समाचार-विश्लेषण
नई दिल्ली, 9 अगस्त 2026। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को लेकर इस वर्ष का संसद का मानसून सत्र परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता, पेपर लीक और संस्थागत जवाबदेही के सवालों के बीच महत्वपूर्ण रहा है। 20 जुलाई को सत्र शुरू होने के साथ ही NEET-UG 2026 से जुड़े पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था के मुद्दे पर विपक्ष ने संसद में चर्चा की मांग की। शुरुआती दिनों में इस मुद्दे को लेकर दोनों सदनों की कार्यवाही भी प्रभावित हुई।

इसी पृष्ठभूमि में NTA की कार्यप्रणाली और संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ी। 24 जुलाई को NTA ने 47 अधिकारियों की सेवाएं समाप्त करने की घोषणा की। एजेंसी ने कुछ मामलों में कानूनी और आपराधिक कार्रवाई की बात भी कही। इस कार्रवाई को NTA के व्यापक पुनर्गठन और ओवरहाल की दिशा में उठाए गए कदम के तौर पर देखा गया।
हालांकि, 47 अधिकारियों की सेवा समाप्ति को अपने आप में पूरा पुनर्गठन मानना उचित नहीं होगा। NTA के संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की प्रक्रिया इससे पहले से चल रही है और सरकार परीक्षा संचालन में विशेषज्ञता, तकनीकी क्षमता, सुरक्षा और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही है।
संसद में उठा परीक्षा व्यवस्था का सवाल
मानसून सत्र में NEET का मुद्दा केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहा। बहस का व्यापक संदर्भ सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता और पेपर लीक रोकने की व्यवस्था रहा। विपक्ष ने NTA की भूमिका और सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए, जबकि सरकार ने परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का पक्ष रखा।
इसी क्रम में Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026 को 27 जुलाई को लोकसभा में पेश किया गया। विधेयक का उद्देश्य सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों और संगठित परीक्षा अपराधों के खिलाफ मौजूदा कानूनी ढांचे को और कठोर बनाना था। लोकसभा ने इसे 29 जुलाई और राज्यसभा ने 30 जुलाई को पारित किया।
संशोधन में परीक्षा से जुड़े गंभीर अपराधों के लिए सजा और जुर्माने को बढ़ाने के साथ जांच और सुनवाई के लिए समयबद्ध व्यवस्था तथा विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों का प्रावधान किया गया है। इसका दायरा केवल NTA तक सीमित नहीं है, बल्कि कानून के दायरे में आने वाली सार्वजनिक परीक्षाओं की व्यापक व्यवस्था पर लागू होता है।
NTA के पुनर्गठन की पृष्ठभूमि
NTA के मौजूदा ढांचे में बदलाव की पृष्ठभूमि 2024 में डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों से जुड़ी है। समिति ने परीक्षा संचालन को अधिक विशेषज्ञ और जवाबदेह बनाने के लिए NTA में अलग-अलग कार्यक्षेत्रों या वर्टिकल के आधार पर संगठनात्मक क्षमता मजबूत करने की सिफारिश की थी।
इसमें यह भी सुझाव था कि एजेंसी के विभिन्न महत्वपूर्ण कामों के लिए स्पष्ट जिम्मेदारी तय की जाए और वरिष्ठ स्तर पर विशेषज्ञ प्रशासनिक क्षमता बढ़ाई जाए। इसलिए 10 वर्टिकल का प्रस्ताव समिति की सिफारिश है, इसे NTA के अंतिम स्वीकृत संगठनात्मक ढांचे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
47 अधिकारियों की कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण है?
