छत्तीसगढ़ में CBI जांच की सिफारिश के बीच महाराष्ट्र, तेलंगाना और ओडिशा के मामलों ने बढ़ाए सवाल; शिकारी से खरीदार तक नेटवर्क खंगालने की जरूरत
रायपुर। छत्तीसगढ़ में बाघों के शिकार और उनकी खाल की तस्करी के मामलों ने अब वन्यजीव संरक्षण से आगे बढ़कर अंतरराज्यीय तस्करी नेटवर्क की आशंका को सामने ला दिया है। वन मंत्री केदार कश्यप ने 1 सितंबर को महाराष्ट्र सीमा से जुड़े बाघ शिकार मामलों की जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की है। उनका कहना है कि मामले में दूसरे राज्यों के लोगों और संभावित अंतरराष्ट्रीय गिरोह की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि इसी दौरान महाराष्ट्र, तेलंगाना और ओडिशा में भी बाघों के शिकार, बाघ की खाल, पैंगोलिन शल्क और दूसरे वन्यजीव अंगों की तस्करी के मामले सामने आए हैं। उपलब्ध रिकॉर्ड इन सभी घटनाओं को एक ही गिरोह से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन घटनाओं को एक साथ रखकर देखने पर मध्य भारत में सक्रिय तस्करी के रास्तों की जांच जरूरी दिखाई देती है।
छत्तीसगढ़ में तीन बाघों की खाल बरामद
इस साल जून-जुलाई में छत्तीसगढ़ के कांकेर और बीजापुर क्षेत्रों से तीन बाघों की खाल बरामद होने की जानकारी सामने आई। मामले में गिरफ्तारियों के बाद जांच का दायरा बढ़ा और महाराष्ट्र सीमा से जुड़े लोगों की भूमिका सामने आई।
1 जुलाई को वन विभाग ने दो बाघों की खाल के साथ दो तस्करों की गिरफ्तारी की जानकारी दी थी। इसके बाद कांकेर मामले में महाराष्ट्र पुलिस के दो जवानों की गिरफ्तारी ने जांच को नया मोड़ दिया। आरोपियों के घर से पैंगोलिन के शल्क मिलने की भी रिपोर्ट है।
यानी एक ही मामले में बाघ और पैंगोलिन, दोनों संरक्षित वन्यजीवों के अवैध कारोबार की कड़ी सामने आई।
बीजापुर में गिरफ्तारी का सिलसिला
बाघ की खाल बरामदगी के बाद बीजापुर में भी पुलिस और वन विभाग की कार्रवाई जारी रही। जुलाई में सात आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई थी।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इंद्रावती टाइगर रिजर्व और उससे लगे अबूझमाड़-बस्तर क्षेत्र में वन्यजीवों की निगरानी लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रही है। वन मंत्री ने बताया है कि सीमावर्ती और दूरस्थ इलाकों में तलाशी अभियान भी चलाए गए और बाद की तलाशी में शिकार की कोई नई घटना नहीं मिली।
वन विभाग के लोगों की भूमिका ने बढ़ाई चिंता
मामले की एक और गंभीर कड़ी विभागीय कर्मचारियों की कथित संलिप्तता है। वन मंत्री के अनुसार वन्यजीव शिकार में संलिप्त विभागीय अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई और उन्हें बर्खास्त किया गया।
यही पहलू जांच को केवल शिकारी या तस्कर की गिरफ्तारी से आगे ले जाता है। सवाल यह है कि अगर संरक्षित क्षेत्र में बाघ का शिकार हुआ तो निगरानी व्यवस्था में कहां चूक हुई और तस्करों को अंदर की जानकारी या मदद किस स्तर पर मिली?
