सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हों डिजिटल पांडुलिपियां, संसदीय समिति की सिफारिश

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नई दिल्ली, 13 अगस्त 2026। वाय के न्यूज। सार्वजनिक धन से डिजिटलीकृत की गई पांडुलिपियों के प्रत्येक पृष्ठ और उनके सत्यापित प्रतिलेखन को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने के लिए एक खुले राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय की व्यवस्था की जाए। परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 393वीं रिपोर्ट में यह महत्वपूर्ण सिफारिश की है।

राज्यसभा सदस्य संजय कुमार झा की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा है कि सार्वजनिक व्यय से तैयार पांडुलिपि सामग्री को व्यापक शोध और ज्ञान के उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए। प्रतिबंधित संग्रहों के मामले में फेडरेटेड लर्निंग का उपयोग करने का सुझाव दिया गया है, ताकि मूल पांडुलिपियों की छवियां संग्रह से बाहर भेजे बिना उनका उपयोग मशीन लर्निंग के लिए किया जा सके।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण को केवल स्कैनिंग तक सीमित रखने के बजाय इसे व्यापक संरक्षण व्यवस्था से जोड़ने की सिफारिश की है। क्षतिग्रस्त पन्नों को पढ़ने के लिए मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग, ताड़पत्रों के लिए सरफेस-रिलीफ इमेजिंग और महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सामग्री का रिकॉर्ड तैयार करने का सुझाव दिया गया है।

एआई और भारतीय ज्ञान के लिए बनेगा डिजिटल आधार

रिपोर्ट में पांडुलिपियों में दर्ज व्यक्तियों, स्थानों और कृतियों का खुला सूचकांक तैयार करने तथा भारतीय ज्ञान का काल-स्तरीय मानचित्र बनाने की सिफारिश भी की गई है। पांडुलिपियों में दर्ज खगोलीय और मौसम संबंधी अवलोकनों को खुले राष्ट्रीय डेटासेट के रूप में उपलब्ध कराने का सुझाव है।

समिति ने ऐसी पांडुलिपियों को पढ़ने के लिए शोध कार्यक्रम शुरू करने की सिफारिश की है, जिन्हें क्षति या पन्नों के आपस में चिपक जाने के कारण खोला नहीं जा सकता। इसके लिए राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों के साथ मिलकर काम करने का सुझाव दिया गया है।

विदेशों में मौजूद पांडुलिपियों की डिजिटल पहचान

समिति ने देश और विदेश में बिखरे भारतीय पांडुलिपि संग्रहों का साझा कैटलॉग बनाने, पन्नों और लिपिकारों की लिखावट का कंप्यूटर की मदद से मिलान करने तथा वर्चुअल रीबाइंडिंग की व्यवस्था विकसित करने की सिफारिश की है।

विदेशों में मौजूद भारतीय पांडुलिपियों की पहचान कर उनकी डिजिटल प्रतियां हासिल करने और जहां संभव हो, मूल पांडुलिपियों को वापस लाने के प्रयास करने का सुझाव भी दिया गया है।

रिपोर्ट में जीवित सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए भारतीय भाषाओं की मौखिक परंपराओं को स्पीच रिकग्निशन के जरिए रिकॉर्ड करने, लिपियों के लिए डिजिटल संसाधन विकसित करने और पारंपरिक ज्ञान के अंतिम जीवित गुरुओं की तकनीकों को त्रिआयामी रूप में दर्ज करने की सिफारिश की गई है।

समिति ने सांस्कृतिक और पांडुलिपि संबंधी जानकारी को पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान और जिला योजनाओं से जोड़ने तथा इनके आधार पर ज्ञान पर्यटन सर्किट विकसित करने का सुझाव भी दिया है।

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