एसडीआरएफ-एनडीआरएफ ने तीन दिन चलाया अभियान, नौसेना की टीम पहुंचने से पहले सतह पर आया शव; प्रशासन ने पूरे क्षेत्र को प्रतिबंधित करने और फेंसिंग की तैयारी की
रायपुर, 23 अगस्त। वाय के न्यूज। नवा रायपुर के नकटी स्थित ब्लू वाटर खदान में 19 अगस्त को डूबे 24 वर्षीय आदिल खान का शव करीब 77 घंटे बाद शनिवार देर रात पानी की सतह पर मिला। एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमों ने तीन दिन तक गहरे पानी में तलाश की। भारतीय नौसेना के विशेषज्ञ गोताखोरों की मदद लेने की तैयारी के बीच शव मिलने से रेस्क्यू अभियान समाप्त हुआ।
तीन दिन तक गहराई में तलाश
आदिल 19 अगस्त की शाम दोस्तों के साथ ब्लू वाटर पहुंचा था। सामने आई जानकारी के अनुसार दोस्तों के बीच खदान के एक छोर से दूसरे छोर तक तैरकर जाने की शर्त लगी थी। आदिल पानी में उतरा और गहरे हिस्से की ओर चला गया, जहां वह डूब गया। सूचना मिलने के बाद माना थाना पुलिस के साथ एसडीआरएफ ने तलाश शुरू की और बाद में एनडीआरएफ को भी अभियान में लगाया गया।
गहरे पानी और कम तापमान के कारण गोताखोरों को तलाश में कठिनाई हुई। कई संभावित स्थानों पर खोज के बावजूद तीन दिनों तक आदिल का पता नहीं चल पाया।
नौसेना की टीम आने वाली थी
लगातार तलाश के बावजूद सफलता नहीं मिलने पर प्रशासन ने भारतीय नौसेना के ईस्टर्न नेवल कमांड, विशाखापट्टनम से विशेषज्ञ गोताखोरों की मदद मांगी थी। रिपोर्टों के अनुसार नौसेना की टीम अगले चरण में अभियान शुरू करने वाली थी, लेकिन उससे पहले ही शनिवार और रविवार की दरम्यानी रात आदिल का शव पानी की सतह पर दिखाई दिया। बचाव दल ने उसे बाहर निकालकर पुलिस के हवाले किया।
अब ब्लू वाटर की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
आदिल की मौत ने एक बार फिर ब्लू वाटर में सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने कहा था कि क्षेत्र को प्रतिबंधित करने और पूरे इलाके में फेंसिंग कराने की तैयारी है।
ब्लू वाटर मूल रूप से खनन से बने गहरे जलभराव वाला क्षेत्र है। इसके बावजूद यहां लोगों का पहुंचना और पानी में उतरना लगातार जोखिम पैदा कर रहा है। आदिल की मौत के बाद अब सवाल सिर्फ रेस्क्यू व्यवस्था का नहीं, बल्कि ऐसे खतरनाक जलाशयों तक लोगों की पहुंच रोकने की स्थायी व्यवस्था का भी है।
हादसा रोकने की जिम्मेदारी अब किसकी?
तीन दिन तक एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमें एक युवक को तलाशती रहीं और नौसेना की मदद लेने की नौबत आई। यह घटनाक्रम बताता है कि हादसा होने के बाद बचाव अभियान कितना कठिन हो सकता है। अब प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि केवल हादसे के बाद रेस्क्यू की व्यवस्था करने के बजाय हादसा होने से पहले लोगों की पहुंच रोकने की व्यवस्था कितनी प्रभावी ढंग से लागू की जाती है।
फेंसिंग, प्रवेश प्रतिबंध, चेतावनी बोर्ड और नियमित निगरानी की व्यवस्था लागू होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि ब्लू वाटर में लगातार होने वाले हादसों पर वास्तव में रोक लगती है या नहीं।
