चीनी की मिठास में क्यों घुल रही है महंगाई की कड़वाहट?
पड़ताल । केवल कृष्ण। यदा कदा
गन्ने के खेत से पेट्रोल की टंकी तक पहुंची कहानी, रतनजोत के पुराने प्रयोग से बिल्कुल अलग है। लेकिन दोनों प्रयोग एक सवाल छोड़ते हैं—देश की ऊर्जा जरूरत और खाद्य जरूरत के बीच संतुलन कैसे बनेगा?
रायपुर, 22 अगस्त। वाय के न्यूज।एक समय देश में नारा खूब चला था—“डीजल मिलेगा बाड़ी से।” गांवों में रतनजोत लगाने की मुहिम चली। कहा गया कि कम पानी में, बंजर और अनुपयोगी जमीन पर पौधा लगाइए और उसके बीज से तेल निकालकर डीजल का विकल्प तैयार कीजिए।
रतनजोत का प्रयोग बड़े वादों के साथ शुरू हुआ, लेकिन खेत में टिक नहीं पाया।
आज कहानी फिर जैव ईंधन की है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार रतनजोत नहीं, गन्ना है। गन्ने से चीनी भी बनती है और एथेनॉल भी। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर देश तेल आयात पर निर्भरता घटाना चाहता है।
यहीं से एक नया सवाल पैदा हुआ है—
अगर गन्ने से पेट्रोल भी बनना है और चीनी भी, तो फसल कम होने की स्थिति में प्राथमिकता किसे मिलेगी?
और यही सवाल आज चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच महत्वपूर्ण हो गया है।

खेत में गन्ना कम नहीं हुआ, फिर चीनी कम क्यों पड़ी?
पहली नजर में आंकड़े चौंकाते हैं।
देश में गन्ने का उत्पादन पांच साल में लगातार घटा नहीं है। 2022-23 में भारत ने करीब 4905 लाख टन गन्ना पैदा किया था। 2023-24 में यह घटकर करीब 4532 लाख टन और 2024-25 में करीब 4546 लाख टन रहा।
इसलिए यह कहना कि “देश में गन्ना ही नहीं बचा”, सही तस्वीर नहीं है।
असली सवाल है—उस गन्ने से चीनी कितनी बनी?
यहीं कहानी बदल जाती है।
चीनी मिल के लिए सिर्फ गन्ने का वजन महत्वपूर्ण नहीं होता। महत्वपूर्ण यह है कि एक टन गन्ने से कितनी चीनी निकली। इसे शुगर रिकवरी कहते हैं।
मौसम, गन्ने की किस्म, बीमारी, सिंचाई और कटाई के समय में बदलाव रिकवरी को प्रभावित करते हैं।
यानी खेत में गन्ना मौजूद हो सकता है, लेकिन मिल में पहुंचने पर उससे अपेक्षित मात्रा में चीनी न निकले।
महाराष्ट्र और कर्नाटक में मौसम ने बिगाड़ा गणित
देश की चीनी अर्थव्यवस्था में महाराष्ट्र और कर्नाटक की बड़ी भूमिका है।
इन राज्यों में कम बारिश, पानी की कमी और बाद में असामान्य मौसम ने गन्ने की फसल को प्रभावित किया। उत्तर प्रदेश में भी मौसम और गन्ने की बीमारियों का असर उत्पादन और रिकवरी पर पड़ा।
यही कारण है कि देश में गन्ने का कुल उत्पादन अपेक्षाकृत स्थिर रहने के बावजूद चीनी का उत्पादन कमजोर हुआ।
इसका सीधा असर बाजार पर पड़ा।
फिर एथेनॉल की एंट्री
एथेनॉल की कहानी नई नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसकी भूमिका तेजी से बढ़ी है।
सरकार ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य बढ़ाया है। इससे चीनी मिलों को गन्ने से एथेनॉल बनाने का बड़ा बाजार मिला।
अब गन्ने से मिलने वाले उत्पाद के दो रास्ते हैं—
गन्ना → चीनी → बाजार
और
गन्ना → एथेनॉल → पेट्रोल
जब गन्ना भरपूर हो, तो दोनों रास्ते साथ चल सकते हैं।
लेकिन जब फसल कमजोर हो, तब सवाल उठता है कि कितनी चीनी बाजार के लिए बचाई जाए और कितनी मात्रा एथेनॉल में जाए।
एथेनॉल को पूरा दोष देना भी गलत
यहां आंकड़े सावधानी बरतने को कहते हैं।
एथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई चीनी की मात्रा हर साल लगातार नहीं बढ़ी। 2022-23 में करीब 43 लाख टन चीनी एथेनॉल के लिए गई थी। 2023-24 में यह मात्रा करीब 24 लाख टन रही और 2024-25 में करीब 34 लाख टन।
इसलिए आज की चीनी महंगाई को केवल “एथेनॉल ने चीनी खा ली” कहकर समझाना सही नहीं होगा।
मौसम, कम उत्पादन, रिकवरी, त्योहारों की मांग, स्टॉक और बाजार की गतिविधियां भी कीमतों को प्रभावित करती हैं।
सरकार भी मौजूदा कीमत वृद्धि को मुख्यतः कम उत्पादन और बाजार की स्थितियों से जोड़ रही है।
मगर एथेनॉल का सवाल खत्म नहीं होता
यही इस पूरी कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आज एथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल करना सरकार की ऊर्जा नीति का हिस्सा है।
पेट्रोल में एथेनॉल बढ़ने से देश को कच्चे तेल के आयात पर खर्च कम करने में मदद मिलती है। किसानों और चीनी मिलों को भी अतिरिक्त बाजार मिलता है।
इसलिए एथेनॉल का फायदा वास्तविक है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है।
गन्ना पानी मांगने वाली फसल है।
जब पानी पर्याप्त हो और फसल अच्छी हो, तो चीनी और एथेनॉल दोनों निकल सकते हैं। लेकिन सूखे या कमजोर फसल वाले साल में उसी गन्ने को दो हिस्सों में बांटना पड़ता है।
यहीं ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा आमने-सामने दिखाई देने लगती हैं।
रतनजोत ने क्या सिखाया था?
करीब दो दशक पहले भारत ने जैव ईंधन के लिए रतनजोत पर बड़ा दांव लगाया था।
विचार आकर्षक था—बंजर जमीन पर रतनजोत लगाइए, उसके बीज से तेल निकालिए और उसे डीजल में मिलाइए।
लेकिन खेत में अपेक्षित पैदावार नहीं मिली।
जिस पौधे को लगभग बिना पानी और बिना ज्यादा देखभाल के तेल देने वाला बताया गया था, व्यावसायिक उत्पादन के लिए उसे भी पानी, देखभाल, श्रम और बाजार की जरूरत पड़ी।
सबसे बड़ी समस्या किसान की अर्थव्यवस्था बनी।
पौधा लगाने के बाद पर्याप्त आय आने में समय लगता था। बीज खरीदने वाला भरोसेमंद बाजार नहीं बना। तेल निकालने और बायोडीजल बनाने की पूरी श्रृंखला भी विकसित नहीं हो सकी।
नतीजा यह हुआ कि कई जगह किसानों ने रतनजोत उखाड़कर दूसरी फसलें लगा दीं।
“डीजल मिलेगा बाड़ी से” का सपना बाजार में टिक नहीं पाया।
गन्ने की कहानी इसलिए अलग है
गन्ना रतनजोत नहीं है।
गन्ने की खेती पहले से बड़े पैमाने पर होती है। किसान को खरीददार मालूम है। चीनी मिलें मौजूद हैं। गन्ने की कीमत तय करने की व्यवस्था है। चीनी का बाजार है। अब उसी स्थापित व्यवस्था में एथेनॉल का बाजार जुड़ गया है।
इसलिए एथेनॉल के मामले में रतनजोत वाली समस्या नहीं है कि किसान फसल उगाए और बाद में खरीदार खोजता फिरे।
यहां बाजार पहले से मौजूद है।
यही एथेनॉल मॉडल की ताकत है।
लेकिन इसी में उसकी चुनौती भी छिपी है।
रतनजोत से बनने वाला ईंधन खाने की थाली से प्रतिस्पर्धा नहीं करता था। गन्ना करता है।
देश की खाद्य सुरक्षा का सवाल
अभी भारत में खाद्य संकट जैसी स्थिति नहीं है।
गेहूं और चावल के सरकारी भंडार पर्याप्त हैं। लेकिन खाद्य सुरक्षा केवल अनाज के सरकारी गोदामों का नाम नहीं है।
खाद्य सुरक्षा का अर्थ है—
खाना उपलब्ध हो, उसकी कीमत आम आदमी की पहुंच में हो और खराब मौसम या बाजार में उतार-चढ़ाव आने पर सरकार के पास स्थिति संभालने की क्षमता हो।
चीनी इस अर्थ में एक महत्वपूर्ण खाद्य वस्तु है।
आज चीनी की कीमत बढ़ी तो सरकार को करीब एक दशक बाद 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देनी पड़ी।
