सुरक्षा, विकास, पुनर्वास और आदिवासी कल्याण की एकीकृत रणनीति से मिला परिणाम
रायपुर, 2 अगस्त 2026, वाय के न्यूज। केंद्र सरकार ने कहा है कि भारत ने वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) के खिलाफ निर्णायक सफलता हासिल करते हुए देश को नक्सल-मुक्त बनाने की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त की है। पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा जारी एक विस्तृत विश्लेषण में कहा गया है कि 31 मार्च 2026 तक देश का कोई भी जिला अब वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) प्रभावित श्रेणी में नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि 37 जिलों को “लीगेसी” और “थ्रस्ट” जिलों के रूप में सुरक्षा एवं विकास संबंधी सहायता मिलती रहेगी तथा एक जिले को “चिंता वाले जिले” की श्रेणी में रखा गया है, ताकि अब तक मिली सफलता को स्थायी बनाया जा सके।
विश्लेषण में कहा गया है कि यह परिवर्तन सुरक्षा अभियानों, बुनियादी ढांचे के विस्तार, आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति, आदिवासी कल्याण, सुशासन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर आधारित एकीकृत रणनीति का परिणाम है।

2024 में तय किया गया था लक्ष्य
पीआईबी के अनुसार केंद्र सरकार ने 24 अगस्त 2024 को 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सल-मुक्त बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया था। विश्लेषण में कहा गया है कि सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, लगातार अभियान, विकास कार्यों और प्रशासन की बढ़ती पहुंच के कारण यह लक्ष्य निर्धारित समय-सीमा के भीतर हासिल किया गया।

बस्तर परिवर्तन का सबसे बड़ा उदाहरण
विश्लेषण में छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर संभाग को इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण बताया गया है। बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर, कांकेर और कोंडागांव जिलों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के साथ विकास कार्यों में तेजी आने की बात कही गई है।
पीआईबी के अनुसार इन जिलों में 3,240 किलोमीटर से अधिक सड़कें बनाई गईं तथा 889 मोबाइल टावर स्थापित किए गए। इससे दूरस्थ गांव शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, डिजिटल सेवाओं और सरकारी योजनाओं से बेहतर तरीके से जुड़ सके हैं।

बस्तरिया बटालियन और स्थानीय युवाओं की भूमिका
विश्लेषण में कहा गया है कि वर्ष 2017 में गठित बस्तरिया बटालियन इस बदलाव का महत्वपूर्ण आधार बनी। इसमें 1,143 जवान भर्ती किए गए, जिनमें लगभग 400 स्थानीय युवा शामिल हैं। स्थानीय युवाओं की भागीदारी से सुरक्षा बलों और आदिवासी समुदायों के बीच विश्वास बढ़ा तथा खुफिया तंत्र मजबूत हुआ।

सुरक्षा और पुनर्वास साथ-साथ
दस्तावेज में कहा गया है कि सरकार ने केवल सुरक्षा अभियान नहीं चलाए, बल्कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास को भी समान महत्व दिया।
वरिष्ठ कैडरों को 5 लाख रुपये तथा अन्य कैडरों को 2.5 लाख रुपये की सहायता राशि, 36 महीने तक प्रतिमाह 10 हजार रुपये का वजीफा तथा अन्य प्रोत्साहन उपलब्ध कराने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। बस्तर क्षेत्र में लगभग 3,000 आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों के पुनर्वास के लिए विशेष योजना तैयार की गई, जिसके लिए शुरुआती तौर पर 20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया।

वीर गुंडाधुर सेवा डेरा का उल्लेख
विश्लेषण में कहा गया है कि मई 2026 में शुरू की गई “शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा” पहल के तहत केंद्रीय सुरक्षा बलों के लगभग 70 शिविरों को नागरिक सेवा केंद्रों में बदला जा रहा है। इन केंद्रों के माध्यम से स्वास्थ्य, बैंकिंग, कृषि, कौशल विकास और अन्य सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। नेतानार में कॉमन सर्विस सेंटर की स्थापना को प्रशासन की प्रभावी वापसी का प्रतीक बताया गया है।

सांस्कृतिक पहल भी बनी बदलाव का आधार
पीआईबी ने कहा है कि “बस्तर पांडुम” और “बस्तर ओलंपिक्स” जैसी पहल ने आदिवासी युवाओं, कलाकारों और समुदायों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे सामाजिक भागीदारी और सांस्कृतिक पहचान मजबूत हुई।

