107-110 दिन में तैयार होने वाली सीजी 1047 में आयरन, जिंक और 12% से अधिक प्रोटीन; चपाती और बिस्किट के लिए भी परीक्षण में बेहतर
रायपुर, 22 अगस्त। वाय के न्यूज। गेहूं की खेती में पानी की कमी से जूझने वाले किसानों के लिए बिलासपुर के कृषि वैज्ञानिकों ने एक नई संभावना तैयार की है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) के बिलासपुर स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र और मुंबई के भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के सहयोग से विकसित गेहूं की किस्म सीजी 1047 को अब ‘छत्तीसगढ़ ट्रॉम्बे कुमुद’ नाम से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।

इस किस्म की सबसे महत्वपूर्ण खासियत यह है कि इसे प्रायद्वीपीय क्षेत्रों की अधिसिंचित परिस्थितियों, यानी सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। परीक्षणों में दो से तीन सिंचाई वाली परिस्थितियों में इसकी उपज करीब 36.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। इसकी फसल अवधि करीब 107 से 110 दिन बताई गई है।
कम पानी में खेती पर जोर
कई इलाकों में गेहूं की खेती के दौरान किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त सिंचाई की होती है। सीजी 1047 इसी चुनौती को ध्यान में रखकर विकसित की गई किस्म है।
वैज्ञानिक परीक्षणों में सीमित सिंचाई के बावजूद इस किस्म ने अच्छी उत्पादन क्षमता दिखाई है। हालांकि अनुसंधान केंद्र की परीक्षण उपज को किसान के खेत की संभावित उपज का सीधा आंकड़ा नहीं माना जा सकता। वास्तविक उत्पादन मिट्टी, मौसम, बुवाई के समय, बीज, खाद और सिंचाई प्रबंधन सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।
107-110 दिन में फसल तैयार
सीजी 1047 की फसल अवधि करीब 107 से 110 दिन है। कम अवधि में तैयार होने वाली किस्म होने के कारण यह उन किसानों के लिए भी उपयोगी हो सकती है, जो गेहूं के बाद दूसरी फसल लेने की योजना बनाते हैं।
इस किस्म के विकास में केवल उत्पादन को ही लक्ष्य नहीं बनाया गया, बल्कि गेहूं के पोषण गुणों को भी महत्व दिया गया है।
आयरन-जिंक और प्रोटीन पर भी ध्यान
उपलब्ध शोध विवरण के अनुसार सीजी 1047 में आयरन 41.7 पीपीएम, जिंक 41.7 पीपीएम और प्रोटीन 12 प्रतिशत से अधिक पाया गया है। इन पोषण गुणों के कारण इसे बायोफोर्टिफाइड गेहूं की किस्म बताया जा रहा है।
यानी इस किस्म में वैज्ञानिकों ने किसान के लिए उपज के साथ गेहूं की पोषण गुणवत्ता को भी महत्वपूर्ण माना है।
रोटी से लेकर बिस्किट तक परीक्षण
नई किस्म के गेहूं की उपयोगिता का परीक्षण खाद्य गुणवत्ता के स्तर पर भी किया गया है। चपाती के परीक्षण में इसका चपाती मेकिंग स्कोर 8/10 दर्ज किया गया, जबकि बिस्किट के लिए इसका स्प्रेडिंग फैक्टर 8.7/10 रहा।
इससे यह संकेत मिलता है कि सीजी 1047 का गेहूं घरेलू उपयोग के साथ खाद्य प्रसंस्करण के लिए भी उपयुक्त पाया गया है।
करीब एक दशक के शोध का परिणाम
सीजी 1047 के विकास में गेहूं वैज्ञानिक डॉ. अजय प्रकाश अग्रवाल सहित बिलासपुर की गेहूं अनुसंधान टीम की भूमिका रही है। इस शोध में मुंबई के भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों का सहयोग भी मिला।
किस्म को अब राष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक पहचान मिली है। 18 से 20 अगस्त 2026 तक जयपुर के दुर्गापुरा स्थित राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान में आयोजित 65वीं अखिल भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान कार्यशाला में सीजी 1047 के विकास के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, बिलासपुर और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई को प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया।
इसी के साथ सीजी 1047 को ‘Chhattisgarh Trombay Kumud’ नाम से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

किसान के लिए अभी सबसे जरूरी सवाल
नई किस्म को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने के बाद किसानों की नजर अब इसके प्रमाणित बीज की उपलब्धता, बीज वितरण की शुरुआत, किन राज्यों या कृषि क्षेत्रों में इसकी अनुशंसा की गई है और इसकी व्यावसायिक खेती कब से शुरू होगी, इस पर रहेगी।
अर्थात फिलहाल यह वैज्ञानिक उपलब्धि है; किसान बड़े पैमाने पर इसकी खेती शुरू करने से पहले कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग की आधिकारिक सिफारिश और प्रमाणित बीज उपलब्धता की जानकारी जरूर लें।
सीजी 1047 एक नजर में
विशेषता| जानकारी
नई किस्म| सीजी 1047
नाम| छत्तीसगढ़ ट्रॉम्बे कुमुद
फसल अवधि| करीब 107-110 दिन
सिंचाई| 2-3 सिंचाई वाली अधिसिंचित परिस्थितियों के लिए
परीक्षण उपज| करीब 36.7 क्विंटल/हेक्टेयर
आयरन| 41.7 पीपीएम
जिंक| 41.7 पीपीएम
प्रोटीन| 12% से अधिक
चपाती मेकिंग स्कोर| 8/10
बिस्किट स्प्रेडिंग फैक्टर| 8.7/10
विकास में सहयोग| IGKV बिलासपुर और BARC मुंबई
