पड़ताल : दूध दुहे ग्वाल, औ पिये बेपारी ? कहावत के पीछे का सच !

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तिल्दा में दूध नदी में बहा, भाव बढ़ाने की मांग; छत्तीसगढ़ में उत्पादन बढ़ा, सरकारी निवेश भी बढ़ा, फिर पशुपालक बाजार के लिए क्यों लड़ रहा है?

रायपुर, 23 अगस्त। वाय के न्यूज। तिल्दा-नेवरा क्षेत्र में दूध के खरीद भाव को लेकर दुग्ध उत्पादकों का गुस्सा सड़क पर उतर आया। उत्पादकों ने दूध की आपूर्ति रोकने का ऐलान किया और विरोध के दौरान शिवनाथ नदी में हजारों लीटर दूध बहाया। उनका कहना है कि गाय के दूध का करीब 42 रुपये और भैंस के दूध का 52 रुपये प्रति लीटर भाव मिल रहा है। मांग दोनों दरों में 10 रुपये प्रति लीटर बढ़ोतरी की है।

दूध बहाने की यह तस्वीर उस प्रदेश की है, जहां पिछले चार वर्षों में दूध उत्पादन करीब 24 प्रतिशत बढ़ चुका है।

यहीं से सवाल शुरू होता है—दूध ज्यादा पैदा हो रहा है तो पशुपालक को उसका बाजार और बेहतर भाव क्यों नहीं मिल रहा?

दूध उत्पादन बढ़ा, लेकिन सवाल भाव का

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में दूध उत्पादन 2020-21 में 17.47 लाख टन था। 2024-25 में यह बढ़कर 21.62 लाख टन हो गया।

यानी चार साल में उत्पादन करीब 4.15 लाख टन बढ़ा।

यह वृद्धि प्रदेश में पशुपालन और डेयरी के विस्तार का संकेत है। लेकिन कुल उत्पादन बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि हर पशुपालक की आय भी उसी अनुपात में बढ़ी है।

तिल्दा का आंदोलन इसी अंतर को सामने लाता है।


सरकार ने डेयरी विस्तार के लिए क्या किया?

डेयरी क्षेत्र को बढ़ाने के लिए राज्य और केंद्र की योजनाओं में केवल पशु उपलब्ध कराने पर जोर नहीं है। इसमें दूध सहकारी समितियां, पशु नस्ल सुधार, पशु स्वास्थ्य, चारा, दूध संग्रह, शीतकरण और प्रसंस्करण जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।

राज्य के बजट में डेयरी विकास के लिए राशि रखी गई है। 2026-27 में डेयरी समग्र विकास के लिए 90 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसमें दुग्ध प्रसंस्करण केंद्रों के उन्नयन, पशु संवर्धन और चारा उत्पादन से जुड़ी गतिविधियां शामिल हैं।

इससे पहले भी राज्य बजट में डेयरी विकास, दुग्ध पशु और चारा उत्पादन के लिए अलग-अलग प्रावधान किए गए थे।

केंद्र की श्वेत क्रांति 2.0 के तहत भी छत्तीसगढ़ में नई दुग्ध सहकारी समितियां गठित करने का लक्ष्य रखा गया है।

अर्थात सरकार की नीति का एक स्पष्ट लक्ष्य है—अधिक पशुपालक, अधिक दूध, अधिक संगठित खरीद और बेहतर प्रसंस्करण व्यवस्था।


छत्तीसगढ़ में सहकारी दुग्ध व्यवस्था को विस्तार देने के लिए नई समितियां बनाई जा रही हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आता है।

प्रदेश में कुल दूध उत्पादन बढ़ा है, जबकि सहकारी नेटवर्क के जरिए दूध संग्रह में उसी अनुपात की वृद्धि दिखाई नहीं देती।

यही वह जगह है जहां तिल्दा की घटना महत्वपूर्ण हो जाती है।

अगर किसान ज्यादा दूध पैदा कर रहा है तो वह दूध किसे बेच रहा है?

सहकारी समिति को?

निजी डेयरी को?

स्थानीय दूध विक्रेता को?

होटल, मिठाई और पनीर कारोबार को?

या सीधे उपभोक्ता को?

