84 हजार करोड़ के ‘समुद्र मंथन’ को मंजूरी: तेल-गैस की खोज का सबसे बड़ा अभियान

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आयात बिल घटाने पर सरकार का फोकस

नई दिल्ली, 1 अगस्त 2026, वाय के न्यूज। केंद्र सरकार ने देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से 84,084 करोड़ रुपये की राष्ट्रीय अपतटीय (ऑफशोर) अन्वेषण योजना ‘समुद्र मंथन’ को मंजूरी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस महत्वाकांक्षी योजना को स्वीकृति दी। इसका पहला चरण 31 मार्च 2031 तक पूरा किया जाएगा।

सरकार के अनुसार, यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा समुद्री तेल और प्राकृतिक गैस अन्वेषण कार्यक्रम है। योजना के जरिए गहरे समुद्र में तेल और गैस के नए भंडार खोजने, निजी निवेश बढ़ाने और घरेलू उत्पादन में वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है।

भारत को इसकी जरूरत क्यों?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है, लेकिन अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। वर्तमान में देश का वार्षिक कच्चा तेल आयात बिल लगभग 144 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 13 लाख करोड़ रुपये) है। सरकार का मानना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाकर इस आयात निर्भरता को कम करना जरूरी है।

योजना के प्रमुख लक्ष्य

  • समुद्र में तेल और गैस की खोज तेज करना।
  • घरेलू उत्पादन बढ़ाकर ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना।
  • निजी कंपनियों को अपतटीय अन्वेषण में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना।
  • तेल और गैस क्षेत्र में आधुनिक तकनीक तथा घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना।

84,084 करोड़ रुपये कहां खर्च होंगे?

योजना के तहत कुल राशि का उपयोग कई प्रमुख कार्यों में किया जाएगा—

  • 28,534 करोड़ रुपये आधुनिक अपतटीय भूकंपीय (सीस्मिक) सर्वे और डेटा तैयार करने पर।
  • 43,200 करोड़ रुपये 60 गहरे समुद्री अन्वेषण कुओं की खुदाई के लिए।
  • 10,000 करोड़ रुपये अपतटीय अवसंरचना विकसित करने पर।
  • 2,000 करोड़ रुपये तेल एवं गैस क्षेत्र के उपकरणों और सेवाओं के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने पर।
  • 350 करोड़ रुपये निगरानी, डिजिटल प्रणाली, मूल्यांकन, प्रशिक्षण और जागरूकता गतिविधियों पर।

कंपनियों को क्या सहायता मिलेगी?

सरकार गहरे समुद्र में अन्वेषण करने वाली कंपनियों को खुदाई लागत का 50 प्रतिशत या प्रति कुआं अधिकतम 675 करोड़ रुपये (जो भी कम हो) तक वित्तीय सहायता देगी। गहरे समुद्र में एक कुएं की खुदाई पर 125 से 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक खर्च आता है। यही वजह है कि सरकार जोखिम साझा करने की नीति अपना रही है।

किन क्षेत्रों में होगी सबसे ज्यादा खोज?

योजना के तहत मुख्य रूप से इन समुद्री बेसिनों में अन्वेषण पर जोर रहेगा—

  • कृष्णा-गोदावरी बेसिन
  • कावेरी बेसिन
  • महानदी बेसिन
  • अंडमान क्षेत्र

सरकार का कहना है कि भविष्य में भारत की सबसे बड़ी तेल और गैस संभावनाएं इन्हीं गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में हैं।

पहले क्या बदला?

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े सुधार किए हैं—

  • पहले प्रतिबंधित रहे 99 प्रतिशत से अधिक अपतटीय क्षेत्रों को अन्वेषण के लिए खोल दिया गया।
  • उत्पादन-साझाकरण की जगह राजस्व-साझाकरण व्यवस्था लागू की गई।
  • तेल क्षेत्र (विनियमन एवं विकास) संशोधन अधिनियम, 2025 लागू किया गया।
  • पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियम, 2025 के जरिए प्रक्रियाएं सरल बनाई गईं।
  • ओएनजीसी और ऑयल इंडिया के प्रदर्शन मानकों में अन्वेषण गतिविधियों पर अधिक जोर दिया गया।

योजना से क्या फायदा होगा?

सरकार का अनुमान है कि योजना सफल होने पर—

  • घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन 62 एमएमटीओई (मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट) से बढ़कर 80 एमएमटीओई प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है।
  • देश के हाइड्रोकार्बन संसाधन आधार में 1.6 टीओई से बढ़कर 2.2 टीओई तक वृद्धि हो सकती है।
  • कच्चे तेल के आयात बिल में करीब एक लाख करोड़ रुपये सालाना की कमी आ सकती है।
  • ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और विदेशी बाजारों पर निर्भरता घटेगी।

छत्तीसगढ़ के लिए क्या मायने?

छत्तीसगढ़ समुद्र तटीय राज्य नहीं है, इसलिए इस योजना का सीधा लाभ राज्य को नहीं मिलेगा। हालांकि, यदि देश में घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ता है और आयात पर निर्भरता घटती है, तो इसका सकारात्मक असर ऊर्जा क्षेत्र, उद्योगों और समग्र अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऊर्जा लागत में दीर्घकालिक स्थिरता आने से औद्योगिक राज्यों, जिनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है, को अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना है।

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