सीएसआईआर-सीआरआरआई ने पहली बार बड़े स्तर पर आरएपी तकनीक का प्रदर्शन किया; नई गिट्टी और बिटुमेन की जरूरत घटाने में मदद मिलेगी
नई दिल्ली, 3 सितंबर, वाय के न्यूज़।
सड़क निर्माण में पुरानी सड़क की सामग्री को दोबारा इस्तेमाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कामयाबी मिली है। सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीआरआरआई), ओरिएंटल स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स प्राइवेट लिमिटेड और ओम्स इंडिया ने राष्ट्रीय राजमार्ग-716 के चेन्नई-तिरुपति पैकेज-I पर सड़क की एक परत में 60 प्रतिशत रीक्लेम्ड अस्फाल्ट पेवमेंट (आरएपी) का सफल परीक्षण किया।
इस तकनीक में पुरानी सड़क से निकली सामग्री को फेंकने के बजाय उसे प्रोसेस कर नई सड़क बनाने में फिर इस्तेमाल किया जाता है। इससे नई गिट्टी और बिटुमेन की जरूरत कम हो सकती है और सड़क निर्माण से निकलने वाला कचरा भी घटेगा।
पुरानी सड़क को बनाया जाएगा ‘संसाधन भंडार’
आरएपी में पुरानी सड़क की गिट्टी और बिटुमेन मौजूद होते हैं। इन्हें वैज्ञानिक तरीके से निकालकर, जांचने और दोबारा उपयोग के योग्य बनाने के बाद नई सड़क की सामग्री में शामिल किया जा सकता है।
60 प्रतिशत आरएपी के इस्तेमाल का मतलब है कि नई सड़क के मिश्रण में बड़ी मात्रा में सामग्री पुरानी सड़क से ही प्राप्त की गई। इससे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और निर्माण लागत व पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
रीजुबिट तकनीक से पुराने बिटुमेन को किया सक्रिय
इस परीक्षण में रीजुबिट (REJUBIT) नाम की स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसे सीएसआईआर-सीआरआरआई और ओम्स इंडिया ने मिलकर विकसित किया है।
यह तकनीक पुरानी सड़क में मौजूद बिटुमेन के गुणों को फिर से सक्रिय करने में मदद करती है, जिससे अधिक मात्रा में पुरानी सड़क की सामग्री को नई सड़क में इस्तेमाल किया जा सके।
सड़क निर्माण की पूरी प्रक्रिया का प्रदर्शन
एनएच-716 पर हुए प्रदर्शन में पुरानी सड़क की सामग्री निकालने से लेकर उसके प्रसंस्करण, जांच, मिश्रण तैयार करने, हॉट-मिक्स प्लांट में उत्पादन, सड़क पर बिछाने और मशीनों से दबाने तक की पूरी प्रक्रिया दिखाई गई।
सीएसआईआर-सीआरआरआई की परियोजना प्रमुख डॉ. अंबिका बहल ने आरएपी को सड़क क्षेत्र का ‘काला सोना’ बताया। उनके अनुसार पुरानी सड़कों में मौजूद गिट्टी और बिटुमेन दोबारा उपयोग किए जा सकने वाले मूल्यवान संसाधन हैं।
हरित और चक्रीय सड़क निर्माण की ओर कदम
सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. चालुमुरी रवि शेखर ने कहा कि आरएपी को केवल कचरा नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग संसाधन के रूप में देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस परीक्षण से प्रयोगशाला में विकसित तकनीक को वास्तविक राजमार्ग निर्माण में लागू करने का अनुभव मिला है।
चेन्नई स्थित राजमार्ग अनुसंधान केंद्र के निदेशक इंजीनियर ए. वेंकटाचलम ने भी इस प्रदर्शन को टिकाऊ और संसाधन-कुशल सड़क निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
इस परीक्षण का उद्देश्य भारत में ज्यादा मात्रा में पुरानी सड़क सामग्री के सुरक्षित और वैज्ञानिक पुन: उपयोग के लिए जरूरी तकनीकी अनुभव और प्रमाण जुटाना है।
