देश के 96.6% अगरवुड के पेड़ उत्तर-पूर्व में, असम में सबसे बड़ा संसाधन
नई दिल्ली, 12 अगस्त 2026। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में पाए जाने वाले अगरवुड को अब अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की तैयारी तेज हो गई है। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय और रसायन एवं संबद्ध उत्पाद निर्यात संवर्धन परिषद (केमेक्सिल) ने अगरवुड तेल के क्षेत्र में भारत की संभावनाओं और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नई दिल्ली में उद्योग शिखर सम्मेलन आयोजित किया। इस दौरान उत्तर-पूर्वी क्षेत्र से अगरवुड के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक रोडमैप भी जारी किया गया।
अगरवुड अपनी खास खुशबू और राल के कारण बेहद मूल्यवान माना जाता है। इससे अगरवुड चिप्स और अगरवुड तेल तैयार किया जाता है, जिनका इस्तेमाल इत्र, परफ्यूम, अगरबत्ती और दूसरे प्रीमियम उत्पादों में होता है।
देश के 96.6% अगरवुड के पेड़ उत्तर-पूर्व में
सरकार के अनुसार भारत में अनुमानित 13.989 करोड़ अगरवुड के पेड़ हैं। इनमें करीब 96.6 प्रतिशत पेड़ उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में पाए जाते हैं।
असम में लगभग 11.43 करोड़ अगरवुड के पेड़ होने का अनुमान है, जबकि त्रिपुरा में करीब 1.515 करोड़ पेड़ हैं। मणिपुर, नागालैंड, मेघालय और उत्तर-पूर्व के दूसरे राज्यों में भी अगरवुड के बड़े संसाधन मौजूद हैं।
यानी अगरवुड के मामले में उत्तर-पूर्व भारत के पास देश की सबसे बड़ी प्राकृतिक ताकत है। सरकार अब इसे केवल कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय तेल, सुगंध और दूसरे मूल्यवर्धित उत्पादों के रूप में अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना चाहती है।
खाड़ी देशों में ज्यादा मांग
अगरवुड और इससे तैयार ऊद तेल की मांग खास तौर पर खाड़ी देशों के बाजारों में है। इसके अलावा यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया में भी प्रीमियम फ्रेग्रन्स और दूसरे महंगे उत्पादों में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है।
सरकार का मानना है कि इस बढ़ती मांग का फायदा उत्तर-पूर्व के किसानों, उत्पादकों और स्थानीय समुदायों को मिल सकता है।
निर्यात के लिए क्या होगा?
शिखर सम्मेलन में जारी रोडमैप का उद्देश्य अगरवुड और इसके उत्पादों के नियमित, नियमों के अनुरूप और अधिक मूल्य वाले निर्यात को बढ़ावा देना है।
इसके तहत सरकारी एजेंसियों, उत्तर-पूर्वी राज्यों, निर्यात संवर्धन परिषदों, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर जोर दिया गया है।
रोडमैप के तहत अब तक कई कदम उठाए गए हैं। इनमें—
- अगरवुड के निर्यात कोटा में बढ़ोतरी,
- ‘सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन’ को डिजिटल बनाना,
- असम और त्रिपुरा में अगरवुड संसाधनों की मैपिंग,
- प्रमाणित इनोक्युलम यानी पौधों में राल बनने की प्रक्रिया शुरू करने वाली सामग्री के आपूर्तिकर्ताओं की सूची,
- अगरवुड तेल के लिए जीआई पंजीकरण और गुणवत्ता मानक विकसित करना शामिल है।
कच्चा माल बेचने के बजाय यहीं हो प्रोसेसिंग
सरकार का जोर इस बात पर है कि अगरवुड का कारोबार केवल पेड़ या कच्ची लकड़ी बेचने तक सीमित न रहे। उत्तर-पूर्व में ही प्रोसेसिंग, एक्सट्रैक्शन और डिस्टिलेशन की सुविधाएं विकसित की जाएं, ताकि उत्पाद का अधिक मूल्य यहीं पैदा हो और उसका लाभ किसानों तथा स्थानीय समुदायों तक पहुंचे।
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के संदेश में भी उद्योग से उत्तर-पूर्व में निवेश करने और आधुनिक तकनीक अपनाने का आग्रह किया गया। इसमें वैज्ञानिक खेती, बेहतर एक्सट्रैक्शन और डिस्टिलेशन तकनीक तथा गुणवत्ता और ट्रैसेबिलिटी पर जोर दिया गया है।
किसानों को बाजार से जोड़ने पर जोर
सरकार ने अगरवुड उत्पादकों को एफपीओ और क्लस्टर आधारित संगठनों के जरिए बाजार से जोड़ने की जरूरत बताई है। इसका उद्देश्य उत्पादकों को सुनिश्चित बाजार और बेहतर कीमत दिलाना है।
साथ ही भारतीय अगरवुड की अलग पहचान बनाने के लिए गुणवत्ता प्रमाणन, ट्रैसेबिलिटी और ‘ओरिजिन ब्रांडिंग’ पर भी काम किया जा रहा है।
असम-त्रिपुरा में क्लस्टर और ट्रेड सेंटर
उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय ने पीएम-डिवाइन योजना के तहत असम और त्रिपुरा में अगरवुड क्लस्टर विकास परियोजनाओं को बढ़ावा दिया है। इसके अलावा उत्तर-पूर्वी परिषद की योजनाओं के तहत अगरतला में अगरवुड इंटरनेशनल ट्रेड एंड रिसर्च सेंटर विकसित करने की पहल की गई है।
इन पहलों का उद्देश्य अगरवुड की खेती से लेकर प्रसंस्करण, शोध, बाजार और निर्यात तक एक मजबूत व्यवस्था तैयार करना है।
मई में बना निर्यात संवर्धन सेल
अगरवुड के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए मई 2026 में अगरवुड एक्सपोर्ट प्रमोशन सेल का गठन किया गया। इसमें वाणिज्य मंत्रालय से जुड़े विभागों के साथ केमेक्सिल और शेफेक्सिल को शामिल किया गया है।
इस सेल का काम निर्यातकों की मदद करना, विदेशी बाजारों में संभावनाएं तलाशना और अगरवुड उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देना है।
लक्ष्य: उत्तर-पूर्व बने अगरवुड का बड़ा केंद्र
सरकार की योजना उत्तर-पूर्व को केवल अगरवुड के कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता के रूप में विकसित करने की नहीं है। लक्ष्य है कि क्षेत्र में खेती, वैज्ञानिक तकनीक, प्रोसेसिंग, गुणवत्ता, ब्रांडिंग और निर्यात की पूरी श्रृंखला विकसित हो।
अगर यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है तो अगरवुड उत्तर-पूर्व के किसानों और स्थानीय समुदायों के लिए आय का नया स्रोत बनने के साथ भारत के लिए प्रीमियम सुगंध और ऊद के वैश्विक बाजार में मजबूत पहचान बनाने का आधार बन सकता है।
