बूँद-बूँद सागर ; छोटी -छोटी कविताओं का महासागर

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आज 14अगस्त को लाला जगदलपुरी जी की पुण्यतिथि पर विशेष


आलेख : स्वराज्य करुण


हृदय के आकाश में भावनाओं के बादल जब व्याकुल होकर बरसने लगते हैं, तब उनकी बूँदों से छोटी -छोटी कविताएँ जन्म लेती हैं और कविताओं का महासागर बन जाता है. छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि लाला जगदलपुरी की ऐसी ही छोटी -छोटी रचनाओं का संकलन ‘बूँद -बूँद सागर ‘ इस वर्ष प्रकाशित हुआ है. इनमें 43 लघु कविताएँ, छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की प्रमुख सम्पर्क बोली हलबी की 9 और भतरी बोली की 7 कविताओं का हिन्दी रूपान्तर भी शामिल है. उनके द्वारा हिन्दी में रचित 23गीतों और ग़ज़लों को भी संग्रह में शामिल किया गया है.लाला जी ने कविता की हर विधा में लिखा. उनकी 38 क्षणिकाओं का भी इसमें समावेश है. इन रचनाओं के अलावा उनके द्वारा समय -समय पर रचित कई मुक्तकों, दोहों और कुंडलियों को भी संग्रह में शामिल किया गया है. पुस्तक का शीर्षक भले ही ‘बूँद-बूँद सागर’ है लेकिन इसे ‘ बूँद-बूँद महासागर’ कहा जाना चाहिए, क्योंकि इसकी हर बूँद में यानी हर कविता में कवि की भावनाओं का सागर लहराता हुआ लगता है.
लाला जी इस भौतिक संसार में नहीं हैं. अपनी 93 साल की ज़िन्दगी के सफ़र में उन्होंने लगभग 77 साल साहित्य साधना में लगा दिए थे. उनका जन्म 17 दिसम्बर 1920 में जगदलपुर (बस्तर )में हुआ था और जगदलपुर में ही 14अगस्त 2013को उनका निधन हो गया. संसार से उनके जाने के बाद,घर पर उनकी बिखरी पड़ी रचनाओं को सहेजने और सम्पादित कर पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाने का सराहनीय कार्य उनके अनुज स्वर्गीय केशव लाल श्रीवास्तव के सुपुत्र विनय कुमार श्रीवास्तव ने किया है.
विनय जी के सम्पादन में ‘बूँद -बूँद सागर’ को मिलाकर लाला जी की चार किताबें छप चुकी हैं. इनमें से तीन हैं (1) बिखरे मोती (2) आंचलिक कविताएँ :समग्र ‘ और (3) बच्चों की कविताओं का संकलन ‘बाबा की भेंट ‘ .इन संकलनों में लाला जी की अप्रकाशित रचनाओं के अलावा समय -समय पर विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी रचनाएँ भी शामिल की गयीं है, जिनमें प्रकाशन तिथि का उल्लेख भी यथासंभव किया गया है.
पुस्तक ‘बूँद -बूँद सागर ‘ सम्पादकीय वक्तव्य, लाला जी के जीवन परिचय, उनकी साहित्यिक उपलब्धियाँ, वरिष्ठ जनों के अभिमत आदि को मिलाकर 261 पेज की है. इसमें पेज 57 से 261 तक लाला जी की कविताएँ शामिल हैं.लिटिल बर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित यह किताब 299 रूपए की है.
संग्रह में उनकी पहली कविता है -बूँद भर की प्यास. यह कविता साप्ताहिक ‘वीर’ में 26 अप्रैल 1947 में और मासिक ‘संकल्प रथ ‘के मार्च 2001के अंक में छपी थी. कवि कहते हैं कि मनुष्य की प्यास (चाहत)तो बूँद भर की होती है, लेकिन उसकी अभिलाषा समुद्र को भी सोख लेना चाहती है. देखिए –

  • बूँद भर की प्यास!
    पर समुंदर सोख लेने की
    अमिट अभिलाष.
    भ्रान्त नौका,श्रान्त नाविक,
    क्षीण रे पतवार.
    पार जाने की बड़ी ज़िद
    और जलधि अपार.
    एक सुख की चाह में
    कितने सुखों का नाश,
    बूँद भर की प्यास!*

लाला जी आज इंसानों की भीड़ में अकेलेपन का शिकार हो रहे इंसानों के लिए भी चिंतित हैं. संग्रह में शामिल ‘बढ़त’ शीर्षक कविता में उनकी यह गहरी चिन्ता उभर कर सामने आयी है –

 भीड़ इतनी बढ़ी,इतनी बढ़ी, 
कि सड़कें सब संकुचित हो गयीं.
और आदमी अकेला पड़ गया.
कोलाहल इतना बढ़ा
कि शांति कोलाहल को समर्पित हो गयी.
सम्पर्क इतना बढ़ा कि
अपने आप से भेंटने के लिए
किसी के पास कोई अवसर
अब नहीं रह गया.*

यह कविता विजय सिंह द्वारा सम्पादित जगदलपुर की साहित्यिक पत्रिका ‘सूत्र ‘के आठवें अंक (दिसम्बर 1999-फरवरी 2000)में प्रकाशित हुई थी. लालाजी की कई छोटी अतुकांत कविताएँ व्यंग्यात्मक भी हैं. उदाहरण के लिए ‘राजनीति’ शीर्षक कविता का यह अंश –

नींद न आयी, सपने आए. प्यार न आया,अपने आए. पाँच बरस में एक बार वे घर -घर माला जपने आए.