महाराष्ट्र में पहले से सामने आया बड़ा नेटवर्क
छत्तीसगढ़ के मामले में महाराष्ट्र का नाम पहली बार नहीं आया है। महाराष्ट्र के चंद्रपुर-राजुरा क्षेत्र में 2025 में सामने आए बाघ शिकार मामले की विशेष जांच में बड़े नेटवर्क की कड़ियां सामने आने की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी।
जांच से जुड़े विवरणों में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, असम, मेघालय, मिजोरम और म्यांमार तक फैले नेटवर्क, बिचौलियों और हवाला कारोबारियों का उल्लेख हुआ था।
इस मामले की खासियत यह थी कि बाघ के अंगों की तस्करी को केवल स्थानीय शिकारियों का काम नहीं माना गया। जांच में शिकारी, बिचौलिये, वन्यजीव अंगों के कारोबारी और वित्तीय लेन-देन संभालने वाले लोगों की कड़ियां सामने आने की बात कही गई।
एक अन्य जांच रिपोर्ट में महाराष्ट्र से असम, फिर मिजोरम और आगे म्यांमार तक नए तस्करी मार्ग के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई।
गढ़चिरौली–चंद्रपुर क्यों महत्वपूर्ण?
छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र और महाराष्ट्र का गढ़चिरौली-चंद्रपुर क्षेत्र भौगोलिक रूप से जुड़े हुए वन क्षेत्रों का हिस्सा हैं। ऐसे में सीमा पार आवाजाही वन्यजीव अपराध की जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बन सकती है।
महाराष्ट्र में केवल बाघ ही नहीं, पैंगोलिन और दूसरे वन्यजीवों की तस्करी के मामले भी सामने आए हैं। अगस्त 2026 में मुंबई और ठाणे से अवैध कारोबार से बचाए गए 216 भारतीय स्टार कछुओं को ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया।
तेलंगाना में 20 सदस्यीय बाघ शिकारी गिरोह का मामला
महाराष्ट्र के बाद तेलंगाना की कड़ी भी महत्वपूर्ण है। मई 2025 में कोमाराम भीम आसिफाबाद जिले में बाघिन K8 की मौत के मामले में वन विभाग ने करीब 20 सदस्यों वाले शिकार गिरोह की आशंका जताई थी। पांच संदिग्धों को बाघ के नाखून और खाल के साथ हिरासत में लिए जाने की रिपोर्ट सामने आई।
बाद की रिपोर्टों में इस मामले में 30 लोगों की गिरफ्तारी का उल्लेख भी आया। K8 को उस क्षेत्र में 17 महीने के भीतर शिकार की गई तीसरी बाघिन बताया गया।
तेलंगाना का यह मामला छत्तीसगढ़ के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तेलंगाना के उत्तर में महाराष्ट्र और पूर्व में छत्तीसगढ़ से जुड़े वन क्षेत्र हैं। हालांकि K8 मामले को छत्तीसगढ़ के वर्तमान तस्करी मामलों से जोड़ने वाला प्रत्यक्ष प्रमाण अभी सामने नहीं आया है।
इसलिए यहां सावधानी जरूरी है—भौगोलिक निकटता को आपराधिक कड़ी नहीं माना जा सकता, लेकिन जांच में इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए।
ओडिशा में काले बाघों की खाल की लगातार बरामदगी
ओडिशा का सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व भी अलग वजह से जांच के दायरे में आता है। यहां दुर्लभ मेलानिस्टिक यानी काले बाघ पाए जाते हैं और इनकी खाल के शिकार के मामले सामने आए हैं।
जनवरी 2025 में सिमिलिपाल क्षेत्र में एक दुर्लभ मेलानिस्टिक बाघ की खाल बरामद होने के बाद कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।
इसके बाद मार्च 2026 में फिर मेलानिस्टिक बाघ की खाल बरामद हुई। इस मामले में नौ लोगों की गिरफ्तारी की रिपोर्ट आई, जबकि मुख्य आरोपी समेत चार लोगों के फरार होने की जानकारी दी गई।
मई 2026 में सिमिलिपाल क्षेत्र में मेलानिस्टिक बाघ की खाल के साथ तीन लोगों की गिरफ्तारी की भी रिपोर्ट सामने आई।
लगातार सामने आए इन मामलों ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या दुर्लभ काले बाघों की खाल के लिए विशेष मांग वाला तस्करी बाजार सक्रिय है।
बाघ के साथ पैंगोलिन भी बड़ा संकेत
छत्तीसगढ़ की मौजूदा जांच में पैंगोलिन की कड़ी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अप्रैल 2026 में DRI ने जगदलपुर से करीब 17 किलो पैंगोलिन शल्क जब्त कर अंतरराज्यीय तस्करी सिंडिकेट के तीन लोगों को पकड़ा था।
इसका अर्थ यह है कि बस्तर क्षेत्र में वन्यजीव अपराध केवल बाघ तक सीमित नहीं है। बाघ की खाल, बाघ के अंग और पैंगोलिन शल्क—अलग-अलग बाजारों में जाने वाले उत्पाद हैं, लेकिन इनके पीछे काम करने वाले स्थानीय नेटवर्क कुछ जगहों पर एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं।
यही वजह है कि जांच को केवल एक प्रजाति या एक घटना तक सीमित करने के बजाय पूरे वन्यजीव अपराध तंत्र पर केंद्रित करने की जरूरत है।
सवाल अब शिकारी से आगे का
मौजूदा घटनाओं को जोड़कर देखें तो जांच के सामने कम से कम पांच सवाल हैं—
पहला— बाघों का शिकार वास्तव में किन जंगलों में हुआ?
