आधार वर्ष बदलने, नए डेटा और नई गणना पद्धति से बदले पुराने आंकड़े; Q1 GDP अनुमान आगे भी संशोधित हो सकता है
नई दिल्ली, 2 सितंबर 2026। भारत की अर्थव्यवस्था की पहली तिमाही में 7.8% की वास्तविक GDP वृद्धि को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने आंकड़ों की गणना और पिछले साल के GDP अनुमान में हुए बदलाव पर विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया है। सरकार ने कहा है कि पिछली तिमाही के GDP आंकड़े में कमी मौजूदा वित्त वर्ष की वृद्धि दर को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए नहीं की गई। यह बदलाव आधार वर्ष बदलने, नए आंकड़ों को शामिल करने, डेटा स्रोतों में सुधार और GDP गणना की पद्धति में बदलाव के कारण हुआ है।
पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन समेत कुछ अर्थशास्त्रियों ने 7.8% की तेज वृद्धि के बीच रोजगार और आर्थिक वृद्धि की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। GDP की नई श्रृंखला को लेकर भी आंकड़ों की व्याख्या पर बहस चल रही है। इसी पृष्ठभूमि में PIB ने 2 सितंबर को GDP से जुड़े सवालों पर विस्तृत FAQ जारी किया है।
पहले 86.05 लाख करोड़ था पिछले साल का GDP
सरकार के अनुसार 29 अगस्त 2025 को जारी पुरानी 2011-12 आधार वाली GDP श्रृंखला में अप्रैल-जून 2025 की मौजूदा कीमतों पर GDP का अनुमान 86.05 लाख करोड़ रुपये था।
बाद में 2022-23 को नया आधार वर्ष बनाकर GDP की नई श्रृंखला तैयार की गई। फरवरी 2026 में इसी तिमाही का अनुमान 80.32 लाख करोड़ रुपये किया गया। जून 2026 में उपलब्ध नए आंकड़ों के आधार पर इसे 80.44 लाख करोड़ रुपये किया गया।
इसके बाद नई औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) और उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) श्रृंखला तथा अन्य उपलब्ध आंकड़ों को शामिल करने के बाद यह अनुमान 80 लाख करोड़ रुपये रह गया।
सरकार का कहना है कि इन आंकड़ों की तुलना सीधे तौर पर नहीं की जा सकती, क्योंकि 86.05 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पुरानी 2011-12 आधार वाली श्रृंखला का है, जबकि मौजूदा GDP वृद्धि की गणना नई 2022-23 आधार वाली श्रृंखला से की जा रही है।
सरकार का तर्क- पुराने आंकड़े बदलना सामान्य प्रक्रिया
सरकार के मुताबिक GDP की तिमाही गणना में बड़ी संख्या में उत्पादन और मूल्य संबंधी संकेतकों का इस्तेमाल होता है। जैसे फसल उत्पादन, सीमेंट उत्पादन, तैयार स्टील की खपत और वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री जैसे आंकड़े आर्थिक गतिविधियों का आकलन करने में इस्तेमाल होते हैं।
जैसे-जैसे अधिक विस्तृत और अद्यतन आंकड़े उपलब्ध होते हैं, पुराने अनुमानों में संशोधन किया जाता है। इसलिए पिछले साल के आंकड़े में बदलाव को अपने आप मौजूदा वर्ष की वृद्धि दर बढ़ाने की कोशिश नहीं माना जा सकता।
नई GDP श्रृंखला में आधार वर्ष बदला
31 अगस्त 2026 को जारी नई GDP श्रृंखला में आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया है।
आधार वर्ष वह संदर्भ वर्ष होता है जिसके मूल्यों का इस्तेमाल वास्तविक यानी महंगाई के असर से अलग GDP वृद्धि मापने के लिए किया जाता है। सरकार का कहना है कि इसे समय-समय पर इसलिए बदला जाता है ताकि अर्थव्यवस्था में आए संरचनात्मक बदलाव और कीमतों में बदलाव का ज्यादा सही तरीके से प्रतिनिधित्व हो सके।
नई श्रृंखला में नए डेटा स्रोतों के साथ डबल डिफ्लेशन पद्धति को भी मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के लिए शामिल किया गया है।
