गुरु पूर्णिमा : भारत का महापर्व

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29 जुलाई को मनाई जाएगी गुरु पूर्णिमा

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”

भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार, श्रद्धा और आत्मोन्नति का महापर्व है। यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्मोत्सव होने के कारण इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। सनातन परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि गुरु ही शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं।
गुरु पूर्णिमा का शास्त्रीय महत्व

धर्मशास्त्रों और पुराणों में गुरु का स्थान अत्यंत ऊँचा बताया गया है।

स्कन्द पुराण में कहा गया है कि गुरु की सेवा और पूजा से सभी देवताओं की पूजा का फल प्राप्त होता है।

गुरु गीता में भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं—

“ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥”

अर्थात गुरु का स्वरूप ध्यान का आधार है, गुरु के चरण पूजा का आधार हैं, गुरु का वचन मंत्र है और गुरु की कृपा ही मोक्ष का मार्ग है।

तैत्तिरीय उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य है-

“आचार्य देवो भव।”

अर्थात आचार्य को देवता के समान सम्मान दो।

गुरु पूर्णिमा महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाई जाती है। उन्होंने चारों वेदों का विभाजन किया।महाभारत की रचना की।अठारह पुराणों का संकलन किया।ब्रह्मसूत्र की रचना की।श्रीमद्भागवत महापुराण का आधार तैयार किया।इसी कारण उन्हें “जगद्गुरु” और “व्यासदेव” कहा जाता है।

वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति (गुरु) को ज्ञान, धर्म, सदाचार, संतान, विद्या, आध्यात्मिक उन्नति और सौभाग्य का कारक ग्रह माना गया है।

आषाढ़ पूर्णिमा के दिन

गुरु का पूजन करने से ज्ञान में वृद्धि होती है।

शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की कामना की जाती है।

गुरु ग्रह की शुभता बढ़ाने के लिए पीले वस्त्र, पीली दाल, हल्दी, चने की दाल तथा पीले पुष्प अर्पित किए जाते हैं।

विद्यार्थियों और साधकों के लिए यह विशेष फलदायी दिन माना गया है।

गुरु पूर्णिमा की पूजा-विधि

  1. प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ या पीले वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें।
  3. महर्षि वेदव्यास, अपने गुरु या इष्टदेव का चित्र स्थापित करें।
  4. दीपक एवं धूप जलाएँ।
  5. चंदन, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
  6. “ॐ गुरवे नमः” या “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का जप करें।
  7. गुरु गीता, विष्णु सहस्रनाम अथवा श्रीमद्भागवत का पाठ करें।
  8. अपने गुरु या शिक्षकों का सम्मान कर उनका आशीर्वाद लें।
  9. सामर्थ्य अनुसार दान करें तथा विद्यार्थियों को पुस्तकें या अध्ययन सामग्री भेंट करें।

गुरु पूर्णिमा का आध्यात्मिक संदेश

गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक होता है। गुरु शिष्य के भीतर छिपी संभावनाओं को जागृत करता है और उसे आत्मबोध की ओर अग्रसर करता है। भारतीय संस्कृति की गुरु-शिष्य परंपरा ने विश्व को ज्ञान, योग, दर्शन और अध्यात्म की अमूल्य धरोहर दी है।

आज के युग में भी गुरु पूर्णिमा हमें यह प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन में ज्ञान, विनम्रता, अनुशासन और कृतज्ञता को अपनाएँ तथा अपने शिक्षकों, माता-पिता और मार्गदर्शकों के प्रति सम्मान व्यक्त करें।

पूजन का समय

पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 28 जुलाई, सायं 6:18 बजे

पूर्णिमा तिथि समाप्त: 29 जुलाई, रात्रि 8:05 बजे

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