सारंगढ़, 30 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के ऐतिहासिक एवं धार्मिक कस्बे कोसीर में रविवार को लोकपर्व भोजली श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। सुबह से ही गांव की गलियों में मांदर और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप के बीच भोजली गीत गूंजते रहे।
माताओं और बहनों ने सिर पर भोजली की टोकरियां रखकर गांव का भ्रमण किया। पारंपरिक वेशभूषा में महिलाएं लोकगीत गाते हुए सबसे पहले ग्राम्य देवी मां कौशलेश्वरी देवी मंदिर पहुंचीं। यहां भोजली की टोकरियां देवी के समक्ष रखकर हल्दी-कुमकुम और चावल से पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने गांव की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल तथा भाई-बहन के प्रेम की कामना की।
भोजली छत्तीसगढ़ की कृषि और लोकपरंपरा से जुड़ा पर्व है। इसमें मिट्टी के पात्र में धान, गेहूं, जौ और राई जैसे अनाजों के दाने बोकर उनकी नियमित पूजा की जाती है। अंकुरित भोजली को अन्न, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। रक्षाबंधन के अगले दिन भाई के कान में भोजली लगाने की भी परंपरा है।
कार्यक्रम में कोसीर की सरपंच सुमन राजेंद्र राव और क्षेत्र की जनपद सदस्य हिरा भैरव नाथ जाटवर भी शामिल हुईं। दोनों ने महिलाओं के साथ पूजा-अर्चना की। सरपंच सुमन राव ने कहा कि भोजली हमारी मिट्टी और कृषि संस्कृति से जुड़ा पर्व है, इसे सहेजना हम सभी की जिम्मेदारी है।
पूजा के बाद बाजे-गाजे के साथ भोजली की टोकरी लेकर ग्रामीण बांधा तालाब पहुंचे। शाम को पारंपरिक विधि-विधान से भोजली का विसर्जन किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण, बुजुर्ग, युवा और बच्चे मौजूद रहे। ग्रामीणों ने एक-दूसरे को भोजली देकर पर्व की बधाई दी।
कोसीर में भोजली पर्व के आयोजन ने छत्तीसगढ़ की ग्रामीण लोकसंस्कृति, कृषि परंपरा और सामुदायिक सहभागिता की झलक पेश की।
रिपोर्ट : लक्ष्मीनारायण लहरे, पत्रकार