NTA की ओर से 47 अधिकारियों की सेवा समाप्त करने का फैसला हाल के घटनाक्रमों में एक बड़ा प्रशासनिक कदम है। लेकिन इससे आगे का सवाल यह है कि क्या बदलाव केवल कर्मचारियों और पदों के स्तर पर होगा या परीक्षा की पूरी श्रृंखला को नए सिरे से सुरक्षित किया जाएगा।
प्रश्नपत्र तैयार करने और सुरक्षित रखने, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, डिजिटल और साइबर सुरक्षा, अभ्यर्थियों की पहचान, परीक्षा संचालन, उत्तरों के मूल्यांकन और शिकायत निवारण—इन सभी स्तरों पर स्पष्ट जवाबदेही परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करने के लिए जरूरी होगी।
NEET का परीक्षा प्रारूप भी समीक्षा के दायरे में
NEET को पेन-पेपर परीक्षा से कंप्यूटर आधारित परीक्षा यानी CBT में बदलने की संभावना पर भी चर्चा चल रही है। लेकिन इसे अंतिम निर्णय मानना अभी सही नहीं होगा। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इस संबंध में अंतिम निर्णय संबंधित टास्क फोर्स की रिपोर्ट के बाद लिया जाएगा।
इसलिए फिलहाल यह कहना अधिक उचित है कि NEET के परीक्षा प्रारूप में बदलाव की संभावना पर विचार हो रहा है, फैसला नहीं हुआ है।
धर्मेंद्र प्रधान के बाद प्रह्लाद जोशी की चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम के बीच शिक्षा मंत्रालय में नेतृत्व परिवर्तन भी हुआ। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब NTA और सार्वजनिक परीक्षा व्यवस्था पर राजनीतिक तथा संस्थागत दबाव बना हुआ है।
इसलिए जोशी के सामने चुनौती केवल मंत्रालय की नियमित जिम्मेदारियां संभालने की नहीं है। उन्हें NTA में चल रहे बदलावों को संस्थागत रूप देने, परीक्षा सुरक्षा मजबूत करने और विद्यार्थियों के बीच परीक्षा प्रणाली का भरोसा बहाल करने की दिशा में ठोस परिणाम देने होंगे।
हालांकि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और NTA के पुनर्गठन के बीच प्रत्यक्ष कारण-परिणाम संबंध स्थापित करना उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उचित नहीं होगा। इतना जरूर है कि दोनों घटनाक्रम एक ऐसे समय में हुए हैं जब NEET और सार्वजनिक परीक्षा व्यवस्था सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बनी हुई है।
आज की बैठक का महत्व
इसी पृष्ठभूमि में 9 अगस्त को प्रह्लाद जोशी की NTA को लेकर उच्चस्तरीय बैठक महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षा मंत्री ने सचिव और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ संस्थागत व्यवस्था मजबूत करने, परीक्षा प्रक्रिया को सुचारू बनाने और विद्यार्थियों के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने पर चर्चा की।
जोशी ने कहा कि सरकार का मुख्य ध्यान मजबूत, पारदर्शी और विश्वसनीय परीक्षा व्यवस्था बनाने पर है, ताकि प्रत्येक विद्यार्थी की आकांक्षा पूरी हो सके।
आज की बैठक के बाद NTA के पुनर्गठन का अंतिम ढांचा, नई समयसीमा या किसी विशेष परीक्षा के संबंध में कोई विस्तृत नया निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए इसे पुनर्गठन पूरा होने की घोषणा के बजाय चल रही सुधार प्रक्रिया की उच्चस्तरीय समीक्षा के रूप में देखना अधिक तथ्यात्मक होगा।
अब असली परीक्षा यह होगी कि NTA में होने वाले बदलाव कितने गहरे होते हैं। यदि सुधार केवल अधिकारियों के फेरबदल तक सीमित रहे तो उसका असर सीमित होगा। लेकिन यदि प्रश्नपत्र की सुरक्षा से लेकर परीक्षा केंद्र, तकनीकी निगरानी, मूल्यांकन और शिकायत निवारण तक पूरी व्यवस्था में जवाबदेही तय होती है, तभी NTA पर उठे भरोसे के संकट का स्थायी समाधान संभव होगा।
मानसून सत्र ने NEET विवाद को संसद से लेकर कानून और प्रशासनिक कार्रवाई तक पहुंचाया है। अब NTA के पुनर्गठन की अगली कड़ी और उसके परिणामों पर नजर रहेगी—और इस दौर में शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी के सामने सबसे बड़ी चुनौती परीक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों का भरोसा वापस लाने की होगी।
