सगरी सजाकर महिलाओं ने की हलछठ की पूजा, संतान के मंगल की कामना

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पसहर चावल, भैंस के दूध और छह प्रकार की भाजी का किया उपयोग, छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा में दिखी आस्था

रायपुर1सितंबर(वाय के न्यूज)। संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना को लेकर बुधवार को हलछठ यानी हलषष्ठी का पर्व श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। रायपुर सहित प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं ने जगह-जगह सगरी बनाकर उसकी पूजा की। सगरी के चारों ओर महिलाएं एकत्र हुईं और पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर हलछठ की कथा सुनी।


छत्तीसगढ़ में हलछठ की पूजा का स्वरूप अपनी विशिष्ट

लोकपरंपराओं के कारण अलग पहचान रखता है। कई स्थानों पर महिलाएं मिट्टी से छोटा जलकुंड बनाकर उसे सगरी का रूप देती हैं। इसमें पानी भरकर आसपास मिट्टी, कांस-कुश और स्थानीय परंपरा के अनुसार पूजन सामग्री रखी जाती है। सगरी को प्रकृति, जल और जीवन का प्रतीक मानते हुए महिलाएं इसकी पूजा करती हैं।
हलछठ के व्रत में पसहर चावल का विशेष महत्व माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार इस दिन हल से जोते गए खेत से प्राप्त अन्न का सेवन नहीं किया जाता। इसलिए महिलाएं पसहर चावल का उपयोग करती हैं। पूजा के बाद व्रत के पारण में भी पारंपरिक रूप से पसहर चावल का सेवन किया जाता है।
छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों में हलछठ के अवसर पर भैंस के दूध, दही और घी का उपयोग विशेष रूप से किया जाता है। पूजा सामग्री में इनका उपयोग तथा व्रत के पारण में सेवन स्थानीय मान्यताओं और पारंपरिक रीति का हिस्सा है। गाय के दूध के बजाय भैंस के दूध को इस पर्व से जोड़ने की परंपरा भी छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में देखने को मिलती है।
हलछठ की पूजा में स्थानीय रूप से उपलब्ध विभिन्न प्रकार की भाजी-सब्जियों और वनस्पतियों का उपयोग किया जाता है। कई परिवारों में छह प्रकार की भाजी या छह प्रकार की खाद्य सामग्री रखने की परंपरा है। क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार इसमें अंतर भी देखने को मिलता है। महुआ, लाई और अन्य स्थानीय खाद्य सामग्री भी पूजा एवं व्रत के प्रसाद में शामिल की जाती है।
पूजा स्थल पर मिट्टी से बनाए गए छोटे-छोटे प्रतीकों को भी रखा जाता है। कई स्थानों पर सगरी के आसपास छोटे मिट्टी के घर, पशु-पक्षियों अथवा कृषि जीवन से जुड़े प्रतीक बनाए और सजाए जाते हैं। इन लोक प्रतीकों के माध्यम से प्रकृति, कृषि, पशुधन और पारिवारिक जीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा रही है।
हलषष्ठी भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी को समर्पित पर्व माना जाता है। उनका प्रमुख आयुध हल है, इसलिए इस पर्व का संबंध कृषि और धरती से भी जोड़ा जाता है। कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में हलछठ की लोकपरंपरा खेती-किसानी, जल, अन्न, पशुधन और प्रकृति के साथ गहरे संबंध को दर्शाती है।महिलाओं ने दिनभर व्रत रखकर सगरी के पास दीप प्रज्ज्वलित किए और पूजा-अर्चना की। इसके बाद सामूहिक रूप से हलछठ की कथा सुनी। माताओं ने अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना की। शाम तक विभिन्न मोहल्लों में सगरी के आसपास महिलाओं की भीड़ रही।
लोक आस्था, मातृत्व, कृषि संस्कृति और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देने वाला हलछठ पर्व छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपरा को जीवंत करता नजर आया।

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