‘सर तन से जुदा’ नारा संप्रभुता के लिए चुनौती: हाईकोर्ट

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कोर्ट ने ‘अल्लाह-हू-अकबर’, ‘जय श्री राम’ और ‘हर हर महादेव’ से तुलना को माना अनुचित; मौलाना तौकीर रज़ा की जमानत खारिज

प्रयागराज, 7 सितंबर, वाय के न्यूज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली हिंसा से जुड़े मामले में ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ नारे को भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए चुनौती बताया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस नारे की तुलना ‘अल्लाह-हू-अकबर’, ‘जय श्री राम’, ‘हर हर महादेव’ या ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ जैसे धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती।

जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की पीठ ने सितंबर 2025 की बरेली हिंसा से जुड़े मामले में मौलाना तौकीर रज़ा खान की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत के अनुसार अन्य धार्मिक नारे संबंधित ईश्वर या गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं, जबकि ‘सर तन से जुदा’ नारा कानून के अधिकार के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए चुनौती है। कोर्ट ने इसे लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाने वाला बताया।

बरेली हिंसा के मामले में जमानत से इनकार

मामला 26 सितंबर 2025 को बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार मुस्लिम समुदाय के लोगों को इस्लामिया इंटर कॉलेज मैदान में एकत्र होने का आह्वान किया गया था। प्रशासन ने बाद में BNSS की धारा 163 के तहत पांच या उससे अधिक लोगों के सार्वजनिक रूप से एकत्र होने पर रोक लगा दी थी।

राज्य के मुताबिक रोक के बावजूद करीब 200 से 250 लोग मैदान की ओर बढ़े। पुलिस द्वारा रोकने की कोशिश के दौरान भीड़ ने कथित तौर पर ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए, पथराव और पेट्रोल बम फेंके तथा पुलिस पर गोलीबारी की। इस दौरान पुलिसकर्मियों के घायल होने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने की बात भी अभियोजन ने अदालत में रखी।

तौकीर रज़ा का तर्क भी दर्ज

तौकीर रज़ा की ओर से कहा गया कि वह हिंसा में शामिल नहीं थे और उन्हें घटना वाले दिन सुबह करीब 10 बजे नजरबंद कर दिया गया था। उनकी ओर से यह भी कहा गया कि उन्होंने ऐसा कोई भाषण या अपील नहीं की, जिसे हिंसा अथवा सार्वजनिक शांति भंग करने के लिए उकसाने वाला माना जा सके।

अदालत ने हालांकि दर्ज किया कि रज़ा ने शुक्रवार की नमाज के बाद इस्लामिया इंटर कॉलेज में एकत्र होने का आह्वान किया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि घटना के बाद लोगों की प्रतिक्रिया के लिए उन्हें धन्यवाद देने और उनके कार्यों की सराहना करने वाला उनका भाषण भी स्वीकार्य नहीं था।

अदालत ने नारे के अर्थ और संदर्भ में अंतर किया

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में धार्मिक नारों और ‘सर तन से जुदा’ नारे के संदर्भ में अंतर करते हुए कहा कि दोनों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने मौलाना तौकीर रज़ा को इस चरण में जमानत देने से इनकार कर दिया।

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