मैन्युफैक्चरिंग में 9.2% वास्तविक वृद्धि
डबल डिफ्लेशन को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार ने कहा कि इसमें उत्पादन और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतों को अलग-अलग समायोजित किया जाता है।
पहली तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का नाममात्र GVA 7.7% बढ़ा, जबकि वास्तविक GVA वृद्धि 9.2% रही। सरकार के अनुसार इन दोनों दरों के अंतर के कारण मैन्युफैक्चरिंग का implicit GVA deflator -1.5% आया।
सरकार ने स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की कीमतें वास्तव में घट गई हैं। यह उत्पादन और उसमें इस्तेमाल होने वाले इनपुट की कीमतों के बीच अंतर से बनने वाला सांख्यिकीय परिणाम है।
CPI, WPI और GDP डिफ्लेटर अलग-अलग चीजें
सरकार ने GDP डिफ्लेटर और महंगाई के दूसरे प्रमुख सूचकांकों के बीच अंतर भी समझाया है।
CPI उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों को मापता है। WPI थोक स्तर पर वस्तुओं, कच्चे माल और निर्मित वस्तुओं की कीमतों को मापता है।
इसके विपरीत GDP डिफ्लेटर पूरी अर्थव्यवस्था के उत्पादन और कीमतों में बदलाव का व्यापक संकेतक है। इसमें सरकारी खर्च, निजी निवेश, निर्यात और बैंकिंग, IT तथा रियल एस्टेट जैसी सेवाएं भी शामिल होती हैं।
इसलिए GDP डिफ्लेटर का CPI या WPI के साथ समान गति से चलना जरूरी नहीं है।
खनन में कीमतों ने बढ़ाया नाममात्र GVA
खनन क्षेत्र के आंकड़ों में वास्तविक और नाममात्र वृद्धि के बीच बड़े अंतर पर भी सरकार ने स्पष्टीकरण दिया है।
अप्रैल-जून 2026 के दौरान खनन एवं उत्खनन क्षेत्र की वास्तविक GVA वृद्धि -2.4% रही। इसके बावजूद नाममात्र GVA में 22.3% वृद्धि दर्ज हुई।
सरकार के मुताबिक इसका प्रमुख कारण खनिजों की कीमतों में तेज वृद्धि रही। विशेष रूप से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में अप्रैल में 69.5%, मई में 72.2% और जून में 33.7% की वृद्धि बताई गई है।
Q1 का 7.8% आंकड़ा अंतिम नहीं
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पहली तिमाही का GDP अनुमान अभी अंतिम नहीं है। आगे अधिक व्यापक और अद्यतन आंकड़े मिलने पर इसमें संशोधन हो सकता है।
सरकार के मुताबिक GDP को उत्पादन और खर्च—दोनों तरीकों से मापा जाता है। इन दोनों तरीकों से प्राप्त अनुमानों के बीच अंतर को statistical discrepancy कहा जाता है। यह अंतर बाद के संशोधनों के साथ बदल सकता है।
हालांकि सरकार का कहना है कि केवल इस अंतर को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मौजूदा GDP वृद्धि कम या ज्यादा दिखाई गई है। अंतिम आंकड़ों में यह अंतर काफी कम या समाप्त हो सकता है।
अब बहस आंकड़ों के साथ रोजगार पर भी
GDP के आंकड़ों को लेकर सरकार की सफाई के बाद बहस का एक हिस्सा गणना पद्धति पर केंद्रित हो गया है। वहीं अर्थशास्त्रियों का दूसरा सवाल यह है कि तेज आर्थिक वृद्धि का असर रोजगार, आय और निजी निवेश पर कितना पड़ रहा है।
इसलिए मौजूदा बहस केवल यह तय करने तक सीमित नहीं है कि 7.8% की GDP वृद्धि कितनी है। बड़ा सवाल यह भी है कि इस वृद्धि की प्रकृति क्या है, किन क्षेत्रों से आ रही है और इसका असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों तथा रोजगार बाजार पर कितना पड़ रहा है।
फिलहाल सरकार का आधिकारिक रुख है कि नई GDP श्रृंखला में किए गए बदलाव सांख्यिकीय और पद्धतिगत सुधारों का परिणाम हैं, न कि मौजूदा वृद्धि दर को कृत्रिम रूप से बढ़ाने की कोशिश। वहीं पहली तिमाही के अनुमान में आगे संशोधन की संभावना सरकार ने स्वयं स्वीकार की है।
