मिशन जल रक्षा : देश के लिए नज़ीर बना नांदगांव

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जहां कभी बारिश का पानी बहकर निकल जाता था, वहां अब जमीन में उतर रही हर बूंद

राजनांदगांव के ‘मिशन जल रक्षा’ ने बदली तस्वीर, 662 गांवों में जल संरक्षण का मॉडल बना अभियान

राजनांदगांव, 26 जुलाई, 2026, वाय के न्यूज। मानसून की बारिश इस बार राजनांदगांव में सिर्फ खेतों को ही नहीं सींच रही, बल्कि भूजल भंडार भी भर रही है। कभी बरसात का पानी बहकर नालों और नदियों में चला जाता था, लेकिन अब जिले के कई गांवों में उसे जमीन के भीतर उतारने की तैयारी पहले से कर ली गई है। इसी बदलाव की कहानी है ‘मिशन जल रक्षा’, जिसे भारत सरकार ने #CatchTheRain अभियान के तहत एक सफल मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है।

जिले में जल संरक्षण का काम केवल तालाब बनाने तक सीमित नहीं रहा। वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से ऐसे स्थानों की पहचान की गई, जहां बारिश का पानी सीधे भूजल भंडार तक पहुंच सके। इसके लिए जीआईएस मैपिंग, एक्विफर मैपिंग और रिमोट सेंसिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया गया। कई बंद पड़े बोरवेल को रिचार्ज शाफ्ट में बदला गया, जबकि इंजेक्शन वेल और परकोलेशन टैंक बनाकर बारिश के पानी को जमीन में उतारने की व्यवस्था की गई।

गांव-गांव में दिख रहा असर

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिले के 662 गांवों में जल संरक्षण के लिए बड़े पैमाने पर काम हुआ है। इसके तहत—

  • 60 हजार से अधिक जल संरक्षण एवं रिचार्ज संरचनाएं बनाई गईं।
  • 500 से ज्यादा अनुपयोगी बोरवेल को रिचार्ज शाफ्ट में बदला गया।
  • 600 से अधिक इंजेक्शन वेल और 1,700 से ज्यादा परकोलेशन टैंक तैयार किए गए।
  • 2,500 से अधिक जल स्रोतों का जियो-टैग किया गया।
  • इन कार्यों से 51 लाख से अधिक मानव-दिवस का रोजगार भी सृजित हुआ।
  • जिले में भूजल स्तर औसतन 2.04 मीटर बढ़ने का दावा किया गया है।

खेती के तौर-तरीके भी बदले

रिपोर्ट के अनुसार, केवल जल संरचनाएं बनाना ही लक्ष्य नहीं था। किसानों को कम पानी वाली फसलों के लिए भी प्रोत्साहित किया गया। नतीजतन, गर्मी के मौसम में धान की खेती का लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र कम पानी की जरूरत वाली फसलों की ओर स्थानांतरित हुआ। इससे भूजल पर दबाव कम करने में मदद मिली।

जनभागीदारी बनी ताकत

इस अभियान में ग्राम पंचायतों, किसानों, महिलाओं और युवाओं को भी जोड़ा गया। जल बजट, जागरूकता अभियान और स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण के उपायों को सामुदायिक अभियान का रूप दिया गया। यही वजह है कि योजना केवल सरकारी परियोजना नहीं रही, बल्कि गांवों की भागीदारी वाला अभियान बन गई।

दूसरे जिलों के लिए भी सीख

भारत सरकार का मानना है कि राजनांदगांव का अनुभव बताता है कि यदि मानसून से पहले वैज्ञानिक योजना बनाई जाए और स्थानीय समुदाय को साथ लेकर काम किया जाए तो बारिश की हर बूंद को जल संकट से निपटने के स्थायी समाधान में बदला जा सकता है। अब यह मॉडल अन्य जिलों के लिए भी एक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

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