रायपुर, 18 अगस्त। वाय के न्यूज। छत्तीसगढ़ के बस्तर में नारियल की खेती अब पारंपरिक कृषि के साथ किसानों के लिए आय का नया विकल्प बनती जा रही है। नारियल विकास बोर्ड के कोंडागांव स्थित प्रदर्शन-सह-बीज उत्पादन फार्म (डीएसपी) की पहल और तकनीकी मार्गदर्शन से बस्तर पठार में नारियल आधारित बहुस्तरीय खेती को बढ़ावा मिल रहा है।
नारियल को भारत में ‘कल्पवृक्ष’ यानी जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले वृक्ष के रूप में जाना जाता है। देश में करीब 1 करोड़ किसान और लगभग 3 करोड़ लोग नारियल क्षेत्र पर निर्भर हैं। भारत नारियल उत्पादन में दुनिया में पहले स्थान पर है।
बकावंड के किसान ने अपनाया बहुस्तरीय मॉडल
बस्तर के बकावंड ब्लॉक के 36 वर्षीय एमबीए स्नातक ईशांश सिंह राठौर ने नारियल आधारित खेती का मॉडल विकसित किया है। किसान परिवार से आने वाले राठौर ने कॉरपोरेट क्षेत्र में काम करने के बाद खेती का रुख किया और नारियल विकास बोर्ड से तकनीकी मार्गदर्शन लेकर व्यवस्थित तरीके से नारियल की खेती शुरू की।
उन्होंने अपने खेत में करीब 2,500 नारियल के पेड़ लगाए हैं। इनमें मुख्य रूप से बौनी किस्में शामिल हैं और लगभग 500 पेड़ों से उत्पादन शुरू हो चुका है।
नारियल के साथ उन्होंने बहुस्तरीय फसल प्रणाली अपनाई है। इसके तहत करीब 4,000 अनानास, 800 ड्रैगन फ्रूट, 1,000 आम और 600 सिट्रस के पौधे लगाए गए हैं। इसके अलावा केला, अमरूद, पपीता, लीची, कॉफी, स्ट्रॉबेरी और मौसमी सब्जियों की भी खेती की जा रही है।
बोर्ड के अनुसार इस मॉडल से राठौर को नारियल से सालाना करीब 5 से 6 लाख रुपये तथा अंतरफसलों से लगभग 10 लाख रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है। बस्तर के अन्य किसानों के लिए भी यह मॉडल बहुस्तरीय और विविधीकृत खेती का उदाहरण बन रहा है।
उत्पादन में भारत दुनिया में पहले स्थान पर
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024-25 में भारत में करीब 21.9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लगभग 20,301.22 मिलियन नारियल का उत्पादन हुआ। औसत उत्पादकता 9,249 नारियल प्रति हेक्टेयर रही।
वैश्विक नारियल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 31.24 प्रतिशत बताई गई है। क्षेत्रफल के लिहाज से भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है।
देश में केरल में नारियल का सबसे बड़ा क्षेत्र है। तमिलनाडु उत्पादन में और आंध्र प्रदेश उत्पादकता में आगे है।
निर्यात 7,038 करोड़ रुपये के पार
नारियल क्षेत्र अब केवल कच्चे उत्पाद तक सीमित नहीं है। वर्जिन कोकोनट ऑयल, नारियल दूध, नारियल पानी और सक्रिय कार्बन जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों का निर्यात बढ़ रहा है।
वर्ष 2025-26 में भारत से नारियल उत्पादों का निर्यात 7,038.35 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले आंकड़े 4,349.03 करोड़ रुपये की तुलना में करीब 62 प्रतिशत अधिक है। अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका, जर्मनी, रूस, तुर्किये, बेल्जियम, ब्रिटेन और नीदरलैंड प्रमुख बाजारों में शामिल हैं।
किसानों के लिए बढ़ा कोपरा एमएसपी
नारियल उत्पादकों को बेहतर मूल्य दिलाने के लिए 2026 सीजन में कोपरा का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी बढ़ाया गया है। मिलिंग कोपरा का एमएसपी 12,027 रुपये प्रति क्विंटल और बॉल कोपरा का 12,500 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। यह 2025 की तुलना में क्रमशः 445 रुपये और 400 रुपये प्रति क्विंटल अधिक है।
नए क्षेत्र और पुराने बागानों के जीर्णोद्धार पर जोर
नारियल विकास बोर्ड के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री तैयार करने, नए क्षेत्रों में खेती बढ़ाने, उत्पादकता सुधारने और पुराने तथा रोगग्रस्त बागानों के जीर्णोद्धार पर काम किया जा रहा है।
वर्ष 2025-26 में करीब 2,175 हेक्टेयर नया क्षेत्र नारियल की खेती के तहत लाया गया, जबकि 1,672 हेक्टेयर क्षेत्र का जीर्णोद्धार किया गया।
केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित ‘नारियल संवर्धन योजना’ के तहत गुणवत्तापूर्ण पौध उत्पादन, नए क्षेत्रों में विस्तार, पुराने बागानों का पुनर्रोपण, फसल स्वास्थ्य प्रबंधन और प्रसंस्करण एवं निर्यात को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।
कौशल और उद्यमिता पर भी जोर
नारियल विकास बोर्ड किसानों के अलावा युवाओं को भी इस क्षेत्र से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। ‘फ्रेंड्स ऑफ कोकोनट ट्री’ कार्यक्रम के तहत पेड़ पर चढ़ने, पौध संरक्षण और उद्यमिता से जुड़े प्रशिक्षण दिए जाते हैं। इसके अलावा नारियल हस्तशिल्प, नीरा निष्कर्षण और प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इस तरह बस्तर में नारियल की खेती का प्रयोग पारंपरिक कृषि से आगे बढ़कर बहुस्तरीय खेती, मूल्य संवर्धन और ग्रामीण आजीविका से जुड़ने की संभावना दिखा रहा है। बकावंड के किसान ईशांश सिंह राठौर का मॉडल इस बदलाव का एक उदाहरण बनकर सामने आया है।