सरकारी आंकड़े राज्य का कुल दूध उत्पादन बताते हैं, लेकिन जिला-वार दूध का कितना हिस्सा सहकारी और कितना निजी या असंगठित बाजार में जाता है, इसकी तस्वीर उतनी साफ नहीं है।

यही डेयरी विस्तार की अगली चुनौती है।


देवभोग की दर और तिल्दा की दर एक जैसी नहीं

छत्तीसगढ़ की सहकारी दुग्ध व्यवस्था में देवभोग प्रमुख ब्रांड है।

विधानसभा के रिकॉर्ड में दुग्ध महासंघ का दूध क्रय मूल्य 35 रुपये से बढ़ाकर 36.50 रुपये प्रति लीटर किए जाने की जानकारी दर्ज है।

लेकिन इसे तिल्दा के 42 रुपये गाय और 52 रुपये भैंस के दूध से सीधे जोड़ना सही नहीं होगा।

क्योंकि डेयरी में दूध का भुगतान केवल लीटर के आधार पर नहीं होता। फैट और एसएनएफ के आधार पर भी कीमत तय होती है।

इसलिए तिल्दा के मामले में असली दस्तावेज होगा—किसान की दूध भुगतान पर्ची।

उसमें यह देखना होगा कि दूध की गुणवत्ता क्या थी और भुगतान किस फार्मूले से हुआ।


दूध का MSP नहीं है

धान और गेहूं की तरह दूध के लिए केंद्र सरकार कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित नहीं करती।

दूध की खरीद कीमत सहकारी और निजी डेयरियां बाजार, लागत और दूध की गुणवत्ता जैसे कारकों के आधार पर तय करती हैं।

इसलिए तिल्दा में चल रहा विवाद MSP बढ़ाने का आंदोलन नहीं, बल्कि खरीद दर बढ़ाने की मांग है।

यह अंतर समझना जरूरी है।


42 रुपये में किसान को फायदा है या घाटा?

इसका जवाब केवल दूध की कीमत देखकर नहीं दिया जा सकता।

पशुपालक की लागत में दाना, हरा और सूखा चारा, खनिज मिश्रण, पशु चिकित्सा, दवाएं, पानी, बिजली, पशुशाला, श्रम और पशु खरीद में लगी पूंजी शामिल होती है।

पशु हर दिन समान मात्रा में दूध भी नहीं देता। दुग्धकाल के बाद सूखा काल आता है, जिसका खर्च भी पशुपालक उठाता है।

इसलिए तिल्दा के उत्पादकों की 10 रुपये प्रति लीटर अतिरिक्त कीमत की मांग का वास्तविक मूल्यांकन करने के लिए उनकी वास्तविक लागत और भुगतान पर्चियों को साथ रखना होगा।


दूध से ग्राहक तक पहुंचने में कितने रुपये जुड़ते हैं?

किसान से खरीदा गया दूध सीधे ग्राहक के गिलास तक नहीं पहुंचता।

बीच में:

संग्रह → दूध जांच → चिलिंग → परिवहन → प्रसंस्करण → पैकेजिंग → वितरण → खुदरा बिक्री

जैसे चरण आते हैं।

हर चरण की लागत है।

इसलिए किसान को मिलने वाली कीमत और ग्राहक द्वारा चुकाई गई कीमत के बीच का पूरा अंतर डेयरी या व्यापारी का मुनाफा नहीं है।

लेकिन इसी अंतर का सवाल महत्वपूर्ण है—

किसान को कितना मिला और बाकी रकम में वास्तविक लागत कितनी तथा मार्जिन कितना था?

इसका जवाब डेयरी-वार मूल्य श्रृंखला के आंकड़ों से ही मिलेगा।


पनीर पर प्रतिबंध से क्या बदलेगा?

दूध बाजार से जुड़ा एक दूसरा महत्वपूर्ण फैसला भी हाल में हुआ है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने 31 जुलाई 2026 से अमानकीकृत डेयरी एनालॉग उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया है। ऐसे उत्पादों के निर्माण, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री पर रोक लगाई गई है जो गैर-दुग्ध सामग्री से बने होने के बावजूद असली दुग्ध उत्पाद जैसा प्रस्तुत किए जाते हैं।

प्रतिबंध के बाद खाद्य विभाग की कार्रवाई में महासमुंद में करीब 300 किलो तैयार पनीर मिलने की रिपोर्ट सामने आई।

यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

लेकिन अभी यह आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि प्रतिबंध के बाद:

असली पनीर की मांग कितनी बढ़ी?

