9 आरोपी गिरफतार
रायपुर, 23 अगस्त। वाय के न्यूज। काले कागज को असली नोट में बदलने का झांसा देकर देशभर में ठगी करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का रायपुर पुलिस ने पर्दाफाश किया है। मामले में अब तक नौ आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं।
1.13 करोड़ की शिकायत से खुला राज
मामले की शुरुआत रायपुर में सामने आई करीब 1.13 करोड़ रुपये की ठगी से हुई। पुलिस के मुताबिक पीड़ित को करीब 45 करोड़ रुपये का निवेश दिलाने का भरोसा दिया गया था। इसके लिए उसे चेन्नई और नागपुर ले जाया गया और कथित तौर पर काले नोट को विशेष केमिकल से असली नोट में बदलने का प्रदर्शन दिखाया गया।
प्रदर्शन के बाद अलग-अलग प्रक्रियाओं और खर्चों के नाम पर उससे रकम ली जाती रही। जब उसे ठगी का अहसास हुआ तो उसने पुलिस से शिकायत की।

दो युवतियों तक पहुंची पहली कड़ी
तेलीबांधा थाने में मामला दर्ज होने के बाद पुलिस ने आरोपियों के मोबाइल नंबर, बातचीत, डिजिटल चैट और पैसों के लेन-देन की जानकारी खंगाली। जांच में दो युवतियों की भूमिका सामने आई।
पुलिस ने कनिज फातमा उर्फ भावना पांडेय और दीपिका पालीवाल को नागपुर से गिरफ्तार किया। पूछताछ के बाद पुलिस को लगा कि मामला सिर्फ दो लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है।
पहले भरोसा, फिर शुरू होता था असली खेल
गिरोह का तरीका बेहद योजनाबद्ध था। पीड़ित के सामने पहले ऐसा प्रदर्शन किया जाता था, जिससे उसे लगे कि काले कागज या काले किए गए नोट को किसी विशेष प्रक्रिया से असली भारतीय मुद्रा में बदला जा सकता है।
इसके लिए असली नोट, नोट के आकार के काले कागज और केमिकल का इस्तेमाल किया जाता था। प्रदर्शन के दौरान पीड़ित को यह विश्वास दिलाने की कोशिश होती थी कि आरोपियों के पास ऐसी तकनीक है, जिससे काला कागज असली नोट में बदल सकता है।
यहीं से ठगी का अगला चरण शुरू होता था।
केमिकल से लेकर विदेशी तकनीक तक का झांसा
भरोसा बनने के बाद पीड़ित से कहा जाता था कि पूरी प्रक्रिया के लिए विशेष केमिकल और दूसरी सामग्री की जरूरत है। इसके बाद रकम वसूलने के लिए बहाने बदलते जाते थे।
कभी केमिकल खरीदने, कभी विदेशी तकनीक के परीक्षण, कभी सुरक्षा अनुमति और कभी वरिष्ठ अधिकारियों से मंजूरी के नाम पर पैसे मांगे जाते थे।
पीड़ित को लगातार यह भरोसा दिलाया जाता था कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसकी रकम कई गुना होकर वापस मिलेगी।
एक बार नहीं, किस्तों में होती थी ठगी
इस गिरोह का तरीका सिर्फ एक बार बड़ी रकम लेने का नहीं था। पुलिस की जांच में सामने आया कि पीड़ित को अलग-अलग चरणों में नई जरूरत बताकर लगातार भुगतान के लिए तैयार किया जाता था।
यानी एक बार जब पीड़ित ‘काले नोट को असली बनाने’ के प्रदर्शन पर भरोसा कर लेता था, उसके बाद हर नई मांग पिछली प्रक्रिया का ही हिस्सा दिखाई जाती थी।
डिजिटल सुराग लेकर महाराष्ट्र पहुंची पुलिस
दो महिलाओं की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने मोबाइल फोन, संपर्क नंबर, चैट और वित्तीय लेन-देन की कड़ियों को जोड़ना शुरू किया। जांच में सामने आए संपर्कों का पीछा करते हुए पुलिस महाराष्ट्र तक पहुंची।
पुलिस को पता चला कि गिरोह के कुछ सदस्य पुणे के खंडाला स्थित एक रिसॉर्ट में ठहरे हुए हैं।
रिसॉर्ट में चल रहा था अगला सौदा
पुलिस के मुताबिक जब टीम ने रिसॉर्ट में दबिश दी, वहां गिरोह के सदस्य एक अन्य व्यक्ति से रकम दोगुनी करने के नाम पर ठगी की तैयारी में थे।
पुलिस ने मौके से सात आरोपियों को गिरफ्तार किया। इसके साथ ही इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या बढ़कर नौ हो गई।
चार करोड़ से ज्यादा नकद मिला
तलाशी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से चार करोड़ रुपये से अधिक नकद बरामद करने का दावा किया है।
इसके अलावा 17 मोबाइल फोन, नोट के आकार के काले कागज, कांच की प्लेटें और ठगी में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री भी बरामद की गई।
बरामद नकदी को लेकर यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह आरोपियों के कब्जे से मिली रकम है; इसे सीधे इस मामले में हुई कुल ठगी की रकम नहीं माना जा सकता।
कौन चला रहा था नेटवर्क?
पुलिस के मुताबिक पूछताछ में ज्ञान प्रकाश श्रीवास्तव उर्फ योगी, प्रवीण कुमार श्रीवास्तव उर्फ कैप्टन/शेट्टी/रेड्डी और मनोज कुमार श्रीवास्तव उर्फ बड़े सर की भूमिका सामने आई है।
पुलिस का दावा है कि यह गिरोह लंबे समय से इस तरह की ठगी कर रहा था और इसके तार देश के कई राज्यों से जुड़े हैं।
पुलिस के अनुसार गिरोह के वर्ष 2005 से सक्रिय होने और 100 से अधिक लोगों को ठगी का शिकार बनाए जाने की जानकारी जांच में सामने आई है। यह संख्या फिलहाल पुलिस के दावे पर आधारित है और अलग-अलग मामलों की जांच के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी।
अमेरिका से सीखा था तरीका? जांच बाकी
सोशल मीडिया पर चल रहे दावों में कहा जा रहा है कि आरोपियों ने अमेरिका से ठगी का यह तरीका सीखा था। हालांकि उपलब्ध पुलिस-आधारित जानकारी में इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
जांच में विदेशी तकनीक, विदेशी केमिकल और विदेशी परीक्षण का झांसा देने की बात सामने आती है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि गिरोह ने अमेरिका से यह ठगी का तरीका सीखा था।
अब असली नेटवर्क की तलाश
रायपुर पुलिस की जांच अब गिरफ्तार आरोपियों से आगे बढ़कर पूरे नेटवर्क तक पहुंचने पर है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि गिरोह से कितने लोग जुड़े हैं, किन-किन राज्यों में इसी तरीके से ठगी की गई और पीड़ितों से कुल कितनी रकम वसूली गई।
रायपुर की 1.13 करोड़ रुपये की शिकायत से शुरू हुई जांच ने फिलहाल एक ऐसे नेटवर्क का चेहरा सामने ला दिया है, जो काले कागज, केमिकल और नकली प्रदर्शन के जरिए लोगों के लालच और भरोसे—दोनों को ठगी का हथियार बना रहा था।
