बच्चों की भी, और बड़ों की भी, ‘विज्ञान प्रगति’: एक बेहतरीन पत्रिका के 75 साल

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1952 में शुरू हुई हिंदी की लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका ने देखे रेडियो से इंटरनेट और अब एआई तक के दौर; भारत में विज्ञान को जनभाषा में पहुंचाने वाले प्रकाशनों की भी लंबी कहानी

नई दिल्ली, 23 अगस्त। वाय के न्यूज। 1952 में जब ‘विज्ञान प्रगति’ का पहला अंक निकला, तब भारत की वैज्ञानिक दुनिया आज की तरह आम लोगों की जेब में नहीं थी। अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, कृषि अनुसंधान, चिकित्सा और औद्योगिक अनुसंधान प्रयोगशालाओं और विशेषज्ञ संस्थानों की दुनिया में थे। आम पाठक तक विज्ञान पहुंचाने के लिए किताबें और पत्रिकाएं ही प्रमुख माध्यम थीं। अब 75 साल बाद वही विज्ञान मोबाइल स्क्रीन पर है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ सेकंड में वैज्ञानिक जानकारी को हजारों लोगों तक पहुंचा सकती है।

इसी बदलाव के बीच सीएसआईआर-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR) ने 22 अगस्त को ‘विज्ञान प्रगति’ की प्लेटिनम जयंती मनाई। समारोह में पत्रिका की यात्रा के साथ डिजिटल तकनीक, नए मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में विज्ञान संचार की बदलती जरूरतों पर चर्चा हुई।

1952 में क्यों जरूरी थी एक हिंदी विज्ञान पत्रिका?

‘विज्ञान प्रगति’ की शुरुआत स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में हुई। देश में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान के लिए संस्थागत ढांचा तैयार हो रहा था। वैज्ञानिक अनुसंधान बढ़ रहा था, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा विशेषज्ञों और अंग्रेजी भाषा तक सीमित था।

ऐसे समय में विज्ञान को हिंदी में सरल भाषा में प्रस्तुत करने वाली पत्रिका का महत्व केवल प्रकाशन का नहीं था। यह वैज्ञानिक संस्थानों और सामान्य पाठक के बीच एक पुल थी।

CSIR के प्रकाशन तंत्र से शुरू हुई ‘विज्ञान प्रगति’ ने वैज्ञानिक विषयों को सामान्य पाठक के लिए समझने योग्य बनाने का काम किया। इसके लेखों में अंतरिक्ष और भौतिकी से लेकर स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण और रोजमर्रा की तकनीक तक के विषय शामिल होते रहे।

विज्ञान को लोकप्रिय बनाने वाली अकेली पत्रिका नहीं

भारत में लोकप्रिय विज्ञान लेखन की कहानी केवल ‘विज्ञान प्रगति’ की कहानी नहीं है।

अंग्रेजी में ‘Science Reporter’ ने 1964 से लोकप्रिय विज्ञान पत्रकारिता को एक अलग पहचान दी। वैज्ञानिक संस्थानों, शोध और नई तकनीक से जुड़ी खबरों को सामान्य पाठक तक पहुंचाने में इस पत्रिका की लंबी भूमिका रही।

भारतीय भाषाओं में भी विज्ञान पत्रिकाओं और पुस्तकों का संसार विकसित हुआ। विभिन्न संस्थानों और प्रकाशकों ने बच्चों और युवाओं के लिए विज्ञान साहित्य प्रकाशित किया। विज्ञान कथा ने इस संसार को एक अलग आयाम दिया।

यहां विज्ञान केवल ‘यह कैसे काम करता है’ तक सीमित नहीं रहा। ‘भविष्य कैसा होगा?’, ‘रोबोट क्या कर सकते हैं?’, ‘मनुष्य दूसरे ग्रह पर रह सकता है?’ जैसे सवाल भी विज्ञान लेखन और विज्ञान कथा का हिस्सा बने।

पत्रिका से पहले और पत्रिका के बाद

विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रेडियो भी रहा। आकाशवाणी के विज्ञान कार्यक्रमों ने वैज्ञानिक जानकारी को उन इलाकों तक पहुंचाया जहां विज्ञान की किताबें और पत्रिकाएं आसानी से उपलब्ध नहीं थीं।

