संपादकीय | ये लोग कहां से आते हैं?

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जंतर-मंतर की हालिया घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने युवाओं के नाम एक वीडियो संदेश जारी किया। संदेश का सार स्पष्ट था—गाली-गलौज किसी समस्या का समाधान नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके और उनकी दिवंगत माता के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां की गईं, लेकिन ऐसे युवाओं को दंडित या अपमानित करने के बजाय उन्हें सुधार का अवसर दिया जाना चाहिए। यह संदेश केवल एक घटना की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमारे समय की एक गहरी सामाजिक समस्या की ओर संकेत करता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक सवाल बार-बार मन में उठता है—ये लोग कहां से आते हैं? क्या अचानक कोई युवा इस निष्कर्ष पर पहुंच जाता है कि गाली देना ही अपनी बात रखने का सबसे प्रभावी तरीका है? या फिर यह प्रवृत्ति हमारे सामाजिक, राजनीतिक और डिजिटल वातावरण की देन है?

दरअसल, किसी भी व्यक्ति की भाषा शून्य में विकसित नहीं होती। परिवार उसके पहले शिक्षक होते हैं, विद्यालय उसे अनुशासन सिखाता है, समाज व्यवहार के मानदंड तय करता है और आज के दौर में सोशल मीडिया उसकी सोच और अभिव्यक्ति को गहराई से प्रभावित करता है। जब इन सभी स्तरों पर भाषा का स्तर गिरने लगे, तो उसके परिणाम भी समाज को ही भुगतने पड़ते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक संवाद का स्वर पहले की तुलना में कहीं अधिक आक्रामक हुआ है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच दिया है, जो लोकतंत्र के लिए सकारात्मक बात है। लेकिन इसी मंच ने बिना जिम्मेदारी के बोलने की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा दिया। लाइक, शेयर और वायरल होने की होड़ में कई बार संयम, संवेदनशीलता और तथ्य पीछे छूट जाते हैं। जितनी तीखी भाषा, उतनी अधिक चर्चा—यह सोच धीरे-धीरे सामान्य होती चली गई।

यह समस्या केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। राजनीतिक विमर्श में भी कटुता का स्तर बढ़ा है। चुनावी सभाओं, टीवी बहसों और ऑनलाइन अभियानों में अक्सर ऐसी भाषा सुनाई देती है, जिसे कुछ दशक पहले सार्वजनिक जीवन में स्वीकार नहीं किया जाता था। विभिन्न दलों के नेता एक-दूसरे पर व्यक्तिगत टिप्पणियां करते हैं। समर्थक भी उसी शैली को अपनाते हैं। जब सार्वजनिक जीवन के प्रभावशाली लोग मर्यादा का पालन नहीं करते, तो युवाओं के सामने गलत उदाहरण स्थापित होता है।

यहां यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सर्वोपरि है। सरकार की आलोचना करना, नीतियों पर सवाल उठाना, आंदोलन करना और विरोध दर्ज कराना लोकतांत्रिक अधिकार हैं। लेकिन लोकतंत्र की शक्ति तर्क में है, अपमान में नहीं। किसी विचार का जवाब दूसरे विचार से दिया जा सकता है, तथ्यों से दिया जा सकता है, लेकिन गाली से नहीं। गाली केवल संवाद का अंत करती है और समाज को और अधिक विभाजित करती है।

प्रधानमंत्री ने संबंधित युवाओं को क्षमा करने और उन्हें सुधार का अवसर देने की बात कही। यह दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समाज केवल दंड से नहीं चलता। विशेषकर जब बात युवाओं की हो, तो सुधार की संभावना हमेशा बनी रहनी चाहिए। कठोर कार्रवाई आवश्यक हो सकती है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है यह समझना कि ऐसी मानसिकता विकसित कैसे हुई।

इस प्रश्न का उत्तर खोजने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। परिवारों को बच्चों के सामने अपने व्यवहार पर ध्यान देना होगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को केवल परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि नागरिक संस्कारों पर भी जोर देना होगा। मीडिया को टीआरपी और क्लिक के दबाव में भाषा की मर्यादा नहीं छोड़नी चाहिए। सोशल मीडिया कंपनियों को भी ऐसे एल्गोरिदम विकसित करने होंगे जो नफरत और अपमानजनक सामग्री को बढ़ावा न दें। सबसे अधिक जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की है, क्योंकि समाज अक्सर अपने नेताओं की भाषा और व्यवहार से प्रेरणा लेता है।

एक और गंभीर पक्ष है—डिजिटल गुमनामी। मोबाइल स्क्रीन के पीछे बैठा व्यक्ति कई बार वह सब लिख देता है, जो आमने-सामने कहने का साहस नहीं करता। यह केवल तकनीक का नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का भी प्रश्न है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अभद्रता के बीच की रेखा जितनी स्पष्ट होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि आज के युवा केवल समस्या नहीं हैं; वे समाधान भी हैं। यही युवा देश को विज्ञान, तकनीक, खेल, स्टार्टअप, शोध और नवाचार में नई ऊंचाइयों तक ले जा रहे हैं। कुछ लोगों के अनुचित व्यवहार के आधार पर पूरी पीढ़ी का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि सकारात्मक उदाहरणों को अधिक महत्व मिले और नकारात्मक व्यवहार को सामाजिक स्वीकृति न मिले।

इसलिए प्रश्न केवल इतना नहीं है कि “ये लोग कहां से आते हैं?” असली प्रश्न यह है कि हम उन्हें किस दिशा में ले जा रहे हैं? यदि समाज में सम्मानजनक संवाद की संस्कृति विकसित होगी, तो आने वाली पीढ़ी भी उसी संस्कृति को अपनाएगी। यदि सार्वजनिक जीवन में कटुता, अपमान और ध्रुवीकरण ही सामान्य बना रहेगा, तो युवाओं से अलग व्यवहार की अपेक्षा करना कठिन होगा।

प्रधानमंत्री का संदेश समयानुकूल है, लेकिन उसका उद्देश्य तभी पूरा होगा जब यह आत्ममंथन केवल युवाओं तक सीमित न रहे। राजनीति, समाज, मीडिया, शिक्षा व्यवस्था और डिजिटल मंच—सभी को अपनी-अपनी भूमिका पर गंभीरता से विचार करना होगा। लोकतंत्र की पहचान केवल मतभेद नहीं, बल्कि मर्यादित मतभेद है। विचारों का संघर्ष जितना प्रखर हो सकता है, भाषा उतनी ही शालीन होनी चाहिए। यही सभ्य समाज की पहचान है और यही वह मूल्य है जिसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

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