही है।
यहां विज्ञान और अध्यात्म के बीच अंतर को समझना जरूरी है। सूर्यग्रहण एक खगोलीय घटना है; उसके आध्यात्मिक अर्थ सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हैं। वैज्ञानिक रूप से ग्रहण का कारण सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की स्थिति है, जबकि आध्यात्मिक परंपराएं इसे आत्मशुद्धि और साधना से जोड़ती हैं।
हरेली और सूर्यग्रहण का यह संयोग इसलिए प्रतीकात्मक रूप से भी रोचक है—एक ओर प्रकृति अपने हरित रूप में जीवन के विस्तार का संदेश देती है, दूसरी ओर सूर्यग्रहण क्षणिक रूप से प्रकाश के आवरण का दृश्य प्रस्तुत करता है।हरियाली और अंधकार के इस प्रतीकात्मक मेल में मनुष्य को अपने भीतर के प्रकाश को खोजने का अवसर दिखाई देता है।
लोक और अध्यात्म का मिलन
हरेली में मिट्टी की पूजा है, औजारों की पूजा है, पशुओं के प्रति कृतज्ञता है, नीम की हरियाली है, जंगल की औषधियां हैं और बैगा गुरु-शिष्य परंपरा है।
वहीं ग्रहण की आध्यात्मिक व्याख्या में मन को भीतर की ओर ले जाने, जप-ध्यान और आत्ममंथन की बात आती है।
दोनों को साथ रखकर देखें तो संदेश लगभग एक ही दिखाई देता है—प्रकृति से जुड़िए और अपने भीतर भी झांकिए।
शायद यही कारण है कि हमारे लोकपर्व केवल मनोरंजन के लिए नहीं बने। उन्होंने जीवन के जरूरी पाठों को उत्सव में बदल दिया। किसान को कृषि औजारों के प्रति कृतज्ञ होना सिखाया, पशु को परिवार का हिस्सा माना, पेड़-पौधों को उपयोग की वस्तु के बजाय जीवन का आधार समझा और ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तय की।
गेड़ी से लेकर गुरु-शिष्य परंपरा तक
हरेली की गेड़ी भी केवल बच्चों का खेल नहीं है। वर्षा ऋतु में बांस की गेड़ी पर चलने की परंपरा लोकजीवन का आकर्षक हिस्सा रही है। कुछ क्षेत्रों में इसे फसलों की वृद्धि और समृद्धि से जुड़े प्रतीकात्मक विश्वासों से भी जोड़ा जाता है।
एक तरफ बच्चे गेड़ी पर चढ़कर उत्सव मनाते हैं, दूसरी तरफ उसी पर्व पर बैगा गुरु अपने शिष्य को जंगल की औषधीय वनस्पतियों का ज्ञान देता है।
यही हरेली की खूबसूरती है—एक ही पर्व में खेल भी है, पूजा भी है, कृषि भी है, लोकचिकित्सा भी है और ज्ञान की परंपरा भी।
बचाना होगा हरेली का असली अर्थ
आज हरेली शहरों तक पहुंच चुकी है। सरकारी और सामाजिक आयोजनों के माध्यम से गेड़ी, कृषि औजारों की पूजा और पारंपरिक व्यंजनों को नई पहचान मिल रही है। यह अच्छी बात है, लेकिन पर्व को केवल मंच, प्रतियोगिता और औपचारिक आयोजन तक सीमित कर देना इसकी आत्मा को छोटा कर देगा।
हरेली की असली शक्ति उसके भीतर छिपे उस संदेश में है जो कहता है—
जंगल बचेंगे तो औषधियां बचेंगी।
खेती बचेगी तो अन्न बचेगा।
पशु बचेंगे तो कृषि की परंपरा बचेगी।
लोकज्ञान बचेगा तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहेंगी।और शायद इस बार सूर्यग्रहण के संयोग में हरेली हमें यही अतिरिक्त संदेश दे रही है—बाहरी प्रकाश कुछ क्षण के लिए ढक सकता है, लेकिन ज्ञान, प्रकृति और परंपरा का प्रकाश पीढ़ियों तक चलता है।
इसलिए हरेली को केवल ‘छत्तीसगढ़ का पहला तिहार’ कहकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं। यह छत्तीसगढ़ की उस जीवन-दृष्टि का उत्सव है, जिसमें धरती मां है, जंगल औषधालय है, पशु सहचर है, औजार श्रम के प्रतीक हैं और ज्ञान अगली पीढ़ी के लिए विरासत।
