नई दिल्ली, 31 अगस्त 2026। कल्पना कीजिए कि कोई कार सामने अचानक आए व्यक्ति को पहचानकर खुद ब्रेक लगा दे, खेत की मिट्टी सेंसर से मिले आंकड़ों के आधार पर तय हो कि कब पानी देना है, खदान में ड्रोन इंसान के पहुंचने से पहले खतरनाक जगह की जानकारी दे दे और अस्पताल में किसी मरीज के शरीर का डिजिटल मॉडल इलाज के अलग-अलग विकल्पों का आकलन कर सके। यह भविष्य की किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि साइबर-फिजिकल सिस्टम (CPS) विकसित करने के पीछे काम कर रही तकनीक का एक हिस्सा है।
साइबर-फिजिकल सिस्टम ऐसी तकनीक है जो डिजिटल दुनिया को भौतिक दुनिया से जोड़ती है। सेंसर किसी मशीन, वाहन, खेत, इमारत या मानव शरीर से वास्तविक समय का डेटा जुटाते हैं। सॉफ्टवेयर उस डेटा का विश्लेषण करता है और कम्युनिकेशन नेटवर्क के जरिए सिस्टम तक निर्देश पहुंचते हैं। इसके बाद मशीन परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया कर सकती है।
यानी साधारण मशीन जहां दिए गए निर्देश पर काम करती है, वहीं CPS आधारित सिस्टम स्थिति को महसूस करके, उसका विश्लेषण करके और उसके मुताबिक प्रतिक्रिया देने की क्षमता हासिल करता है।
भारत बना रहा है अपना CPS इकोसिस्टम
भारत में इस तकनीक को विकसित करने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग नेशनल मिशन ऑन इंटरडिसिप्लिनरी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स (NM-ICPS) चला रहा है। केंद्र सरकार ने 2018 में इस मिशन को मंजूरी दी थी और नौ वर्षों के लिए 3,660 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया था।
मिशन के तहत देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब बनाए गए हैं। इनका काम केवल शोध करना नहीं, बल्कि शोध को तकनीक, उत्पाद और स्टार्टअप में बदलना भी है।
2025 में इनमें से चार बेहतर प्रदर्शन करने वाले हब को टेक्नोलॉजी ट्रांसलेशन रिसर्च पार्क के रूप में विकसित करने के लिए चुना गया। IIT कानपुर साइबर सुरक्षा, IISc बेंगलुरु रोबोटिक्स और AI, IIT (ISM) धनबाद माइनिंग टेक्नोलॉजी तथा IIT इंदौर डिजिटल हेल्थकेयर पर केंद्रित है।
लैब से निकलकर खेत और खदान तक पहुंच रही तकनीक
CPS की असली ताकत इसके वास्तविक इस्तेमाल में दिखाई देती है।
खेती में: सेंसर मिट्टी की नमी, मौसम और माइक्रो-क्लाइमेट की जानकारी लगातार जुटा सकते हैं। IIT बॉम्बे के शोधकर्ताओं का एग्री-IoT फार्म मैनेजमेंट सिस्टम इसी तरह के डेटा का इस्तेमाल कर पानी और उर्वरक के इस्तेमाल को बेहतर बनाने में मदद करता है।
स्वास्थ्य में: ‘डिजिटल ट्विन’ किसी वास्तविक सिस्टम की वर्चुअल कॉपी होती है, जिसे वास्तविक समय के डेटा से अपडेट किया जा सकता है। IIT इंदौर के दृष्टि CPS फाउंडेशन ने चरकडीटी विकसित किया है, जो फेफड़ों, आंखों और हृदय जैसी प्रणालियों का सिमुलेशन करता है। इससे बीमारी की प्रक्रिया और संभावित उपचारों को डिजिटल रूप से समझने में मदद मिल सकती है।
खनन में: खदानों में हर जगह इंसान का पहुंचना सुरक्षित नहीं होता। IIT (ISM) धनबाद के टेक्समीन हब ने ऐसे ड्रोन विकसित किए हैं जो 50 किलोमीटर तक डेटा भेज सकते हैं। इसका इस्तेमाल दूर और जोखिम वाले इलाकों की निगरानी में किया जा सकता है।
सड़क और मोबिलिटी में: IIT हैदराबाद के TiHAN फाउंडेशन ने स्वायत्त वाहनों की टेस्टिंग के लिए विशेष टेस्ट-बेड तैयार किया है। वहीं IISc बेंगलुरु में विकसित IRASTE सिस्टम दुर्घटना संभावित स्थानों की पहचान कर ड्राइवरों को रियल-टाइम अलर्ट देने पर काम कर रहा है।
AI बनेगा मशीनों की ‘बुद्धिमत्ता’ की परत
CPS को अधिक सक्षम बनाने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसी दिशा में NM-ICPS के तहत समर्थित भारतजेन भारतीय भाषाओं और संदर्भों के अनुरूप AI क्षमताएं विकसित कर रहा है।
PIB के मुताबिक, भारतजेन के ‘परम-2’ फाउंडेशन मॉडल में 17 अरब पैरामीटर हैं और यह 22 अनुसूचित भारतीय भाषाओं को सपोर्ट करता है। इसके श्रुतम स्पीच-टू-टेक्स्ट और सूक्तम टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉडल 12 भारतीय भाषाओं को सपोर्ट करते हैं।
इसका महत्व इसलिए है क्योंकि भविष्य के स्मार्ट सिस्टम सिर्फ डेटा को समझने तक सीमित नहीं होंगे। उन्हें इंसान की भाषा, स्थानीय परिस्थितियों और क्षेत्र विशेष की जरूरतों को भी समझना होगा।
अब तक 1,329 तकनीकी उत्पादों में योगदान
PIB के अनुसार, अगस्त 2026 तक NM-ICPS के तहत 1,146 तकनीकों को सक्षम किया गया है और 1,329 टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स में योगदान दिया गया है। मिशन के जरिए 1,136 स्टार्टअप और स्पिन-ऑफ को इनक्यूबेट किया गया है, जिनसे 24 हजार से अधिक रोजगार पैदा होने की बात कही गई है।
मिशन के तहत 5,824 फेलोशिप दी गई हैं और 2.46 लाख से ज्यादा पेशेवरों को कौशल विकास प्रशिक्षण दिया गया है। इसके अलावा करीब 200 अंतरराष्ट्रीय सहयोग स्थापित किए गए हैं।
असली बदलाव सिर्फ स्मार्ट मशीनों का नहीं होगा
साइबर-फिजिकल सिस्टम का महत्व इसलिए बड़ा है क्योंकि यह केवल मशीन को ‘स्मार्ट’ बनाने की तकनीक नहीं है। इसका उद्देश्य मशीन, सेंसर, सॉफ्टवेयर, नेटवर्क और इंसान को एक ही इंटेलिजेंट सिस्टम में जोड़ना है।
भविष्य में यही तकनीक ऐसे शहरों, कारखानों, अस्पतालों, खेतों और परिवहन प्रणालियों की नींव बन सकती है, जो बदलती परिस्थितियों को खुद पहचानें और उसके अनुसार प्रतिक्रिया दें।
यानी तकनीक की अगली छलांग सिर्फ यह नहीं होगी कि “मशीन क्या कर सकती है?” बल्कि यह होगी कि “मशीन अपने आसपास क्या हो रहा है, उसे कितनी अच्छी तरह समझ सकती है और उसके आधार पर क्या फैसला ले सकती है?”
