बिहान की महिलाओं ने तैयार कीं स्थानीय सामग्री से राखियां; देशभर के बाजार में चीनी राखियों की मांग बेहद कमजोर
रायपुर, 28 अगस्त 2026। इस साल रक्षाबंधन के बाजार में स्वदेशी और हस्तनिर्मित राखियों की मांग बढ़ने के साथ छत्तीसगढ़ के महिला स्व-सहायता समूहों ने भी अपनी अलग पहचान बनाई। राज्य के अलग-अलग जिलों में महिलाओं ने धान, चावल, विभिन्न बीजों, बांस और प्राकृतिक सामग्री से राखियां तैयार कीं। इन राखियों को स्थानीय बाजारों के साथ-साथ विभिन्न बिक्री केंद्रों पर भी जगह मिली।
गरियाबंद में छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़ी महिलाओं ने धान-चावल, मूंगा, मटर, झरगा, सेमी और अरहर जैसी स्थानीय सामग्री से राखियों की अलग-अलग वैरायटी तैयार की। इनकी कीमत 5 से 60 रुपये तक रखी गई। छुरा विकासखंड के ग्राम जामली के जय भवानी स्व-सहायता समूह ने बांस से राखियां तैयार कीं और करीब 1,000 राखियों का स्टॉक बिक्री के लिए तैयार किया।
फिंगेश्वर क्षेत्र में जय मां घटारानी स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने करीब 5,000 राखियां तैयार कीं। इनकी कीमत 5 से 40 रुपये तक रखी गई। समूह ने करीब 10 हजार रुपये की लागत से राखियां तैयार कीं और बिक्री से अब तक 12 हजार रुपये प्राप्त होने की जानकारी दी। उपलब्ध स्टॉक की बिक्री से समूह को अतिरिक्त आय की उम्मीद थी।
रायगढ़ में भी बिहान से जुड़ी छह स्व-सहायता समूहों की महिलाओं ने बीज और फैंसी राखियां तैयार कीं। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार इन समूहों की राखियों की बिक्री करीब डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच चुकी थी। इन राखियों में इस्तेमाल होने वाले बीज बाद में पौधे उगाने के काम आ सकते हैं, इसलिए इन्हें पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में भी पेश किया गया।
जांजगीर-चांपा में महिलाओं ने धान, चावल, बीज, मोती और नग के साथ रक्तमौली धागे का इस्तेमाल कर हस्तनिर्मित राखियां तैयार कीं। वहीं बस्तर में महिला स्व-सहायता समूहों ने प्राकृतिक सामग्री से पर्यावरण-अनुकूल राखियां तैयार कर उनकी प्रदर्शनी और बिक्री की।
चीन की राखियों का क्या हुआ?
इस साल देशभर के बाजारों में चीनी निर्मित राखियों की मांग बेहद कमजोर रहने की बात व्यापारी संगठनों ने कही है। अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ (कैट) के अनुसार, बाजारों में उपभोक्ताओं ने भारतीय निर्मित राखियों को प्राथमिकता दी और चीनी राखियां लगभग बाजार से बाहर रहीं।
एनडीटीवी प्रॉफिट की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के बाजारों में भी कारोबारियों ने बताया कि चीनी राखियां पिछले दो-तीन वर्षों से काफी हद तक दिखाई नहीं दे रही हैं। इसके साथ ही हस्तनिर्मित और क्षेत्रीय उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ी है।
हालांकि, चीनी राखियों के इस साल के आयात या कारोबार में कितनी वास्तविक गिरावट आई, इसका कोई स्वतंत्र आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह कहना कि चीन के राखी कारोबार को कितने करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उचित नहीं होगा।
25 हजार करोड़ का राखी बाजार
कैट के अनुमान के अनुसार इस वर्ष देश में राखियों का कारोबार करीब 25 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। मिठाई, ड्राई फ्रूट्स, उपहार, परिधान, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य संबंधित वस्तुओं को मिलाकर रक्षाबंधन का व्यापक कारोबार 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है।
इस बाजार में खादी, बीज, जूट, बांस और अन्य स्थानीय सामग्रियों से बनी क्षेत्रीय राखियों की मांग बढ़ना छोटे कारीगरों, महिला उद्यमियों और स्व-सहायता समूहों के लिए नए बाजार का संकेत है। छत्तीसगढ़ की राखियों में स्थानीय कृषि उपज और प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल इस बदलाव को खास तौर पर सामने लाता है।
