अनियमितताओं का मकड़जाल और सोरेन सरकार
रांची, 18 अगस्त। वाय के न्यूज। झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर 24 दिन से चल रहे छात्र आंदोलन के बीच हेमंत सोरेन सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा रद्द कर दी है। इसके साथ ही 2014 से आउटसोर्स एजेंसी टीडीपीएल (TSR Data Processing Pvt Ltd) के जरिए कराई गई परीक्षाओं, उनके परिणामों और उनसे जुड़ी चयन प्रक्रियाओं को भी रद्द करने की घोषणा की गई है।
सरकार का फैसला आंदोलन कर रहे अभ्यर्थियों के लिए बड़ी राहत है, लेकिन इससे मामला खत्म होने के बजाय और बड़ा हो गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2014 से अब तक टीडीपीएल के जरिए हुई कितनी परीक्षाएं और नियुक्तियां इसकी जद में आएंगी और उनमें चयनित लोगों का क्या होगा?
एक परीक्षा से पूरे सिस्टम तक पहुंचा विवाद
शुरुआत में विवाद कुछ भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और प्रश्नपत्र से जुड़े आरोपों को लेकर था। मामला बढ़ते-बढ़ते JSSC-CGL तक पहुंचा और फिर सरकार ने 2014 से परीक्षा व्यवस्था की पड़ताल कराने का फैसला कर लिया।
मुख्यमंत्री ने कहा है कि 2014 के बाद हुई छोटी-बड़ी सभी गड़बड़ियों की जांच होगी। सरकार का कहना है कि CID इस अवधि में हुई परीक्षाओं की जांच करेगी। साथ ही परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में समिति बनाई गई है।
यानी अब जांच का दायरा एक परीक्षा से बढ़कर करीब एक दशक की पूरी भर्ती व्यवस्था तक पहुंच गया है।
चयनित अभ्यर्थियों के सामने सबसे बड़ा सवाल
सरकार के फैसले का सबसे संवेदनशील पहलू वे अभ्यर्थी हैं, जिन्होंने परीक्षाएं पास कर नौकरी हासिल की है। यदि किसी परीक्षा का परिणाम और चयन प्रक्रिया ही रद्द मानी जाती है, तो उन लोगों की नियुक्ति का भविष्य क्या होगा?
दूसरी तरफ वे अभ्यर्थी हैं जो परीक्षा में शामिल हुए थे लेकिन कथित गड़बड़ी के कारण उन्हें नुकसान हुआ। उनके लिए दोबारा परीक्षा राहत हो सकती है, लेकिन नई परीक्षा कब होगी, पुरानी उम्र सीमा का क्या होगा और पहले खर्च किए गए समय का हिसाब कैसे होगा, ये सवाल भी सामने हैं।
सरकार के सामने जवाबदेही तय करने की चुनौती
मुख्यमंत्री ने खुद कहा है कि जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग समय में काम करने वाली कंपनियों के बीच एक जटिल और आपस में जुड़ा नेटवर्क दिखाई देता है।
यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है।
अगर परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई तो केवल परीक्षा रद्द करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी पता लगाना होगा कि एजेंसी का चयन किसने किया, निगरानी किस स्तर पर हुई, मानक संचालन प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं हुआ और जिन लोगों की भूमिका संदिग्ध पाई गई, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई।
SOP था, पालन नहीं हुआ
मुख्यमंत्री के अनुसार परीक्षा कराने के लिए सरकार के पास मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP पहले से मौजूद थी, लेकिन उसका सही तरीके से पालन नहीं किया गया।
यही बात पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा है।
यदि नियम मौजूद थे और फिर भी उनका पालन नहीं हुआ, तो समस्या नियमों की कमी से ज्यादा निगरानी और जवाबदेही की दिखाई देती है।
आंदोलन थमा या नई मांग शुरू?
सरकार ने छात्रों की एक प्रमुख मांग—JSSC-CGL रद्द करने—को मान लिया है। लेकिन अभ्यर्थियों की CBI जांच की मांग अभी पूरी नहीं हुई है। इसी कारण आंदोलन पूरी तरह समाप्त होने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
यानी सरकार ने तत्काल दबाव कम करने वाला बड़ा फैसला तो लिया है, लेकिन अब उसे यह साबित करना होगा कि जांच निष्पक्ष होगी और दोषियों तक पहुंचेगी।
असली परीक्षा अब सरकार की
झारखंड में अब परीक्षा रद्द करना ही सबसे बड़ा सवाल नहीं है। असली सवाल है कि नई और भरोसेमंद भर्ती व्यवस्था कितनी जल्दी खड़ी होती है।
एक तरफ वर्षों से नौकरी की तैयारी कर रहे लाखों युवा हैं। दूसरी तरफ पुरानी परीक्षाओं के परिणाम और नियुक्तियां हैं। बीच में जांच, कानूनी चुनौतियां और नई परीक्षाओं की प्रक्रिया है।
इसलिए झारखंड की मौजूदा स्थिति को एक वाक्य में कहा जाए तो—
एक परीक्षा रद्द करके सरकार ने छात्रों की तत्काल मांग तो मान ली, लेकिन 2014 से चली आ रही भर्ती व्यवस्था की परतें खोलकर उसने अपने सामने कहीं बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
अनियमितताओं का मकड़जाल अब जितना सुलझाया जा रहा है, उतना ही उलझता दिखाई दे रहा है।