यह तत्काल संकट को संभालने का उपाय है।
लेकिन यह एक संकेत भी है कि घरेलू उत्पादन और खपत के बीच संतुलन पर नजर रखना जरूरी हो गया है।
असली चुनौती अगले कुछ सालों की है
आज सवाल यह नहीं है कि एथेनॉल बंद कर दिया जाए।
सवाल यह है कि एथेनॉल और चीनी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
अगर गन्ने की फसल अच्छी है तो ज्यादा एथेनॉल बनाया जा सकता है।
अगर फसल कमजोर है तो खाद्य जरूरत के लिए ज्यादा चीनी बचाई जा सकती है।
यानी भविष्य की नीति शायद एक तय मात्रा के बजाय फसल और उपलब्धता के हिसाब से लचीली होनी चाहिए।
इसके साथ एथेनॉल के लिए गन्ने के अलावा दूसरे स्रोतों—मक्का, क्षतिग्रस्त अनाज और अन्य फीडस्टॉक—का इस्तेमाल बढ़ाना भी महत्वपूर्ण होगा।
किसान के लिए भी सवाल आसान नहीं
गन्ना किसान के लिए एथेनॉल बाजार बुरी खबर नहीं है।
इससे चीनी मिलों को अतिरिक्त आय मिलती है और गन्ने की मांग बनी रहती है।
लेकिन अगर सरकार चीनी की कीमत नियंत्रित करने के लिए अचानक एथेनॉल पर रोक लगाती है, तो उसका असर मिलों और किसानों पर भी पड़ेगा।
इसलिए नीति का संतुलन जरूरी है।
एक तरफ उपभोक्ता है, जो महंगी चीनी नहीं खरीदना चाहता। दूसरी तरफ किसान है, जिसे अपनी फसल का बेहतर दाम चाहिए। तीसरी तरफ देश है, जिसे पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर तेल आयात कम करना है।
तीनों की जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
कड़वाहट का असली कारण क्या है?
अगर पूरी कहानी को एक साथ देखें तो चीनी की मौजूदा कड़वाहट का कोई एक कारण नहीं है।
मौसम ने गन्ने को प्रभावित किया।
कुछ राज्यों में उत्पादन और रिकवरी कमजोर हुई।
चीनी उत्पादन घटा।
त्योहारी मांग बढ़ी।
बाजार में स्टॉक को लेकर चिंता बढ़ी।
एथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल जारी रहा।
और कीमत बढ़ने के साथ सरकार को आयात तक करना पड़ा।
इसलिए एथेनॉल को पूरी तरह दोषी ठहराना सही नहीं होगा।
लेकिन उसे कहानी से बाहर करना भी संभव नहीं है।
क्योंकि भारत अब उस मुकाम पर है जहां गन्ना केवल चीनी की फसल नहीं रहा। वह ऊर्जा की फसल भी बन गया है।
और यही वह बदलाव है जो आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा की बहस को महत्वपूर्ण बनाएगा।
रतनजोत से गन्ने तक
दो दशक पहले भारत ने कहा था—
“डीजल मिलेगा बाड़ी से।”
रतनजोत का प्रयोग इसलिए नहीं चल पाया क्योंकि पौधे के पीछे टिकाऊ बाजार और मजबूत अर्थव्यवस्था नहीं बन पाई।
आज भारत कह रहा है—
“पेट्रोल में एथेनॉल मिलेगा खेत से।”
इस बार बाजार मौजूद है, तकनीक मौजूद है और नीति का समर्थन भी है।
इसलिए एथेनॉल के सफल होने की संभावना कहीं ज्यादा है।
लेकिन इस बार सवाल दूसरा है।
रतनजोत में चुनौती थी—क्या इससे पर्याप्त ईंधन बनेगा?
गन्ने में चुनौती है—ईंधन बनाते हुए क्या पर्याप्त खाद्य पदार्थ भी बचा रहेगा?
यही भारत की अगली बड़ी नीति परीक्षा है।
गन्ने से पेट्रोल बनाना ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकता है।
लेकिन गन्ने से चीनी कम पड़ने लगे तो वही नीति खाद्य सुरक्षा पर सवाल खड़े कर सकती है।
इसलिए आगे की राह शायद एथेनॉल बनाम चीनी नहीं, बल्कि एथेनॉल और चीनी के बीच मौसम, उत्पादन और बाजार के हिसाब से सही संतुलन बनाने की है।
आखिर पेट्रोल की टंकी भी खाली नहीं होनी चाहिए और रसोई की डिब्बी भी।
