नई दिल्ली, 20 अगस्त। वाय के न्यूज। भ्रूण के लिंग की जांच और लिंग चयन पर रोक लगाने वाले PC-PNDT Act के मामलों में अब पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और सोनोग्राफी सेंटरों की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सीधा असर पड़ेगा। अदालत ने स्पष्ट किया है कि इस विशेष कानून के तहत पुलिस अपने स्तर पर FIR दर्ज कर जांच नहीं कर सकती। PC-PNDT Act में निर्धारित Appropriate Authority को ही कानून के तहत शिकायत और वैधानिक कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी।
पुलिस FIR नहीं कर सकती, स्वास्थ्य विभाग की Appropriate Authority की भूमिका अहम
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि PC-PNDT Act के तहत कार्रवाई में पुलिस सामान्य आपराधिक मामलों की तरह स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं बन सकती। कानून ने Appropriate Authority को निरीक्षण, रिकॉर्ड की जांच और कानून के उल्लंघन पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है।
इसका सीधा संबंध स्वास्थ्य विभाग के उन अधिकारियों से है जिन्हें PC-PNDT Act के तहत Appropriate Authority या उसके अधिकृत अधिकारी की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं दूसरी ओर, सोनोग्राफी और इमेजिंग सेंटरों के लिए पंजीकरण, रिकॉर्ड और निर्धारित नियमों का पालन पहले की तरह अनिवार्य रहेगा।
क्या है PC-PNDT Act?
Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques (Prohibition of Sex Selection) Act, 1994 का उद्देश्य गर्भधारण से पहले और गर्भावस्था के दौरान ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल पर रोक लगाना है, जिनका उद्देश्य भ्रूण के लिंग का चयन या पहचान करना हो।
कानून के तहत भ्रूण का लिंग बताना, लिंग चयन के उद्देश्य से तकनीक का इस्तेमाल करना और ऐसी सेवाओं का प्रचार करना प्रतिबंधित है।
सोनोग्राफी सेंटरों पर क्या जिम्मेदारी?
PC-PNDT Act के तहत अल्ट्रासाउंड क्लिनिक, इमेजिंग सेंटर, जेनेटिक क्लिनिक, जेनेटिक लैबोरेटरी और संबंधित संस्थानों के लिए पंजीकरण व्यवस्था है।
इन संस्थानों को जांच से संबंधित निर्धारित रिकॉर्ड और दस्तावेजों का संधारण करना होता है। Appropriate Authority को इन केंद्रों का निरीक्षण करने और रिकॉर्ड की जांच करने की शक्ति प्राप्त है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला सोनोग्राफी सेंटरों के लिए कानून से राहत का फैसला नहीं है। उल्लंघन होने पर कार्रवाई जारी रहेगी, लेकिन कार्रवाई कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप करनी होगी।
पुलिस की भूमिका क्या रहेगी?
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं की है। Appropriate Authority को कार्रवाई के दौरान पुलिस की सहायता की आवश्यकता हो सकती है और पुलिस ऐसी सहायता कर सकती है।
लेकिन पुलिस PC-PNDT Act के अपराध को लेकर अपने स्तर पर FIR दर्ज कर सामान्य पुलिस जांच शुरू करके चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकती।
यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी निष्कर्ष है।
धारा 27 के बावजूद FIR क्यों नहीं?
PC-PNDT Act की धारा 27 के तहत अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है। सामान्य तौर पर संज्ञेय अपराध में पुलिस FIR दर्ज कर सकती है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि PC-PNDT Act की धारा 27 को अकेले नहीं पढ़ा जा सकता। इसे धारा 28 में निर्धारित शिकायत और संज्ञान की विशेष व्यवस्था के साथ पढ़ना होगा।
धारा 28 के अनुसार अदालत PC-PNDT Act के अपराध का संज्ञान निर्धारित तरीके से की गई शिकायत के आधार पर ले सकती है। इसमें Appropriate Authority या उसके अधिकृत अधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण है।
स्वास्थ्य विभाग के लिए क्या बदलेगा?
फैसले के बाद PC-PNDT Act के तहत कार्रवाई करने वाले स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की जिम्मेदारी और महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी सेंटर में अनियमितता मिलने पर केवल पुलिस को FIR के लिए भेज देना पर्याप्त नहीं होगा। कानून में निर्धारित शिकायत और अभियोजन की प्रक्रिया का पालन करना होगा।
यानी निरीक्षण से लेकर रिकॉर्ड की जांच, उल्लंघन की पहचान और अदालत में शिकायत तक की प्रक्रिया को PC-PNDT Act के प्रावधानों के अनुरूप रखना होगा।
पुराने पुलिस मामलों पर भी उठ सकते हैं सवाल
फैसले का असर उन मामलों पर भी पड़ सकता है जिनमें PC-PNDT Act के तहत पुलिस ने सीधे FIR दर्ज की, जांच की और चार्जशीट दाखिल की।
ऐसे मामलों में यह सवाल उठ सकता है कि क्या अदालत में संज्ञान लेने के लिए धारा 28 के अनुरूप वैध शिकायत मौजूद है। हालांकि हर मामले की स्थिति अलग होगी और यह देखना होगा कि आरोप केवल PC-PNDT Act के तहत हैं या किसी दूसरे कानून के तहत भी स्वतंत्र अपराध दर्ज किए गए हैं।
फैसला किसके लिए महत्वपूर्ण?
इस फैसले के प्रमुख हितबद्ध पक्ष हैं—
पुलिस: PC-PNDT Act के अपराधों में FIR और जांच की अपनी भूमिका की सीमा को लेकर।
स्वास्थ्य विभाग/Appropriate Authority: कानून के तहत निरीक्षण, जांच और शिकायत की वैधानिक प्रक्रिया को लेकर।
सोनोग्राफी और इमेजिंग सेंटर: पंजीकरण, रिकॉर्ड और अन्य अनिवार्य नियमों के पालन को लेकर।
डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट: प्रसवपूर्व जांच तकनीकों के वैध चिकित्सकीय इस्तेमाल और लिंग संबंधी जानकारी देने पर प्रतिबंध को लेकर।
अदालतें: PC-PNDT Act के मामलों में संज्ञान लेने के लिए धारा 28 की अनिवार्य प्रक्रिया को लेकर।
मूल उद्देश्य वही—लिंग चयन पर रोक
सुप्रीम कोर्ट का फैसला PC-PNDT Act के मूल उद्देश्य को कमजोर नहीं करता। कानून का मकसद लिंग चयन और भ्रूण के लिंग की पहचान के दुरुपयोग को रोकना है।
फैसले ने केवल यह स्पष्ट किया है कि इस उद्देश्य को लागू करने के लिए पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और Appropriate Authority को अपनी-अपनी वैधानिक सीमाओं के भीतर काम करना होगा। गंभीर अपराध होने के बावजूद अभियोजन की प्रक्रिया वही होगी जो संसद ने PC-PNDT Act में निर्धारित की है।
