12 अगस्त को दंतेश्वरी मंदिर परिसर में होगी पहली रस्म, 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई के साथ औपचारिक समापन
जगदलपुर, 11 अगस्त 2026। बस्तर का ऐतिहासिक दशहरा पर्व बुधवार, 12 अगस्त से शुरू होगा। हरेली अमावस्या के अवसर पर मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में पाट जात्रा पूजा विधान के साथ 75 दिवसीय पर्व की शुरुआत होगी। बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट जनजातीय परंपराओं, लोक आस्थाओं और रथ निर्माण से जुड़ी रस्मों के लिए देश-विदेश में जाना जाता है।
पाट जात्रा के दौरान पारंपरिक रूप से मांझी-चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन, पुजारी, पटेल, नाईक-पाईक और सेवादार रथ निर्माण से जुड़े औजार बनाने की रस्म पूरी करेंगे। बस्तर दशहरा समिति ने इस पूजा विधान में सेवादारों, ग्रामीणों और नागरिकों से शामिल होने की अपील की है।

सितंबर में डेरी गड़ाई, अक्टूबर में बढ़ेगा पर्व का क्रम
पर्व के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 24 सितंबर को डेरी गड़ाई पूजा विधान होगा। इसके बाद 10 अक्टूबर को काछनगादी, 11 अक्टूबर को कलश स्थापना और 12 अक्टूबर को जोगी बिठाई की रस्म होगी।
13 से 18 अक्टूबर तक प्रतिदिन नवरात्रि पूजा और रथ परिक्रमा पूजा विधान होगा। 18 अक्टूबर को सुबह 11 बजे बेल पूजा होगी। इसके अगले दिन 19 अक्टूबर को महाअष्टमी और निशा जात्रा का आयोजन होगा।
20 अक्टूबर को कुंवारी पूजा, जोगी उठाई और मावली परघाव की रस्म होगी।
21 और 22 अक्टूबर को रथ परिक्रमा
21 अक्टूबर को भीतर रैनी पूजा विधान और रथ परिक्रमा, जबकि 22 अक्टूबर को बाहर रैनी पूजा विधान और रथ परिक्रमा होगी।
23 अक्टूबर को सुबह काछन जात्रा पूजा विधान के बाद दोपहर में ऐतिहासिक मुरिया दरबार आयोजित किया जाएगा। 24 अक्टूबर को कुटुम्ब जात्रा पूजा विधान के तहत ग्राम्य देवी-देवताओं की विदाई होगी।
27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई
बस्तर दशहरा पर्व का औपचारिक समापन 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई पूजा विधान के साथ होगा। इस तरह 12 अगस्त से शुरू होने वाला यह पर्व करीब ढाई महीने तक विभिन्न पारंपरिक रस्मों और अनुष्ठानों के साथ चलेगा।
मां दंतेश्वरी को समर्पित बस्तर दशहरा की खासियत यह है कि इसकी रस्में सामान्य दशहरा आयोजनों से अलग हैं। यहां पर्व की पूरी परंपरा में रथ निर्माण, देवी-देवताओं की आराधना, जनजातीय परंपराओं और स्थानीय समुदायों की सहभागिता की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
