NALSAR विवाद: विरोध, आदेश, फटकार और फिर माफी तक

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छात्रों के विरोध के बाद 2026 बैच के नामांकन पर रोक का निर्देश, सुप्रीम कोर्ट ने BCI की कार्रवाई पर उठाए सवाल; आदेश वापस लेने के बाद अध्यक्ष ने मांगी माफी

नई दिल्ली, 16 अगस्त। वाय के न्यूज। राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, हैदराबाद (NALSAR) के 2026 बैच के छात्रों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के बीच शुरू हुआ विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, याचिकाओं, BCI के आदेश वापस लेने और उसके अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा की सार्वजनिक माफी तक पहुंच चुका है। विवाद की शुरुआत मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने के विरोध से हुई थी। इसके बाद BCI ने छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की और 2026 बैच के स्नातकों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर रोक का निर्देश दिया।

शुरुआत दीक्षांत समारोह को लेकर विरोध से

NALSAR के छात्रों के एक वर्ग ने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने को लेकर आपत्ति जताई और विरोध किया। छात्रों के इस विरोध के बाद BCI ने मामले में हस्तक्षेप किया।

BCI की ओर से विश्वविद्यालय के कुलपति से उन छात्रों के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी गई, जिन्होंने कथित तौर पर अभियान शुरू किया, उसका आयोजन किया या छात्रों को उसमें शामिल किया। इसके साथ ही 2026 में स्नातक होने वाले NALSAR के किसी भी छात्र के राज्य बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया।

BCI के आदेश से बढ़ा विवाद

BCI की इस कार्रवाई के बाद मामला विश्वविद्यालय और छात्रों के विवाद से निकलकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, छात्र अधिकार और BCI के अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवालों तक पहुंच गया।

NALSAR के पूर्व छात्रों और अन्य पक्षों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गईं। याचिकाओं में BCI के अब वापस लिए जा चुके सर्कुलर की वैधता पर सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया कि BCI की कार्यकारी समिति ने इस निर्णय पर विचार किया था या नहीं और आदेश जारी करने से पहले निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं।

400 से अधिक NALSAR पूर्व छात्रों ने भी BCI की कार्रवाई की आलोचना करते हुए खुला पत्र जारी किया। इसमें BCI के सर्कुलरों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता के प्रति चिंता का विषय बताया गया।

BCI ने वापस लिया नामांकन रोकने का आदेश

विवाद बढ़ने के बाद BCI ने अपना पहले का निर्देश वापस ले लिया। इसके साथ 2026 बैच के सभी NALSAR स्नातकों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन का रास्ता साफ हो गया।

BCI ने यह भी कहा कि 2026 बैच के छात्रों की ओर से किसी तरह की गड़बड़ी या आंदोलन में भूमिका नहीं पाई गई और उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही बंद कर दी गई।

लेकिन आदेश वापस लिए जाने के बावजूद मामला खत्म नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने BCI की कार्रवाई पर सुनवाई की।

सुप्रीम कोर्ट में CJI ने BCI से पूछे सवाल

14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने NALSAR मामले की सुनवाई की। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने BCI की कार्रवाई पर नाराजगी जताई और छात्रों तथा फैकल्टी के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर जोर दिया। BCI की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित सर्कुलर वापस लिया जा चुका है। कोर्ट ने इसके बावजूद मामले को सुनते हुए BCI से उसके कदम पर जवाब मांगा।

CJI ने यह सवाल भी उठाया कि छात्रों को अपनी असहमति व्यक्त करने से कौन रोक सकता है। अदालत की टिप्पणी का मूल संदेश यह था कि शांतिपूर्ण विरोध को केवल इसलिए दंडित नहीं किया जा सकता क्योंकि वह विरोध किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ हो।

मामला केवल NALSAR तक सीमित नहीं रहा

विवाद के दौरान बेंगलुरु स्थित NLSIU के छात्रों और पूर्व छात्रों ने भी BCI की कार्रवाई की आलोचना की। NLSIU के छात्रों ने BCI अध्यक्ष से माफी मांगने की मांग की और उनके विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शामिल होने पर भी आपत्ति जताई।

इससे विवाद का दायरा NALSAR के छात्रों से बढ़कर देश के विधि विश्वविद्यालयों के छात्रों और BCI के बीच संबंधों तक पहुंच गया।

BCI अध्यक्ष ने मांगी माफी

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और लगातार आलोचना के बाद BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने 15 अगस्त को कानून के छात्रों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी।

उन्होंने कहा कि छात्रों को अपने विचार रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने पूरे घटनाक्रम पर खेद व्यक्त किया और कहा कि छात्रों और विधि संस्थानों के साथ संवाद के जरिए ऐसे मतभेदों को सुलझाया जाना चाहिए।

NALSAR छात्र परिषद ने माफी को लेकर उठाए सवाल

BCI के आदेश वापस लेने और अध्यक्ष की माफी के बाद भी NALSAR के छात्र संगठन ने विवाद समाप्त नहीं माना। Student Bar Council ने BCI की कार्रवाई की आलोचना करते हुए अध्यक्ष से स्पष्ट माफी की मांग की।

छात्र संगठन का कहना है कि केवल नामांकन रोकने का आदेश वापस लेना पर्याप्त नहीं है और छात्रों तथा फैकल्टी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को भी वापस लिया जाना चाहिए।

विवाद में अब तक क्या हुआ?

पहला चरण: NALSAR छात्रों ने CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में बुलाए जाने का विरोध किया।

दूसरा चरण: BCI ने कुलपति से विरोध में शामिल छात्रों की जानकारी मांगी।

तीसरा चरण: BCI ने 2026 बैच के NALSAR स्नातकों के अधिवक्ता के रूप में नामांकन पर रोक का निर्देश दिया।

चौथा चरण: पूर्व छात्रों और अन्य पक्षों ने BCI की कार्रवाई को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पांचवां चरण: BCI ने अपना नामांकन संबंधी निर्देश वापस लिया और 2026 बैच के खिलाफ कार्यवाही बंद करने की घोषणा की।

छठा चरण: सुप्रीम कोर्ट ने BCI की कार्रवाई पर सवाल उठाए और छात्रों व फैकल्टी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई।

सातवां चरण: BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने 15 अगस्त को कानून छात्रों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी।

अब विवाद के प्रमुख सवाल

घटनाक्रम के बाद मुख्य सवाल BCI के अधिकार क्षेत्र और उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े हैं। इनमें यह भी शामिल है कि किसी विश्वविद्यालय के छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध पर BCI किस सीमा तक कार्रवाई कर सकता है, किसी छात्र के अधिवक्ता के रूप में नामांकन को रोकने का अधिकार किस परिस्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है और ऐसे निर्णय के लिए BCI के भीतर कौन-सी प्रक्रिया अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में BCI के वापस लिए गए सर्कुलर की वैधता और उसके जारी होने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं।

फिलहाल 2026 बैच के NALSAR स्नातकों पर लगाया गया नामांकन संबंधी प्रतिबंध वापस लिया जा चुका है, BCI ने कार्यवाही बंद कर दी है और उसके अध्यक्ष ने माफी मांग ली है। वहीं सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने छात्र विरोध के अधिकार और BCI के हस्तक्षेप की सीमा को इस पूरे घटनाक्रम का प्रमुख कानूनी मुद्दा बना दिया है।

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