जामिया मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का अहम निर्देश
नई दिल्ली, 8 सितंबर, वाय के न्यूज़। महिला कर्मचारियों के लिए कार्यस्थल पर स्वच्छ और स्वतंत्र टॉयलेट की सुविधा को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। जामिया मिलिया इस्लामिया से जुड़े मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिला फैकल्टी के लिए विशेष रूप से तय टॉयलेट का इस्तेमाल सभी महिला फैकल्टी सदस्य कर सकेंगी और किसी व्यक्ति को उस पर ताला लगाने की अनुमति नहीं होगी। विश्वविद्यालय को यह सुविधा एक सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराने को कहा गया है।
मामला जामिया की वरिष्ठ प्रोफेसर सुजाता ऐश्वर्या की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने विश्वविद्यालय में महिला कर्मचारियों के लिए अलग और स्वच्छ टॉयलेट सुविधा की जरूरत उठाई थी। उनका कहना था कि जिस रेस्टरूम का वह इस्तेमाल करती थीं, उसे बाद में ताले में रखा जाने लगा और उसकी चाबी कुछ कर्मचारियों तक सीमित कर दी गई। बाद में जब उस सुविधा को सामान्य उपयोग के लिए खोल दिया गया तो स्वच्छता की स्थिति खराब होने की शिकायत की गई।
हर भवन में महिला स्टाफ के लिए सुविधा
सुनवाई के दौरान जामिया की ओर से कोर्ट को बताया गया कि विश्वविद्यालय ने प्रत्येक भवन की पहली मंजिल पर महिला स्टाफ के लिए एक टॉयलेट विशेष रूप से निर्धारित करने का निर्णय लिया है।
एक भवन की दूसरी मंजिल पर मौजूद टॉयलेट को भी महिला फैकल्टी और दिव्यांग महिलाओं के लिए निर्धारित किया गया है। कोर्ट ने विश्वविद्यालय के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया कि यह सुविधा केवल महिलाओं के लिए होगी। दिव्यांग पुरुषों के लिए अलग व्यवस्था करने की बात भी विश्वविद्यालय ने कही है।
टॉयलेट पर ताला नहीं लगा सकेगा कोई
कोर्ट ने अपने निर्देश में इस बात को खास तौर पर स्पष्ट किया कि महिला फैकल्टी के लिए निर्धारित टॉयलेट सभी महिला फैकल्टी सदस्यों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध रहेगा। किसी व्यक्ति को उस पर ताला लगाने या चाबी के जरिए किसी विशेष व्यक्ति तक पहुंच सीमित करने की अनुमति नहीं होगी।
शिकायत करने पर शुरू हो गई थी अनुशासनात्मक कार्रवाई
इस मामले की पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। मार्च 2026 में इसी विवाद से जुड़े एक अन्य आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने जामिया द्वारा प्रोफेसर ऐश्वर्या के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि स्वच्छता और गरिमा से जुड़ी कार्यस्थल की शिकायत को इस तरह अनुशासनात्मक कार्रवाई में बदलना उचित नहीं था।
प्रोफेसर ने उस समय टॉयलेट की स्वच्छता और अपनी शारीरिक परेशानी को देखते हुए अलग महिला टॉयलेट की मांग की थी। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक यह मामला विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी शिकायत के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन बाद में अनुशासनात्मक कार्रवाई तक पहुंच गया।
सवाल सिर्फ जामिया का नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट का ताजा निर्देश ऐसे सभी कार्यस्थलों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है जहां महिला कर्मचारी बड़ी संख्या में काम करती हैं। स्वच्छता, निजता और आसानी से उपलब्ध टॉयलेट को केवल अतिरिक्त सुविधा के बजाय कामकाजी वातावरण की बुनियादी जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए।
जामिया मामले में कोर्ट ने तत्काल यह सुनिश्चित किया है कि महिला फैकल्टी के लिए निर्धारित सुविधा वास्तव में उन्हीं के उपयोग के लिए उपलब्ध रहे और उस तक पहुंच किसी व्यक्ति की निजी चाबी या नियंत्रण पर निर्भर न हो।
