विशेषज्ञ समिति की छह महीने की मोहलत की मांग खारिज; CJI सूर्यकांत ने कहा—समय पर काम नहीं हुआ तो समिति का पुनर्गठन करेंगे
नई दिल्ली, 7 सितंबर 2026, वाय के न्यूज। अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और संरक्षण को लेकर चल रहे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति को छह महीने की अतिरिक्त मोहलत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने समिति को 30 नवंबर 2026 तक अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। समिति ने रिपोर्ट पूरी करने के लिए 28 फरवरी 2027 तक का समय मांगा था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने समिति की लंबी समयसीमा की मांग पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि उसे तय समय में काम पूरा करना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इसके बाद और समय नहीं दिया जाएगा। यदि समिति निर्धारित समय में काम पूरा करने में सक्षम नहीं होती है तो उसका पुनर्गठन किया जा सकता है।
राजस्थान और गुजरात के आदिवासियों से भी लेना होगा पक्ष
सुप्रीम कोर्ट ने समिति को रिपोर्ट तैयार करने से पहले व्यापक परामर्श प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया है। इसमें सभी संबंधित पक्षों की बात सुनी जाएगी। अदालत ने विशेष रूप से राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों को भी परामर्श प्रक्रिया में शामिल करने को कहा है, क्योंकि अरावली क्षेत्र से जुड़े फैसलों का उनके हितों पर सीधा असर पड़ सकता है।
समिति जरूरत पड़ने पर अलग-अलग महत्वपूर्ण मुद्दों पर अंतरिम रिपोर्ट भी अदालत के समक्ष पेश कर सकती है। इससे किसी तत्काल पर्यावरणीय मुद्दे पर पूरी रिपोर्ट का इंतजार किए बिना अदालत कार्रवाई कर सकेगी। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर 2026 को होगी।
100 मीटर की सीमा पर उठा था विवाद
अरावली की परिभाषा को लेकर विवाद उस व्यवस्था के बाद गहरा गया था जिसमें 100 मीटर या उससे अधिक स्थानीय ऊंचाई वाले भू-आकार को अरावली पहाड़ी मानने का मानदंड सामने आया था। पर्यावरण संगठनों ने आशंका जताई कि इससे छोटी पहाड़ियां और उनसे जुड़े पारिस्थितिक क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकते हैं तथा खनन और निर्माण गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की परिभाषा तथा सीमांकन से जुड़े मुद्दों की व्यापक समीक्षा के लिए पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त विशेषज्ञ समिति गठित की थी। समिति को वैज्ञानिक और पर्यावरणीय आधार पर अरावली की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का अध्ययन करना है।
अरावली क्यों महत्वपूर्ण है?
दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह क्षेत्र मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल संरक्षण और जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी कारण अरावली की परिभाषा में बदलाव का असर केवल पहाड़ियों तक सीमित नहीं, बल्कि खनन, निर्माण, वन और जल संसाधनों से जुड़े व्यापक क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अब 30 नवंबर की सख्त समयसीमा तय किए जाने के बाद विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट अरावली के भविष्य के संरक्षण और इसके नियमन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जा रही है।
