आर्मेनिया में क्यों बढ़ रही है भारत की दिलचस्पी?

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काकेशस से यूरोप तक रणनीतिक पहुंच का सवाल

नई दिल्ली, 20 अगस्त। वाय के न्यूज। आर्मेनिया भारत के लिए नक्शे पर एक छोटा देश जरूर है, लेकिन बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन में उसका रणनीतिक महत्व तेजी से बढ़ रहा है। दक्षिण काकेशस में स्थित आर्मेनिया भारत के लिए केवल रक्षा उपकरणों का बाजार नहीं, बल्कि ईरान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप के बीच अपनी रणनीतिक पहुंच बढ़ाने का एक संभावित आधार बन रहा है।

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की 17-18 अगस्त की आर्मेनिया यात्रा इसी बदलते रिश्ते का एक महत्वपूर्ण संकेत है। यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा एवं सैन्य-तकनीकी सहयोग के साथ क्षमता निर्माण, प्रशिक्षण, रक्षा अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार पर सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। भारतीय और अर्मेनियाई सशस्त्र बलों के बीच ‘संयुक्त सेवा स्टाफ वार्ता’ को संस्थागत रूप देने के लिए कार्य-शर्तों का आदान-प्रदान भी हुआ।

हथियारों की खरीद से आगे बढ़ता रिश्ता

भारत और आर्मेनिया के संबंधों में रक्षा क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में सबसे तेजी से उभरने वाला क्षेत्र है। आर्मेनिया ने अपनी रक्षा खरीद के स्रोतों में विविधता लाने की नीति अपनाई है और भारत इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण साझेदार बनकर सामने आया है।

भारत से आर्मेनिया को रक्षा प्रणालियों की आपूर्ति ने दोनों देशों के संबंधों को व्यावहारिक आधार दिया है। लेकिन अब सहयोग केवल खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहना चाहता। रक्षा अनुसंधान, सैन्य प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और तकनीकी सहयोग पर जोर इस बात का संकेत है कि दोनों देश दीर्घकालिक रक्षा साझेदारी की दिशा में बढ़ रहे हैं।

पाकिस्तान-तुर्किये समीकरण भी एक कारक

दक्षिण काकेशस की राजनीति में आर्मेनिया का महत्व उसके पड़ोसी अज़रबैजान और क्षेत्रीय शक्ति तुर्किये के कारण भी बढ़ जाता है। अज़रबैजान और आर्मेनिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष में तुर्किये का रुख अज़रबैजान के पक्ष में रहा है।

भारत के लिए यह समीकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तुर्किये और पाकिस्तान के बीच भी रणनीतिक निकटता है। हालांकि भारत-आर्मेनिया संबंध को केवल पाकिस्तान या तुर्किये के खिलाफ किसी गठजोड़ के रूप में देखना उचित नहीं होगा, लेकिन क्षेत्रीय समीकरणों में दोनों देशों के हितों की कुछ समानताएं जरूर दिखाई देती हैं।

चाबहार से काकेशस तक

आर्मेनिया का सबसे बड़ा दीर्घकालिक महत्व शायद कनेक्टिविटी के क्षेत्र में है।

भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के जरिए मध्य एशिया और यूरेशिया तक वैकल्पिक संपर्क विकसित करने की कोशिश कर रहा है। इसी संदर्भ में आर्मेनिया दक्षिण काकेशस में एक संभावित कड़ी बन सकता है।

सरल शब्दों में देखें तो भारत की रणनीतिक कल्पना में एक संभावित मार्ग इस तरह दिखाई देता है—

भारत → ईरान → आर्मेनिया → दक्षिण काकेशस → यूरोप

यह मार्ग अभी किसी पूर्ण विकसित वैकल्पिक व्यापार गलियारे के रूप में स्थापित नहीं है, लेकिन भारत के लिए इसकी रणनीतिक संभावना महत्वपूर्ण है। खासकर इसलिए कि पाकिस्तान के रास्ते स्थल संपर्क भारत के लिए उपलब्ध नहीं है।

भारत, ईरान और आर्मेनिया के बीच त्रिपक्षीय संवाद भी हो चुका है। इससे पता चलता है कि तीनों देशों के बीच कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग को लेकर संभावनाओं पर बातचीत का आधार मौजूद है।

चीन की BRI के बीच भारत का विकल्प

दक्षिण काकेशस चीन की व्यापक कनेक्टिविटी और निवेश रणनीति से भी अछूता नहीं है। ऐसे में भारत के लिए आर्मेनिया के साथ संबंध केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि व्यापक यूरेशियाई रणनीति का हिस्सा बन सकते हैं।

भारत की चुनौती यह है कि चीन के पास पहले से विशाल आर्थिक संसाधन, बुनियादी ढांचा परियोजनाएं और BRI का नेटवर्क है। इसके मुकाबले भारत को ऐसे साझेदारों और मार्गों की आवश्यकता है जहां वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति स्वतंत्र रूप से विकसित कर सके।

आर्मेनिया इस दृष्टि से एक उपयोगी साझेदार हो सकता है।

रूस के बाद बदलता आर्मेनिया

आर्मेनिया लंबे समय तक रूस के सुरक्षा ढांचे के करीब रहा। लेकिन हाल के वर्षों में येरेवन ने अपने सुरक्षा और रक्षा संबंधों में विविधता लाने की कोशिश तेज की है।

यही वह स्थिति है जिसमें भारत के लिए अवसर पैदा होता है। भारत रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को बनाए रखते हुए पश्चिम एशिया, यूरोप और काकेशस में स्वतंत्र साझेदारियां विकसित कर रहा है।

आर्मेनिया के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग इसी व्यापक रणनीतिक स्वायत्तता का हिस्सा माना जा सकता है।

रक्षा अनुसंधान में नया चरण

रक्षा सचिव की यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू भारत और आर्मेनिया के रक्षा मंत्रालयों के बीच संयुक्त सहयोग, नवाचार और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होना है।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अब स्वयं को केवल रक्षा सामग्री के खरीदार से बड़े रक्षा उत्पादक और निर्यातक के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। आर्मेनिया जैसे देशों के साथ तकनीकी और अनुसंधान सहयोग भारतीय रक्षा उद्योग के लिए नए बाजार और साझेदारियां खोल सकता है।

भारत के लिए असली रणनीतिक लाभ

आर्मेनिया का महत्व तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।

पहला—रक्षा: भारतीय रक्षा उद्योग के लिए विदेशी बाजार और सैन्य-तकनीकी साझेदारी।

दूसरा—कनेक्टिविटी: ईरान और काकेशस के रास्ते मध्य एशिया तथा यूरोप तक वैकल्पिक पहुंच की संभावना।

तीसरा—भूराजनीति: रूस, ईरान, तुर्किये, अज़रबैजान, यूरोप और चीन के बीच बदलते शक्ति-संतुलन में भारत की स्वतंत्र उपस्थिति।

इसलिए आर्मेनिया के साथ भारत का बढ़ता रिश्ता केवल एक छोटे देश के साथ द्विपक्षीय संबंधों की कहानी नहीं है। यह उस बड़े प्रयास का हिस्सा है जिसमें भारत हिंद-प्रशांत से लेकर पश्चिम एशिया और यूरेशिया तक अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय कूटनीति को मजबूत करना चाहता है।

रक्षा सचिव की हालिया यात्रा इसी बदलाव का संकेत देती है—जहां भारत और आर्मेनिया का रिश्ता हथियारों की खरीद से आगे बढ़कर प्रशिक्षण, तकनीक, अनुसंधान और संस्थागत सैन्य सहयोग की दिशा में जा रहा है।

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