‘बाल गृह’ नहीं, अपनत्व का घर: अब स्थानीय पहचान से बदले जाएंगे संरक्षण गृहों के नाम

यह समाचार साझा करें

WhatsApp Facebook X

पढ़ने की सुविधा

अपनी सुविधा के अनुसार अक्षर और कंट्रास्ट चुनें।

अक्षर आकार

बाल संरक्षण संस्थाओं को सकारात्मक पहचान देने आयोग की पहल, 21 सितंबर तक जिलों से मांगी गई नामों की सूची

रायपुर, 2 सितंबर 2026। प्रदेश के बाल एवं बालिका संरक्षण गृह और बाल संप्रेक्षण गृह अब अपनी औपचारिक और संस्थागत पहचान से अलग स्थानीय संस्कृति, प्रकृति और लोक परंपरा से जुड़े नामों से पहचाने जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इन संस्थाओं के नामों में बदलाव की पहल की है। आयोग ने महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र भेजकर जिलों से सकारात्मक और बच्चों में अपनत्व की भावना पैदा करने वाले नामों के प्रस्ताव मंगाने का आग्रह किया है।

आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा की पहल पर शुरू की गई इस कवायद का उद्देश्य केवल नाम बदलना नहीं, बल्कि बाल संरक्षण संस्थाओं से जुड़ी बच्चों की सामाजिक और मानसिक पहचान को सकारात्मक बनाना है।

नाम का असर बच्चों की सोच पर

आयोग का मानना है कि किसी संस्था का नाम वहां रहने वाले बच्चों के मनोभाव पर असर डाल सकता है। ऐसे में ‘बाल गृह’, ‘संप्रेक्षण गृह’ जैसे प्रशासनिक और औपचारिक नाम बच्चों को संस्था से भावनात्मक रूप से जोड़ने के बजाय अलगाव या हीनभावना का एहसास करा सकते हैं।

इसके विपरीत ऐसे नाम, जिनमें सुरक्षा, सम्मान, प्रकृति, उम्मीद और अपनत्व का भाव हो, बच्चों को संस्था को सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि अपने सुरक्षित घर के रूप में देखने में मदद कर सकते हैं।

जम्मू के ‘पलाश’ और ‘परिषा’ का उदाहरण

आयोग ने जम्मू में बाल संरक्षण संस्थाओं के लिए इस्तेमाल किए जा रहे ‘पलाश’ और ‘परिषा’ जैसे नामों का उदाहरण दिया है। इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी संस्थाओं को ऐसे नाम देने का सुझाव दिया गया है, जिनमें सकारात्मकता और गरिमा का भाव हो।

आयोग ने जिलों को नाम तय करते समय स्थानीय भाषा, संस्कृति, प्रकृति, लोक परंपरा और क्षेत्रीय पहचान को प्राथमिकता देने की बात कही है।

बच्चों से भी पूछे जाएंगे नाम

इस पहल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि नामकरण केवल सरकारी स्तर पर तय नहीं होगा। आयोग ने संबंधित संस्थाओं में रहने वाले बच्चों, देखरेखकर्ताओं और अन्य हितधारकों से भी नामों को लेकर सुझाव लेने की अनुशंसा की है।

इससे बच्चे अपनी संस्था की नई पहचान तय करने की प्रक्रिया में सीधे शामिल होंगे और उस नाम से उनका भावनात्मक जुड़ाव भी बढ़ सकता है।

21 सितंबर तक मांगी कार्रवाई रिपोर्ट

आयोग ने महिला एवं बाल विकास विभाग से आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर जिलों से प्रस्तावित नामों की सूची मंगाने और इस संबंध में की गई कार्रवाई की जानकारी आयोग को 21 सितंबर 2026 तक लिखित रूप से उपलब्ध कराने का आग्रह किया है।

अब देखना होगा कि जिलों से किस तरह के नाम सामने आते हैं और उनमें छत्तीसगढ़ की स्थानीय भाषाओं, प्रकृति और लोक संस्कृति की कितनी झलक दिखाई देती है।

नाम बदलने से आगे की पहल

बाल संरक्षण संस्थाओं के नाम बदलने की यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका केंद्र संस्था नहीं, वहां रहने वाला बच्चा है। यदि नामकरण की प्रक्रिया में बच्चों की राय को वास्तविक महत्व दिया जाता है तो यह प्रशासनिक बदलाव से आगे बढ़कर उन्हें अपनी पहचान और निर्णय प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास बन सकता है।

आयोग की पहल के बाद अब जिलों के सामने चुनौती केवल नए नाम सुझाने की नहीं, बल्कि ऐसे नाम चुनने की होगी जिन्हें बच्चे बोझ या पहचान के तौर पर नहीं, अपनत्व के तौर पर स्वीकार कर सकें।

पाठकों की पसंद

सबसे अधिक पढ़े गए

पिछले 7 दिनों के आधार पर