बहुला चौथ : जब प्रकृति, परिवार और परंपरा बन जाते हैं एक-दूसरे के पूरक

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गौ-पूजन से लेकर जौ के लड्डू तक, यह लोकपर्व भारतीय जीवन-दर्शन में करुणा, कृतज्ञता, ऋतु-अनुकूल आहार और परिवार की मंगलकामना का अनूठा संगम है
भारतीय पर्व केवल पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहे हैं। इनके भीतर सदियों के अनुभव, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, कृषि संस्कृति, खान-पान की परंपराएं और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व की गहरी भावना भी छिपी है। बहुला चौथ ऐसा ही एक लोकपर्व है, जिसमें मां और संतान के संबंध के साथ मनुष्य, पशु और प्रकृति के पारस्परिक संबंध का सुंदर संदेश दिखाई देता है।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला यह पर्व कई क्षेत्रों में बहुला चतुर्थी, बहुरा चौथ या भादुड़ी चौथ के नाम से भी जाना जाता है। छत्तीसगढ़ में विशेष रूप से माताएं संतान की सुख-शांति, स्वास्थ्य, दीर्घायु और परिवार की समृद्धि की कामना से यह व्रत रखती हैं। इस दिन गौ-बछड़े की पूजा की परंपरा है।

बहुला यानी ममता, सत्य और वचन का प्रतीक

बहुला चौथ की सबसे लोकप्रिय लोककथा भगवान श्रीकृष्ण और बहुला नामक गाय से जुड़ी है।
कथा के अनुसार बहुला भगवान कृष्ण की प्रिय गाय थी। एक दिन कृष्ण ने उसकी सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता की परीक्षा लेने के लिए सिंह का रूप धारण किया। वन में बहुला का सामना सिंह से हुआ। मृत्यु सामने देखकर भी बहुला विचलित नहीं हुई। उसने सिंह से कहा कि उसका बछड़ा गौशाला में भूखा है। वह पहले उसे दूध पिलाकर वापस लौटेगी और फिर स्वयं को उसके आहार के रूप में प्रस्तुत कर देगी।सिंह ने उसे जाने दिया। बहुला अपने बछड़े के पास पहुंची, उसे भरपेट दूध पिलाया और फिर अपना वचन निभाने के लिए वापस सिंह के पास लौट आई। उसकी सत्यनिष्ठा, मातृत्व और वचनपालन से प्रसन्न होकर सिंह रूप में उपस्थित भगवान श्रीकृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और बहुला को आशीर्वाद दिया। लोकमान्यता में इसी प्रसंग से भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी को बहुला की पूजा की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।
कथा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश केवल चमत्कार नहीं, बल्कि ममता, सत्य, वचन और कर्तव्य के प्रति निष्ठा है। बहुला अपने जीवन से यह बताती है कि मातृत्व केवल मनुष्य का भाव नहीं, बल्कि समूची जीव-सृष्टि में विद्यमान संवेदना है।

गाय के दूध पर बछड़े का पहला अधिकार

बहुला चौथ की एक अत्यंत अर्थपूर्ण परंपरा है—इस दिन गाय के दूध और उससे बने पदार्थों का सेवन न करना। इसका धार्मिक भाव यह है कि जिस गाय की पूजा की जा रही है, उसके दूध पर सबसे पहला अधिकार उसके बछड़े का है।
अर्थात जिस जीव को हम पूज्य मानते हैं, उसके संसाधनों पर अपना अधिकार जताने के बजाय एक दिन उसके बच्चे के अधिकार को प्राथमिकता देना।
छत्तीसगढ़ में भी बहुला चौथ के अवसर पर गाय के दूध से बनी सामग्री से परहेज तथा जौ के लड्डू और अन्य जौ-आधारित फलाहार की परंपरा दर्ज है।
यह परंपरा आधुनिक भाषा में संसाधनों के प्रति संयम और जीवों के प्रति करुणा का संदेश देती है।

जौ का लड्डू : स्वाद से कहीं आगे की कहानी

बहुला चौथ का सबसे विशिष्ट प्रसाद है जौ का लड्डू। छत्तीसगढ़ी खाद्य परंपरा में इसे जौ के आटे या सत्तू, गुड़ और भैंस के घी से तैयार किया जाता है। यहां जौ का चयन अपने आप में महत्वपूर्ण है।