कवि की व्यंग्य -दृष्टि ‘धत्तेरे की ‘ शीर्षक इस कविता को देखिए –

 चोर-चोर मौसेरे भाई,
  धत्तेरे की.
 बँटवारे में हाथा पाई,
 धत्तेरे की.
 साँठ-गाँठों में, लफ़्फ़ाजी में 
 पहला नम्बर -
  दो नम्बर की करें कमाई,
  धत्तेरे की.
   गला काटते लेकिन 

गला जुड़ा रह जाता,
इसको कहते हाथ -सफाई,
धत्तेरे की.
राई को पर्वत करने की
बात लद गयी,
धत्तेरे की.*

लालाजी ने अपने मुक्तकों से आज के जमाने के लोगों की राजनीतिक प्रवृत्तियों को भी व्यंग्य का निशाना बनाया उनके छह मुक्तक ‘कुर्सियाँ ‘शीर्षक से हास्य -व्यंग्य प्रधान सचित्र मासिक नोंक-झोंक ‘के नवंबर 1962 के अंक में प्रकाशित हुए थे. उनमें से दो मुक्तक देखिए –


(1)
दिमाग जो उड़ा तो ‘एरोप्लेन’ हो गया,
दिल जो चला तो चलते -चलते ट्रेन हो गया.
हरगिज वो आदमी का कभी हो नहीं सकता,
चेयर का हो गया जो ‘चेअर मेन’ हो गया


(2)
उस आदमी ने अपना ठिकाना बना लिया,
उस आदमी ने अपना जमाना बना लिया.
बड़े-बड़े निशांबाज उससे डर गए,
कुर्सी को जिसने अपना निशाना बना लिया.


साहित्य के तपस्वी लाला जी ने हिन्दी ग़ज़लों में भी बहुत अच्छे प्रयोग किए हैं.उनकी छोटी -छोटी कुछ गज़लें इस संग्रह में भी हैं. उनमें से एक –

*हर मुश्किल, मुश्किल ही तो है, 
 कितनी झेलें, दिल ही तो है.
 ताड़ पिलाता डट कर ताड़ी,
 तिल का क्या है, तिल ही तो है.
 जब -जब आयी बाढ़ नदी में, 
 ले डूबा साहिल ही तो है. 
 क्यों न लगायें लोग कहकहे, 
 कविता की महफिल ही तो है.
  रोती है, रोये मनुष्यता,
 रोने के काबिल ही तो है.*

उनकी हलबी कविताओं का हिन्दी रूपांतर भी ‘बूँद-बूँद सागर’ में है, जैसे –
* सूरज रे भाई सूरज,
उसकी क्या शाम,
उसकी क्या सुबह,
दोनों उसके लिए बराबर हैं.
शाम का जो रंग,
सुबह का भी वही रंग,
तभी तो वह सूर्य है,
तभी तो वह उजेला बाँटता है.*
बस्तर के ओड़िशा से लगे हुए इलाकों में भतरी लोकभाषा का भी प्रचलन है. लालाजी ने ‘भतरी’ में भी कविताएँ लिखीं. जैसे ‘कुल्हाड़ी ‘शीर्षक उनकी कविता का एक अंश, जिसमें तीखा व्यंग्य भी है —
वह लकड़ी फाड़ती है, पेट पालती है. किसी के पेट को नहीं मारती. किसी जलसे में जाकर फीता नहीं काटती. इसीलिए वह कंधे पर बैठती है. कुल्हाड़ी कठोर है, परंतु वह डाकू नहीं है, हमलावर नहीं है. डाकू है आदमी, हत्यारा है आदमी. कुल्हाड़ी किसी को नहीं काटती काटता-मारता है आदमी.

पुस्तक के लगभग आठ पेज में संग्रह के सम्पादक विनय कुमार श्रीवास्तव ने लाला जगदलपुरी की साहित्यिक उपलब्धियों का विस्तृत विवरण दिया है. इसमें उनकी प्रकाशित कृतियों का भी उल्लेख है, जिनसे ज्ञात होता है कि वे न सिर्फ़ एक कवि थे, बल्कि बहुत अच्छे गद्य-शिल्पी भी थे. आदिवासी बहुल समग्र बस्तर अंचल के इतिहास और आंचलिक लोक संस्कृति के भी वे बहुत अच्छे जानकार थे. उनकी प्रकाशित काव्य पुस्तकों में आंदोलन प्रकाशन, जगदलपुर द्वारा प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह ‘मिमियाती ज़िन्दगी -दहाड़ते परिवेश (वर्ष 1983),आकृति प्रकाशन जगदलपुर द्वारा प्रकाशित ‘ज़िन्दगी के लिए जूझती ग़ज़लें (वर्ष 2005) और आंचलिक कविताएँ (वर्ष 2005) आदि शामिल हैं. गद्य साहित्य के अंतर्गत मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल द्वारा वर्ष 1994 में उनकी पुस्तक ‘बस्तर: इतिहास एवं संस्कृति ‘का प्रकाशन किया था. वर्ष 1972 में लोक चेतना प्रकाशन, जबलपुर (मध्यप्रदेश) से उनके हलबी लोक कथा संग्रह का प्रकाशन हुआ था.
लाला जगदलपुरी की रचनाओं के विशाल संसार में विचरण करने पर उनके जैसे साहित्य -महर्षि के व्यापक जीवन -अनुभवों को गहराई से महसूस किया जा सकता है. उन्हें विनम्र नमन.

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