कृष्णानगर पंचायत चुनाव मामला: हाई कोर्ट ने निर्वाचन अधिकरण का फैसला बरकरार रखा, बाद में अपडेट हुए जन्म प्रमाणपत्र को नहीं माना पर्याप्त विश्वसनीय
बिलासपुर, 9 सितंबर, वाय के न्यूज। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बलरामपुर-रामानुजगंज जिले की ग्राम पंचायत कृष्णानगर के सरपंच चुनाव से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पंचायत चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार का नामांकन दाखिल करने की तारीख तक 21 वर्ष की आयु पूरी करना अनिवार्य है। अदालत ने उस उम्मीदवार का निर्वाचन रद्द करने के निर्वाचन अधिकरण के फैसले को बरकरार रखा, जिसके आधार और वोटर आईडी में जन्मतिथि 12 अप्रैल 2002 दर्ज थी, लेकिन पुराने शैक्षणिक रिकॉर्ड और मैट्रिक प्रमाणपत्र में जन्मतिथि 12 अप्रैल 2004 दर्ज थी।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने जसिला तिथियो बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य, WPC No. 5343/2025 में 7 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया। मामले में याचिकाकर्ता जसिला तिथियो ने 22 फरवरी 2025 को हुए ग्राम पंचायत कृष्णानगर के सरपंच चुनाव में सबसे अधिक वैध मत हासिल किए थे। उनके निर्वाचन को प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार सूरजपती राम ने चुनौती दी थी।
नामांकन के समय उम्र 21 वर्ष से कम होने का आरोप
चुनाव याचिका में आरोप लगाया गया कि जसिला तिथियो की वास्तविक जन्मतिथि 12 अप्रैल 2004 है। इस आधार पर नामांकन दाखिल करने के समय उनकी उम्र 21 वर्ष पूरी नहीं हुई थी और वह सरपंच पद के लिए पात्र नहीं थीं।
निर्वाचन अधिकरण ने 25 सितंबर 2025 को उनका निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया। इसके खिलाफ जसिला ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
जन्मतिथि को लेकर दो तरह के रिकॉर्ड
हाई कोर्ट के सामने पेश रिकॉर्ड में आधार कार्ड और वोटर आईडी में जन्मतिथि 12 अप्रैल 2002 दर्ज थी। याचिकाकर्ता ने इसी जन्मतिथि के समर्थन में एक जन्म प्रमाणपत्र भी पेश किया।
लेकिन अदालत ने पाया कि कक्षा पहली से लेकर मैट्रिक तक के उपलब्ध शैक्षणिक रिकॉर्ड में जन्मतिथि लगातार 12 अप्रैल 2004 दर्ज थी। मार्च 2021 में जारी मैट्रिक प्रमाणपत्र में भी यही जन्मतिथि दर्ज थी।
अदालत ने इस अंतर को देखते हुए दस्तावेजों की विश्वसनीयता और उनके तैयार होने की तारीख को महत्वपूर्ण माना।
बाद में अपडेट हुआ जन्म प्रमाणपत्र
हाई कोर्ट के फैसले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि 12 अप्रैल 2002 की जन्मतिथि वाला जन्म प्रमाणपत्र 5 जुलाई 2025 को अपडेट होकर जारी हुआ था। जबकि जसिला के निर्वाचन को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका इससे पहले 11 मार्च 2025 को दाखिल हो चुकी थी।
कोर्ट ने यह भी देखा कि नामांकन दाखिल करते समय याचिकाकर्ता ने 12 अप्रैल 2002 की जन्मतिथि वाला यह जन्म प्रमाणपत्र पेश नहीं किया था।
अदालत ने माना कि बाद में अपडेट हुए जन्म प्रमाणपत्र के मुकाबले लंबे समय से उपलब्ध शैक्षणिक रिकॉर्ड ज्यादा विश्वसनीय हैं।
आधार कार्ड जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण नहीं
फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड पहचान का दस्तावेज है, लेकिन अपने आप में जन्मतिथि का निर्णायक प्रमाण नहीं है। इसी तरह वोटर आईडी में दर्ज जन्मतिथि को भी इस मामले में निर्णायक साक्ष्य नहीं माना गया।
अदालत ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और आधार से संबंधित दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया।
मैट्रिक प्रमाणपत्र को क्यों मिला ज्यादा महत्व?
हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के पुराने शैक्षणिक रिकॉर्ड में पहली कक्षा से लेकर मैट्रिक तक जन्मतिथि 12 अप्रैल 2004 दर्ज थी। मैट्रिक प्रमाणपत्र भी वर्ष 2021 में जारी हुआ था और उसमें यही तारीख दर्ज थी।
इसके विपरीत 12 अप्रैल 2002 वाली जन्मतिथि का प्रमाणपत्र चुनाव याचिका दाखिल होने के बाद अपडेट हुआ था। याचिकाकर्ता इस जन्मतिथि को साबित करने के लिए अदालत के सामने पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं कर सकीं।
इन्हीं परिस्थितियों में कोर्ट ने 12 अप्रैल 2004 को उनकी विश्वसनीय जन्मतिथि माना।
21 वर्ष की उम्र संवैधानिक पात्रता
हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 243-F का उल्लेख करते हुए कहा कि पंचायत के सदस्य के रूप में चुनाव लड़ने के लिए 21 वर्ष की आयु पूरी करना आवश्यक है।
चूंकि याचिकाकर्ता की स्वीकार्य जन्मतिथि 12 अप्रैल 2004 थी, इसलिए 2025 के पंचायत चुनाव में नामांकन के समय उनकी उम्र 21 वर्ष से कम थी। इस कारण वह सरपंच पद के लिए पात्र नहीं थीं।
पर्याप्त अवसर नहीं मिलने की दलील भी खारिज
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया था कि निर्वाचन अधिकरण में उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड और कार्यवाही की तारीखों की जांच के बाद इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को लिखित जवाब, जिरह और अपना साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त अवसर दिए गए थे।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उन्हें अंतिम अवसर दिए जाने के बावजूद उन्होंने प्रभावी रूप से साक्ष्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई। इसलिए बाद में यह कहना कि उन्हें उचित अवसर नहीं मिला, स्वीकार नहीं किया जा सकता।
नया चुनाव भी हो चुका
मामले की एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि यह भी है कि कृष्णानगर पंचायत में बाद में नया चुनाव कराया गया। रिकॉर्ड के अनुसार प्रतिवादी सूरजपती राम नए चुनाव में निर्वाचित हुईं और उन्हें 4 जून 2026 को निर्वाचन प्रमाणपत्र जारी किया गया।
हाई कोर्ट ने अंततः जसिला तिथियो की याचिका खारिज करते हुए निर्वाचन अधिकरण के आदेश को बरकरार रखा।
फैसले का कानूनी संदेश
इस फैसले का व्यापक संदेश यह है कि चुनावी उम्र विवाद में केवल आधार कार्ड या वोटर आईडी में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर पात्रता तय नहीं की जा सकती। अदालत संबंधित सभी दस्तावेजों की विश्वसनीयता, उनके तैयार होने का समय और उपलब्ध साक्ष्यों को देखेगी।
कृष्णानगर मामले में लगातार पुराने शैक्षणिक रिकॉर्ड और मैट्रिक प्रमाणपत्र में दर्ज जन्मतिथि को बाद में अपडेट हुए जन्म प्रमाणपत्र तथा आधार-वोटर आईडी में दर्ज जन्मतिथि की तुलना में अधिक विश्वसनीय माना गया।