दूसरा— शिकारियों को बाघों की मौजूदगी की जानकारी कौन देता था?
तीसरा— खाल और दूसरे अंग जंगल से बाहर निकालने वाला नेटवर्क कौन था?
चौथा— महाराष्ट्र, तेलंगाना या दूसरे राज्यों में इनकी डिलीवरी किसे की जानी थी?
पांचवां— इनका अंतिम खरीदार और पैसा लगाने वाला कौन था?
महाराष्ट्र के 2025 के मामले में जांच पहले ही हवाला और अंतरराष्ट्रीय तस्करी मार्ग तक पहुंचने की बात सामने आ चुकी है। इसलिए छत्तीसगढ़ के मामले में भी केवल स्थानीय आरोपियों की गिरफ्तारी से पूरी तस्वीर सामने आने की संभावना कम है।
CBI जांच से क्या खुल सकता है?
वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा है कि दूसरे राज्यों के लोगों या अंतरराष्ट्रीय गिरोह की भूमिका हो सकती है और इसी कारण CBI जांच की सिफारिश की गई है।
यदि केंद्रीय एजेंसी जांच संभालती है तो जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा राज्यों की सीमाओं से बाहर जाकर नेटवर्क को जोड़ना होगा।
छत्तीसगढ़ के मामले को महाराष्ट्र के चंद्रपुर-गढ़चिरौली मामलों, तेलंगाना के आसिफाबाद शिकार प्रकरण और ओडिशा के सिमिलिपाल मामलों के साथ मिलाकर देखने से यह पता लगाने की कोशिश हो सकती है कि क्या—
बस्तर → महाराष्ट्र → मध्य भारत/पूर्वोत्तर → अंतरराष्ट्रीय बाजार
जैसा कोई तस्करी मार्ग सक्रिय है।
हालांकि, अभी उपलब्ध प्रमाणों से इन चार राज्यों के सभी मामलों को एक ही गिरोह का हिस्सा कहना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि महाराष्ट्र में सामने आया संगठित नेटवर्क, तेलंगाना का बड़ा शिकार गिरोह और ओडिशा में बार-बार बाघ की खाल की बरामदगी—इन घटनाओं को अलग-अलग फाइलों में बंद रखने के बजाय इनके बीच संभावित कड़ियों की जांच की जरूरत बताती हैं।
सबसे बड़ा सवाल : जंगल में शिकार कौन कर रहा है, यह पता चलना पर्याप्त नहीं
वन्यजीव तस्करी की पूरी श्रृंखला में शिकारी अक्सर सबसे निचली कड़ी होता है। असली नेटवर्क तक पहुंचने के लिए यह पता करना होगा कि खाल का सौदा कौन करता है, भुगतान कौन करता है, उसे दूसरे राज्य तक कौन पहुंचाता है और अंतिम खरीदार कौन है।
छत्तीसगढ़ में CBI जांच की सिफारिश इसी वजह से महत्वपूर्ण है। यदि जांच शिकार से लेकर अंतिम खरीदार और वित्तीय लेन-देन तक पहुंचती है, तभी यह पता चल सकेगा कि बस्तर के जंगलों में मारे जा रहे बाघों की खाल के पीछे स्थानीय अपराध है या उससे कहीं बड़ा अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय तस्करी तंत्र।