जौ भारतीय कृषि और खाद्य संस्कृति का अत्यंत पुराना अनाज है। भारतीय खान-पान की परंपरा में जौ का प्रयोग आहार, सत्तू और विभिन्न व्यंजनों में लंबे समय से होता आया है।
बहुला चौथ में जौ का प्रयोग इस बात की याद दिलाता है कि हमारे पारंपरिक व्रतों में स्थानीय और उपलब्ध खाद्यान्नों को धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन से जोड़ा गया था।
जौ का लड्डू केवल प्रसाद नहीं रह जाता, वह खेत और रसोई के बीच का संबंध भी बन जाता है—किसान की मेहनत से निकला अनाज पूजा का हिस्सा बनता है और फिर परिवार का फलाहार।

भैंस का दूध, दही और घी : परंपरा का दूसरा पक्ष

छत्तीसगढ़ की कुछ पारंपरिक प्रथाओं में बहुला चौथ पर गाय के दूध से परहेज करते हुए भैंस के दूध, दही और घी का उपयोग किया जाता है। स्थानीय परंपरा में इसका उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है।इस परंपरा का मूल भाव यह है कि गाय की पूजा के दिन उसके दूध को बछड़े के लिए छोड़ दिया जाए और भोजन के लिए दूसरे पशु-आधारित स्रोत का उपयोग किया जाए। इस तरह धार्मिक भावना और दैनिक जीवन का आहार एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

ऋतु के अनुसार भोजन की भारतीय समझ

बहुला चौथ भाद्रपद में आती है। यह वह समय है जब वर्षा ऋतु अपने प्रभाव में होती है और मौसम में नमी रहती है। ऐसे समय में भोजन की प्रकृति और मात्रा को लेकर भारतीय परंपरा में संयम पर जोर दिया जाता रहा है।
व्रत में सामान्य भोजन से विराम, सीमित फलाहार और पारंपरिक रूप से तैयार जौ के लड्डू जैसे व्यंजन शरीर को भारी भोजन से कुछ समय दूर रखते हैं।
यह कहना सही नहीं होगा कि प्राचीन लोगों ने आधुनिक पोषण विज्ञान की पूरी वैज्ञानिक भाषा में इन नियमों को बनाया था। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि पीढ़ियों के अनुभव से विकसित ऋतु-अनुकूल खान-पान की अनेक परंपराएं भारतीय संस्कृति में पर्वों के माध्यम से संरक्षित हुईं।
यही भारतीय परंपरा की खूबी है—कई बार भोजन की थाली ही ऋतु, कृषि और संस्कृति का दस्तावेज बन जाती है।

मोटे और पारंपरिक अनाजों की ओर लौटने का संदेश

आज पूरी दुनिया पोषण और खाद्य विविधता की बात कर रही है। मोटे अनाजों, पारंपरिक अनाजों और स्थानीय खाद्य पदार्थों को फिर से भोजन की थाली में लाने पर जोर दिया जा रहा है।
बहुला चौथ जैसे पर्व याद दिलाते हैं कि भारतीय समाज में अनाज केवल पेट भरने का साधन नहीं था। हर अनाज का अपना सांस्कृतिक संदर्भ था।
जौ, सत्तू, गुड़ और पारंपरिक घी से बना लड्डू एक ऐसी खाद्य परंपरा का उदाहरण है जिसमें स्थानीय कृषि, उपलब्ध संसाधन और धार्मिक अनुष्ठान एक साथ दिखाई देते हैं।
इस दृष्टि से बहुला चौथ को केवल व्रत का पर्व मानना इसके व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ को छोटा कर देना होगा।