फिर दूरदर्शन आया। वैज्ञानिक प्रयोगों को स्क्रीन पर दिखाने का दौर शुरू हुआ। विज्ञान संचार में चित्र और प्रदर्शन की भूमिका बढ़ी।

इंटरनेट ने इस पूरी व्यवस्था को बदल दिया। अब मासिक पत्रिका का इंतजार जरूरी नहीं था। वैज्ञानिक संस्थान अपनी वेबसाइट पर जानकारी डाल सकते थे और मीडिया उसे तत्काल पाठकों तक पहुंचा सकता था।

सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया।

लेकिन एआई ने बदल दिया है सवाल

आज विज्ञान संचार के सामने चुनौती सिर्फ विज्ञान को सरल भाषा में समझाने की नहीं है। सही और गलत वैज्ञानिक जानकारी को अलग करना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आने से सामग्री तैयार करना आसान हुआ है। किसी वैज्ञानिक विषय पर कुछ ही क्षणों में लेख, चित्र या वीडियो तैयार हो सकता है। लेकिन उसमें इस्तेमाल जानकारी का स्रोत क्या है, आंकड़े सही हैं या नहीं और वैज्ञानिक निष्कर्ष को सही संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है या नहीं—यह जांच अभी भी जरूरी है।

‘विज्ञान प्रगति’ की प्लेटिनम जयंती के कार्यक्रम में ‘विज्ञान लेखन में मानवीय रचनात्मकता और मशीन इंटेलिजेंस (AI)’ विषय पर इसी बदलते परिदृश्य पर चर्चा हुई। कार्यक्रम में विज्ञान कथा और विज्ञान कार्टून प्रतियोगिताओं के परिणाम भी घोषित किए गए।

75 साल बाद भी पाठक बदल गया, जिज्ञासा नहीं

समारोह से एक दिन पहले दिल्ली के विभिन्न स्कूलों के 50 से अधिक विद्यार्थियों के लिए विज्ञान कविता लेखन, कार्टून और विज्ञान प्रश्नोत्तरी ‘जिज्ञासा’ आयोजित की गई। विद्यार्थियों ने विज्ञान और कल्पना के संबंध पर संवाद में भी हिस्सा लिया।

मुख्य समारोह में ‘विज्ञान प्रगति’ का अगस्त 2026 का विशेषांक तथा ‘मानव स्वास्थ्य और निरोगी जीवन’ और ‘रोमांचक विज्ञान कथाएं’ पुस्तकों का विमोचन हुआ। पत्रिका की संपादकीय और डिजाइन टीम को सम्मानित किया गया।

यह आयोजन इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि 75 साल पहले जिस माध्यम से विज्ञान को पाठक तक पहुंचाया गया था, आज उसी काम के लिए पत्रिका के साथ वीडियो, वेबसाइट, सोशल मीडिया और एआई जैसे कई नए माध्यम मौजूद हैं।

कागज से स्क्रीन तक

1952: ‘विज्ञान प्रगति’ की शुरुआत
1964: ‘Science Reporter’ का प्रकाशन शुरू
रेडियो दौर: वैज्ञानिक जानकारी और कार्यक्रमों की व्यापक पहुंच
दूरदर्शन दौर: प्रयोग और विज्ञान को दृश्य माध्यम मिला
इंटरनेट दौर: विज्ञान सामग्री तत्काल उपलब्ध
सोशल मीडिया दौर: विज्ञान की पहुंच और गति दोनों बढ़ीं
एआई दौर: सामग्री निर्माण तेज, लेकिन तथ्य-जांच की चुनौती भी बढ़ी

75 साल की इस यात्रा में माध्यम कई बार बदला, लेकिन विज्ञान को आम भाषा में समझाने की जरूरत बनी रही। ‘विज्ञान प्रगति’ की प्लेटिनम जयंती इसलिए एक पत्रिका की वर्षगांठ से आगे बढ़कर भारत में लोकप्रिय विज्ञान संचार के बदलते माध्यमों को देखने का अवसर भी है।

स्रोत: CSIR-NIScPR/PIB.

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