पुस्तक : ‘सबके राम’
लेखिका : डॉ. शीला गोयल
समीक्षा- शताब्दी सुबोध पांडे
राम भारत की चेतना में केवल एक धार्मिक आस्था का नाम नहीं हैं। वे भारतीय जीवन-दर्शन, मर्यादा, कर्तव्य, त्याग, करुणा, सत्य और लोकमंगल के ऐसे आदर्श हैं, जिन्हें प्रत्येक पीढ़ी अपने समय के संदर्भ में नए अर्थों के साथ देखती रही है। डॉ. शीला गोयल की पुस्तक ‘सबके राम’ इसी व्यापक दृष्टि को सामने रखने वाला एक महत्वपूर्ण साहित्यिक प्रयास है।
पुस्तक की शुरुआत वर्तमान समय की बेचैनी और सामाजिक अशांति की पृष्ठभूमि से होती है। लेखिका के लिए रामकथा केवल अतीत की कथा नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन को दिशा देने वाली जीवन-दृष्टि है। पुस्तक में राम के चरित्र को कर्तव्यशीलता, वैराग्य, करुणा, भ्रातृप्रेम, प्रकृति-प्रेम, नारी के प्रति सम्मान, भक्ति और मर्यादा जैसे अनेक आयामों से देखा गया है।

‘सबके राम’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि राम को केवल मंदिर और पूजा तक सीमित न रखकर उन्हें जीवन के व्यवहार में उतारने वाले आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में ‘श्री राम स्तुति’, ‘हे सीते शक्ति प्रणाम तुम्हें’, ‘रामनाम सुखधाम’, ‘आदर्श की पराकाष्ठा भगवान राम’, ‘श्रीरामचरितमानस में चरित्र की शिक्षा’, ‘हनुमान जी की दास्यभक्ति’, ‘श्रीराम का रूप एवं शील’, ‘भ्रष्टाचार और उससे बचने का उपाय’ तथा ‘भक्ति की शक्ति है अपार’ जैसे विविध विषयों को स्थान मिला है।
इस पुस्तक में रामकथा को समकालीन सामाजिक जीवन से जोड़ने का प्रयास भी दिखाई देता है। ‘मनुष्य के जीवन में कुमति के रावण और सुमति के विभीषण’ तथा ‘भ्रष्टाचार और उससे बचने का उपाय’ जैसे विषय यह बताते हैं कि रामायण के पात्रों और प्रसंगों को लेखिका आज के जीवन के नैतिक संघर्षों से जोड़कर देखती हैं।
हनुमान के चरित्र को भी पुस्तक में विशेष महत्व दिया गया है। हनुमान का बल केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि बुद्धि, विवेक, संयम और सेवा से जुड़ी शक्ति है। पुस्तक में यह विचार प्रभावी ढंग से सामने आता है कि शक्ति जब बुद्धि और मर्यादा से नियंत्रित होती है, तभी वह लोकमंगल का साधन बनती है।
‘सबके राम’ में रामनाम की महिमा का भी सुंदर विवेचन मिलता है। रामनाम को आध्यात्मिक सम्बल और मनुष्य के अंतर्मन को शक्ति देने वाले आधार के रूप में देखा गया है।
पुस्तक का शीर्षक—‘सबके राम’—अपने आप में अत्यंत अर्थपूर्ण है। राम को किसी एक वर्ग, क्षेत्र या समूह तक सीमित न करके उन्हें सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। राम का आदर्श जितना आध्यात्मिक है, उतना ही सामाजिक और नैतिक भी है।
पुस्तक की भाषा में श्रद्धा, भावनात्मक आत्मीयता और साहित्यिक संवेदना का सुंदर समन्वय है। कहीं कविता है, कहीं स्तुति, कहीं कथा, कहीं चिंतन और कहीं जीवन-दर्शन। यही विविधता पुस्तक को एकरस होने से बचाती है।
आज जब आधुनिक जीवन की गति तेज है, लेकिन मनुष्य के भीतर तनाव, असंतुलन और नैतिक द्वंद्व भी बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में राम के चरित्र की पुनर्व्याख्या विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है। राम को केवल पूजना नहीं, बल्कि राम के मूल्यों को अपने जीवन में उतारना—‘सबके राम’ का मूल संदेश यही प्रतीत होता है।
अंततः कहा जा सकता है कि ‘सबके राम’ राम के बहुआयामी स्वरूप को साहित्य, भक्ति, चिंतन और जीवन-मूल्यों के माध्यम से पाठक तक पहुँचाने का सार्थक प्रयास है। यह पुस्तक पाठक को केवल राम के बारे में पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं से यह प्रश्न करने के लिए भी प्रेरित करती है—मेरे आचरण में राम के कितने मूल्य हैं?
पुस्तक समीक्षक

शताब्दी सुबोध पांडे
सह-संपादक, महिला मित्र पाक्षिक