डेयरियों ने कितना अतिरिक्त दूध खरीदा?

पशुपालक को उसका कितना लाभ मिला?

इसलिए पनीर पर प्रतिबंध को सीधे किसान की आय बढ़ने से जोड़ना अभी उचित नहीं होगा।


पनीर के बाद मिठाई का बाजार

दूध से बने उत्पादों का बाजार केवल पनीर तक सीमित नहीं है।

खोया, मावा, छेना, घी और दूध मिठाई उद्योग में बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होते हैं।

FSSAI राज्यों को दूध, दूध उत्पादों और मिठाइयों के नमूने लेने और जांच करने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश देता है।

इसलिए यदि पनीर पर कार्रवाई हो रही है तो खोया, मावा और दूध आधारित मिठाइयों की जांच के आंकड़े भी महत्वपूर्ण होंगे।

किसी मिठाई को बिना जांच “नकली” कहना हालांकि सही नहीं है। प्रयोगशाला जांच के बाद ही यह बताया जा सकता है कि उत्पाद अमानक, मिलावटी या असुरक्षित था।


सरकारी प्रयास और जमीनी शिकायत के बीच अंतर कहां है?

तस्वीर के दोनों हिस्से सामने हैं।

एक तरफ—

दूध उत्पादन बढ़ा।
डेयरी विकास के लिए बजट बढ़ा।
नई समितियां बनाने की योजना बनी।
पशु, चारा और स्वास्थ्य पर योजनाएं चल रही हैं।
प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने की कोशिश हुई।

दूसरी तरफ—

तिल्दा में पशुपालक खरीद भाव बढ़ाने के लिए आंदोलन कर रहा है।

इन दोनों तथ्यों को एक साथ रखकर फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है कि डेयरी क्षेत्र में सरकारी निवेश और उत्पादन बढ़ने के बावजूद दूध के खरीद बाजार को लेकर असंतोष बना हुआ है।

यह असंतोष केवल उत्पादन की समस्या नहीं बताता। यह खरीद, बाजार और मूल्य निर्धारण की अगली कड़ी की जांच की जरूरत बताता है।


अब असली पड़ताल इन आंकड़ों की

तिल्दा के आंदोलन से आगे बढ़ने के लिए पांच आंकड़े निर्णायक होंगे।

पहला— पशुपालक को वास्तविक खरीद भाव कितना मिल रहा है?

दूसरा— फैट और एसएनएफ के आधार पर भुगतान कैसे हो रहा है?

तीसरा— दूध की वास्तविक उत्पादन लागत कितनी है?

चौथा— प्रदेश में उत्पादित दूध में सहकारी, निजी और असंगठित बाजार की हिस्सेदारी कितनी है?

पांचवां— किसान से ग्राहक तक पहुंचने में एक लीटर दूध की कीमत कितने चरणों में बढ़ती है?

इन आंकड़ों के बिना यह कहना मुश्किल है कि समस्या भाव की है, लागत की है, बाजार की है या खरीद व्यवस्था की।


तिल्दा से उठता बड़ा सवाल

सरकार ने डेयरी विस्तार के लिए निवेश किया। पशुपालन और दूध उत्पादन बढ़ा। सहकारी नेटवर्क के विस्तार की योजना बनी। प्रसंस्करण ढांचा मजबूत करने की कोशिश हुई।

फिर भी एक क्षेत्र के पशुपालक कह रहे हैं कि मौजूदा खरीद भाव पर वे दूध नहीं बेचेंगे।

इसलिए अब डेयरी नीति की सफलता का पैमाना सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि प्रदेश में कितना दूध पैदा हुआ।

यह भी देखना होगा कि—

उस दूध को किसने खरीदा, कितने में खरीदा और उस कीमत में पशुपालक का हिस्सा कितना रहा।

तिल्दा में हजारों लीटर दूध नदी में बहा है।

अब जरूरत उस दूध के साथ बह गए पैसे का हिसाब निकालने की है।

क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ग्वाला कितना दुह रहा है—सवाल यह है कि दूध की पूरी कीमत में ग्वाले के हिस्से में कितना आ रहा है।

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