रायपुर, 22 अगस्त। वाय के न्यूज। नवा रायपुर के माना क्षेत्र के नकटी स्थित ब्लू वाटर में युवक आदिल खान के डूबने के बाद तीसरे-चौथे दिन भी तलाश जारी है। एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमें पानी के भीतर लगातार सर्च कर रही हैं, लेकिन अब तक कोई सुराग नहीं मिला है। गहराई और पानी के बेहद ठंडे होने से गोताखोरों के सामने चुनौती बढ़ गई है।
ब्लू वाटर मूलतः पुरानी पत्थर खदान है, जिसमें पानी भरने के बाद यह इलाका लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया। हादसे के दिन आदिल दोस्तों के साथ वहां पहुंचा था। तैरने और खदान को पार करने की कोशिश के दौरान वह पानी में डूब गया। इसके बाद शुरू हुआ रेस्क्यू ऑपरेशन अब सिर्फ एक युवक की तलाश तक सीमित नहीं रह गया है। इसने गहरे जलाशयों में सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल ब्लू वाटर की वास्तविक गहराई को लेकर है। स्थानीय स्तर पर 300 से 500 फीट तक की गहराई के दावे किए जा रहे हैं, जबकि रेस्क्यू टीम के सामने पानी की गहराई और नीचे बढ़ती ठंड बड़ी बाधा बनी हुई है। इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि अभी जरूरी है। इसलिए फिलहाल किसी एक गहराई को अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा।
एनडीआरएफ से जुड़े एक सदस्य के हवाले से बताया गया है कि करीब 50 फीट नीचे जाने के बाद पानी बहुत ठंडा हो जाता है। इससे गोताखोरों के लिए ज्यादा गहराई में काम करना कठिन हो रहा है। यही वजह है कि अब हाई-रेजोल्यूशन अंडरवाटर कैमरों की मदद से तलाश करने की तैयारी की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक ये कैमरे करीब 1,000 फीट तक की गहराई में तस्वीर और वीडियो लेने में सक्षम बताए गए हैं।
यहीं से रेस्क्यू ऑपरेशन को लेकर एक अहम सवाल सामने आता है—क्या इतनी गहरी जगह के लिए सिर्फ स्कूबा डाइवरों पर निर्भर रहना पर्याप्त है?
गहरे पानी में तलाश केवल गोताखोरी का मामला नहीं है। इसके लिए पानी के भीतर संचार, पर्याप्त एयर सप्लाई, तापमान से बचाव, कैमरा या अन्य तकनीकी उपकरण, डाइवर की गहराई और समय की निगरानी तथा बैकअप टीम जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी होती हैं। इसलिए ब्लू वाटर में अब यह देखना महत्वपूर्ण है कि इनमें से कौन-कौन से संसाधन शुरुआत से उपलब्ध थे और कौन-से बाद में जुटाए गए।
छत्तीसगढ़ में एसडीआरएफ की सात टीमों का ढांचा है और सरकारी दस्तावेजों में जवानों को डाइविंग प्रशिक्षण दिए जाने का रिकॉर्ड भी मिलता है। इसका अर्थ है कि राज्य के पास जल-रेस्क्यू की संस्थागत क्षमता है। लेकिन असली सवाल 2026 की मौजूदा operational readiness का है—कितने सक्रिय प्रशिक्षित डाइवर हैं, किस टीम के पास कौन-सा उपकरण है और गहरे पानी में उनकी प्रमाणित कार्यक्षमता कितनी है।
इसका जवाब रेस्क्यू टीम पर आरोप लगाकर नहीं, बल्कि उसके ड्यूटी रोस्टर, डाइव लॉग, उपकरण इश्यू रजिस्टर और ऑपरेशन रिकॉर्ड से निकलेगा।
रेस्क्यू टीम के काम की परिस्थितियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। लगातार गहरे और ठंडे पानी में उतरना शारीरिक और मानसिक रूप से कठिन काम है। डाइवरों को पर्याप्त आराम, rotation, मेडिकल निगरानी और सुरक्षा उपकरण मिलना जरूरी है। परिवार की बेचैनी और मौके पर जमा भीड़ के बीच काम करना इस दबाव को और बढ़ाता है। इसलिए किसी डाइवर की सुरक्षा सीमा को केवल इसलिए नहीं तोड़ा जा सकता कि परिवार को जल्द परिणाम चाहिए।
ब्लू वाटर पर भीड़ को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। रेस्क्यू के दौरान बड़ी संख्या में लोग मौके पर जुटे रहे। ऐसे संवेदनशील ऑपरेशन में रेस्क्यू क्षेत्र को सुरक्षित रखना और भीड़ को नियंत्रित करना जरूरी है, ताकि टीम बिना बाहरी दबाव और व्यवधान के काम कर सके।
हादसे के बाद प्रशासन ने अब ब्लू वाटर क्षेत्र को प्रतिबंधित करने और उसकी फेंसिंग कराने की बात कही है। राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा के अनुसार आम लोगों का प्रवेश पूरी तरह बंद किया जाएगा।
लेकिन यहीं एक पुराना सवाल फिर सामने आता है—क्या यह सुरक्षा व्यवस्था हादसे से पहले नहीं की जा सकती थी?
अगर कोई पुरानी खदान पानी से भरी है, उसकी गहराई सामान्य तालाब से अलग है और वहां लोग लगातार पहुंच रहे हैं, तो वहां चेतावनी बोर्ड, प्रवेश नियंत्रण, बैरिकेडिंग, निगरानी और आपातकालीन रेस्क्यू योजना पहले से क्यों नहीं थी? अगर पहले भी डूबने की घटनाएं हुई हैं, तो उन घटनाओं के बाद क्या स्थायी सुरक्षा उपाय किए गए?
ब्लू वाटर हादसा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि छत्तीसगढ़ में सिर्फ बड़े बांध ही नहीं, बल्कि पुरानी खदानों और दूसरे गहरे जलस्रोतों में भी लोगों के जाने का खतरा है। ऐसे स्थानों के लिए सामान्य बाढ़-रेस्क्यू व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो सकती।
इस हादसे के बाद सबसे जरूरी काम केवल यह पता लगाना नहीं है कि आदिल कहां है। उसके बाद यह भी पता लगाना होगा कि ब्लू वाटर को जोखिम वाले स्थल के रूप में प्रशासन ने कब पहचाना, क्या तैयारी की, रेस्क्यू टीम के पास क्या था, क्या नहीं था और गहरे पानी में राज्य की वास्तविक क्षमता कितनी है।
रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान टीम का मनोबल बनाए रखना और उसे हर जरूरी तकनीकी संसाधन देना तत्काल प्राथमिकता है। लेकिन ऑपरेशन पूरा होने के बाद इसकी निष्पक्ष समीक्षा भी उतनी ही जरूरी होगी।
क्योंकि ब्लू वाटर में इस समय सिर्फ एक युवक की तलाश नहीं हो रही है। इस गहरे पानी से छत्तीसगढ़ की सुरक्षा व्यवस्था, रेस्क्यू तैयारी और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े कई सवाल भी ऊपर आने का इंतजार कर रहे हैं।