तकनीक से बदली रणनीति
विश्लेषण में कहा गया है कि ड्रोन, यूएवी, उपग्रह चित्र, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विश्लेषण, मोबाइल डेटा और आधुनिक खुफिया तकनीकों के उपयोग से सुरक्षा अभियानों की प्रभावशीलता बढ़ी। वहीं सीआरपीएफ, कोबरा, डीआरजी, एसटीएफ तथा विभिन्न राज्यों की विशेष इकाइयों के बीच संयुक्त अभियान और बेहतर समन्वय स्थापित किया गया।
ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट, ऑपरेशन ऑक्टोपस, ऑपरेशन डबल बुल, ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म, ऑपरेशन भीमबर्ग और ऑपरेशन चक्रबंधा जैसे अभियानों का भी उल्लेख करते हुए इन्हें नक्सली नेटवर्क को कमजोर करने में महत्वपूर्ण बताया गया है।

हाल की कार्रवाई का भी जिक्र
विश्लेषण में 28 जुलाई 2026 को झारखंड में 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण तथा 29 जुलाई को बीजापुर में 49 लाख रुपये के इनामी आठ माओवादियों के आत्मसमर्पण का उल्लेख किया गया है। इसी दिन झारखंड में एक करोड़ रुपये के इनामी पोलित ब्यूरो सदस्य की गिरफ्तारी को भी महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया गया है।

राष्ट्रीय स्तर पर क्या कहा गया
पीआईबी के अनुसार वर्ष 2014 में देश के 126 जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित थे, जो मार्च 2026 तक घटकर शून्य हो गए। सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या भी 35 से घटकर शून्य होने की बात कही गई है।
विश्लेषण में कहा गया है कि वर्ष 2010 में नक्सल हिंसा की 1,936 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि 29 जुलाई 2026 तक वर्ष 2026 में केवल 33 घटनाएं दर्ज हुईं। इसी अवधि में मृतकों की संख्या भी उल्लेखनीय रूप से कम हुई है।
दस्तावेज के अनुसार पिछले वर्षों में 15,189 किलोमीटर सड़कें बनाई गईं, 9,497 मोबाइल टावर स्थापित किए गए, 1,804 नई बैंक शाखाएं खोली गईं, 1,321 एटीएम लगाए गए, 6,025 डाकघर स्थापित किए गए तथा 259 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों को मंजूरी दी गई, जिनमें से 179 संचालित हो रहे हैं। 90 हजार से अधिक युवाओं और महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण दिए जाने की भी जानकारी दी गई है।
विश्लेषण में कहा गया है कि विशेष केंद्रीय सहायता योजना के तहत अब तक 4,289.20 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। सुरक्षा संबंधी व्यय योजना के तहत 3,805.04 करोड़ रुपये तथा विशेष बुनियादी ढांचा योजना के तहत 1,761 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इन योजनाओं का उद्देश्य सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने के साथ-साथ विकास कार्यों को गति देना बताया गया है।
पीआईबी के विश्लेषण में कहा गया है कि भारत में नक्सलवाद के विरुद्ध मिली सफलता केवल सुरक्षा अभियानों का परिणाम नहीं है, बल्कि सुरक्षा, विकास, पुनर्वास, आदिवासी कल्याण और सुशासन को साथ लेकर चलने वाली दीर्घकालिक रणनीति का प्रभाव है। दस्तावेज में छत्तीसगढ़ के बस्तर मॉडल को इस परिवर्तन का प्रमुख उदाहरण बताते हुए कहा गया है कि जिन क्षेत्रों में कभी हिंसा और भय का वातावरण था, वहां अब सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, डिजिटल सेवाओं और सरकारी योजनाओं का विस्तार हो रहा है तथा विकास का नया दौर शुरू हुआ है।
समाचार बॉक्स
2010 बनाम 2026 : नक्सल मोर्चे पर क्या बदला?
| पहलू | 2010 | 2026 (29 जुलाई तक) |
|---|---|---|
| नक्सली हिंसा की घटनाएं | 1,936 | 33 |
| कुल मृतक | 1,005 | 11 |
| एलडब्ल्यूई प्रभावित जिले | व्यापक प्रभाव, 126 जिले (2014 तक) | 0 एलडब्ल्यूई प्रभावित जिला (31 मार्च 2026 के अनुसार) |
| सर्वाधिक प्रभावित जिले | 35 | 0 |
| सुदृढ़ पुलिस थाने | सीमित (2014 से पहले 66) | 663 |
| सीएपीएफ के नए सुरक्षा शिविर | — | 408 |
| मोबाइल टावर | सीमित | 9,497 |
| एलडब्ल्यूई क्षेत्रों में सड़क निर्माण | — | 15,189 किमी |
| आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली | — | 2025 में 2,337, 2024–मार्च 2026 के बीच 3,927 |
पीआईबी के विश्लेषण के अनुसार, पिछले एक दशक में सुरक्षा अभियानों, विकास कार्यों, पुनर्वास नीति और आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी पहुंच बढ़ने के कारण नक्सली हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई है। हालांकि, 37 जिलों में सुरक्षा एवं विकास संबंधी सहायता जारी रखी जा रही है ताकि इस उपलब्धि को स्थायी बनाया जा सके।
