दोबारा नियुक्त अधिकारियों को अलग वर्ग माना जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

यह समाचार साझा करें

WhatsApp Facebook X

पढ़ने की सुविधा

अपनी सुविधा के अनुसार अक्षर और कंट्रास्ट चुनें।

अक्षर आकार

छठे वेतन आयोग के समान वेतनमान की मांग खारिज, पुनर्नियुक्त अधिकारियों के लिए अलग वेतन व्यवस्था को सही ठहराया

नई दिल्ली, 16 अगस्त। वाय के न्यूज। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेवानिवृत्ति के बाद दोबारा नियुक्त किए गए अधिकारियों को नियमित सरकारी अधिकारियों से अलग वर्ग माना जा सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसी अलग श्रेणी बनाए जाने को केवल इस आधार पर संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन नहीं माना जा सकता कि दोनों वर्ग सरकारी सेवा में हैं।

जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आर.के. यादव एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में यह फैसला सुनाया। मामला केंद्रीय सरकारी औद्योगिक न्यायाधिकरण-सह-श्रम न्यायालयों के पुनर्नियुक्त पीठासीन अधिकारियों के वेतनमान से जुड़ा था।

छठे वेतन आयोग का लाभ मांगा था

याचिकाकर्ताओं ने अन्य केंद्रीय न्यायाधिकरणों के अधिकारियों के समान छठे केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतनमान देने की मांग की थी। उनका कहना था कि उन्हें जिला न्यायपालिका के समान वेतनमान दिया गया है, इसलिए अन्य न्यायाधिकरणों के पीठासीन अधिकारियों को मिले संशोधित वेतनमान से उन्हें वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

केंद्र सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता नियमित नियुक्त अधिकारी नहीं, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्त पेंशनभोगी हैं। उनकी पुनर्नियुक्ति और वेतन निर्धारण पर अलग नियम लागू होते हैं।

पुनर्नियुक्ति और नियमित सेवा में अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नियमित नियुक्त अधिकारियों और सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्नियुक्त अधिकारियों की सेवा की प्रकृति अलग है। पुनर्नियुक्त अधिकारी पहले ही अपनी मूल सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके होते हैं और बाद में उन्हें एक निश्चित अवधि तथा लागू शर्तों के आधार पर दोबारा नियुक्त किया जाता है।

अदालत ने कहा कि इस अंतर के आधार पर वेतन निर्धारण के लिए दोनों को अलग वर्ग में रखना अपने आप में भेदभाव नहीं है। सरकार पुनर्नियुक्त पेंशनभोगियों के लिए लागू नियमों के तहत उनके वेतन का निर्धारण कर सकती है।

अनुच्छेद 14 और 16 का तर्क नहीं माना

पीठ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 हर परिस्थिति में समान व्यवहार की गारंटी नहीं देता। यदि दो वर्गों के बीच वास्तविक अंतर है और वर्गीकरण का संबंधित उद्देश्य से तार्किक संबंध है, तो अलग व्यवहार संवैधानिक रूप से स्वीकार्य हो सकता है।

अदालत ने इसी आधार पर पुनर्नियुक्त अधिकारियों और नियमित अधिकारियों के बीच किए गए वर्गीकरण को उचित माना।

वेतनमान तय करना सरकार का क्षेत्र

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वेतनमान और सेवा शर्तों का निर्धारण मुख्य रूप से सरकार और विशेषज्ञ निकायों के क्षेत्र में आता है। अदालत सामान्यतः ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती, जब तक निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाना या संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध न हो।

पीठ ने याचिकाकर्ताओं की छठे वेतन आयोग के वेतनमान का लाभ देने की मांग को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी।

फैसले में पुनर्नियुक्त अधिकारियों की सेवा की प्रकृति और नियमित अधिकारियों से उनके अंतर को वेतनमान संबंधी वर्गीकरण के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।

पाठकों की पसंद

सबसे अधिक पढ़े गए

पिछले 7 दिनों के आधार पर