आध्यात्मिक अर्थ : लेने से पहले देने का भाव

बहुला चौथ का आध्यात्मिक संदेश भी गहरा है।
गाय की पूजा करने का अर्थ केवल उसके सामने दीप जलाना नहीं है। उसके प्रति कृतज्ञ होना, उसके बछड़े के अधिकार को स्वीकार करना, उसे भोजन-पानी देना और उसके प्रति करुणा रखना भी उसी पूजा का विस्तार है।
अर्थात यह पर्व मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका सहजीवी बनने की सीख देता है।
गाय और बछड़े की पूजा में मातृत्व का सम्मान है। जौ के लड्डू में अन्न के प्रति कृतज्ञता है। व्रत में संयम है। कथा में सत्य और वचन है। और परिवार के लिए की जाने वाली प्रार्थना में प्रेम और उत्तरदायित्व है। बहुला चौथ का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका सामाजिक स्वरूप भी है। माताएं संतान की मंगलकामना के लिए व्रत करती हैं। परिवार के सदस्य पूजा और प्रसाद की तैयारी में शामिल होते हैं। ग्रामीण और अर्धशहरी समाज में यह पर्व पशुधन, कृषि और परिवार—तीनों को एक सूत्र में बांधता है।
मायके से बेटी के लिए जौ के लड्डू और पूजन सामग्री भेजने की परंपरा भी कई परिवारों में देखने को मिलती है। इस तरह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहता, बल्कि मायका-ससुराल, मां-संतान और परिवार-समाज के रिश्तों को मजबूत करने वाला माध्यम बन जाता है।
आज जब पर्यावरण संकट, जल संकट, जैव विविधता और खाद्य सुरक्षा जैसे प्रश्न हमारे सामने हैं, तब बहुला चौथ की परंपराएं नए अर्थों में पढ़ी जा सकती हैं।
प्रकृति से हमें अन्न मिलता है, पशुओं से अनेक प्रकार के संसाधन मिलते हैं और परिवार हमें भावनात्मक आधार देता है। भारतीय लोकजीवन ने इन तीनों को अलग-अलग नहीं देखा।
बहुला चौथ के साथ संतान की रक्षा, दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की अनेक लोकमान्यताएं जुड़ी हैं। धार्मिक दृष्टि से यह आस्था का विषय है; वैज्ञानिक दृष्टि से इन मान्यताओं को किसी प्रत्यक्ष कारण-परिणाम के रूप में प्रमाणित करना उचित नहीं होगा।
लेकिन पर्व के व्यवहारिक संदेश आज भी प्रासंगिक हैं—संयमित भोजन, खाद्य विविधता, स्थानीय अनाजों का उपयोग, पशुओं के प्रति संवेदना, परिवार के साथ सामूहिक समय और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता।
यही वह बिंदु है जहां लोकपरंपरा और आधुनिक जीवन एक-दूसरे से संवाद कर सकते हैं।

एक पर्व, अनेक संदेश

बहुला चौथ को यदि केवल एक व्रत के रूप में देखा जाए तो यह एक दिन की धार्मिक परंपरा है। लेकिन यदि इसके भीतर छिपे संकेतों को समझा जाए तो यह भारतीय जीवन-दर्शन का छोटा-सा पाठ बन जाता है।
बहुला की कथा सिखाती है—सत्य और वचन का मूल्य।
गौ-पूजन सिखाता है—जीवों के प्रति करुणा।
बछड़े के लिए दूध छोड़ना सिखाता है—दूसरे के अधिकार का सम्मान।
जौ के लड्डू बताते हैं—अन्न और कृषि के प्रति कृतज्ञता।
भैंस के दूध-दही-घी का पारंपरिक उपयोग बताता है—स्थानीय खाद्य विविधता।
व्रत सिखाता है—संयम।
परिवार के लिए प्रार्थना सिखाती है—ममता और उत्तरदायित्व।
और प्रकृति से जुड़ा पूरा पर्व बताता है कि मानव जीवन प्रकृति से अलग होकर नहीं, उसके साथ संतुलन बनाकर ही समृद्ध हो सकता है।
शायद यही बहुला चौथ का सबसे सुंदर संदेश है—परिवार की मंगलकामना और प्रकृति के संरक्षण को दो अलग-अलग विषय न मानकर एक ही जीवन-दर्शन के रूप में देखना
क्योंकि जिस समाज में अन्न को देवता, पशु को सहचर, प्रकृति को माता और परिवार को जीवन का आधार माना गया हो, वहां त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते—वे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचने वाली जीवन-शिक्षाएं होते हैं।

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