आज तुलसीदास जी की जयंती
आलेख – स्वराज्य करुण

जिन दिनों महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी अपने कालजयी महाकाव्य ‘रामचरित मानस ‘ की रचना कर रहे थे, उस दौर में भी समाज कई पाखंडी रामभक्त पाए जाते थे। महाकवि ने ऐसे नकाबधारी रामभक्तों को अपनी काव्य पंक्तियों में फटकारते हुए बेनकाब किया था ।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की प्रेरणादायी जीवनगाथा को आम जनता की भाषा में आम जनता के दिलों तक पहुँचाने वाले अवधी के महाकवि थे गोस्वामी तुलसीदास जी, जिनकी आज 19 अगस्त को जयंती है । उन्हें विनम्र नमन । उनका उत्तरप्रदेश के ग्राम राजापुर (जिला -बाँदा ) में जन्म संवत 1589 (सन 1532 ईस्वी) में हुआ था । निधन संवत 1680 (सन 1623 ईस्वी) में श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन वाराणसी (काशी) के असी घाट में हुआ । वे उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध रामभक्त कवि थे । उनके समय में भी आज की तरह कई पाखंडी रामभक्त हुआ करते थे, जिन्हें उन्होंने अपनी काव्य पंक्तियों में ख़ूब फटकारा और बेनक़ाब किया था ।
हम और आप जानते हैं कि उनका कालजयी महाकाव्य ‘ रामचरितमानस’ बहुत लोकप्रिय है। सहज ,सरल अवधी बोली में रचित यह महाकाव्य मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जीवन गाथा के माध्यम से हर मनुष्य को जीवन की तमाम चुनौतियों से जूझने की प्रेरणा देता है ।
अच्छे और बुरे लोग ,असली और नकली चेहरे , हर देश ,हर समाज और हर समय में रहते आए हैं और शायद आगे भी रहेंगे। तुलसीदास जी के दौर में भी समाज में छद्मवेशी लोग हुआ करते थे ,जो रामभक्त का मुखौटा पहनकर भगवान श्रीराम के नाम पर लोगों को अपनी ठगी का शिकार बनाया करते थे, जिन्हें महाकवि ने बेनक़ाब किया था । ऐसे ‘नकली रामभक्त’ आज शायद पहले से कहीं ज़्यादा संख्या में हैं, जो भगवान राम के नाम पर स्वार्थ की रोटियाँ सेंकते हैं । तभी तो ‘ मुँह में राम ,बगल में छुरी ‘ जैसी कहावत समाज में प्रचलित है।महाकवि तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस ‘के ‘बालकांड’ में स्वयं को अवगुणी बताते हुए ऐसे फर्जी लोगों को इन पंक्तियों के माध्यम से बेनकाब किया है-
बंचक भगत कहाइ राम के । किंकर कंचन कोह काम के ।। तिन महँ प्रथम रेख जग मोरी धींग धरम ध्वज धंधक धोरी।।
अर्थात – जो श्रीरामजी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं ,जो धन (लोभ) , क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो धींगा धींगी करने वाले ,धर्मध्वजी (धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वाले –दम्भी) और कपट के धंधों का बोझ ढोने वाले हैं , संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है।* महाकवि का यह बड़प्पन है कि वह स्वयं को अवगुणी बताते हैं ,लेकिन उनका यह दोहा आज के फ़र्ज़ी राम -भक्तों पर बिल्कुल सटीक बैठता है। उन्हें आइना दिखाता है।
तुलसीदास जी आगे कहते हैं —
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ ।। ताते मैं अति अलप बखाने । थोरे महुँ जानहिंह सयाने ।।
प्रत्येक मनुष्य में गुण और अवगुण दोनों होते हैं। महाकवि भी मनुष्य थे। इस नाते उन्होंने अपने इस कालजयी महाग्रंथ की उपरोक्त पंक्तियों में पूरी विनम्रता के साथ कहते हैं — “यदि मैं अपने सब अवगुणों को कहने लगूँ तो कथा बहुत बढ़ जाएगी और मैं पार नहीं पाऊँगा। इससे मैंने बहुत कम अवगुणों का वर्णन किया है।बुद्धिमान लोग थोड़े ही में समझ लेंगे ।” हमें आज के समय में गोस्वामी तुलसीदास जी की उन पंक्तियों को भी याद करना चाहिए ,जिनमें उन्होंने रामराज्य की विशेषताओं को अत्यंत अल्प शब्दों में समाज के सामने रखा है —
दैहिक ,दैविक ,भौतिक तापा राम राज कहहुँ नहिं व्यापा ।
महाकवि ने ‘रामराज्य’ के रूप में एक ऐसी आदर्श राज्य व्यवस्था की कल्पना की है ,जिसमें किसी को भी दैहिक ,दैविक और भौतिक कष्ट नहीं होता था। क्या आज हमारी दुनिया में ऐसी कोई राज्य व्यवस्था है ?
राजा अर्थात शासक ,प्रशासक को कैसा होना चाहिए , उसका भी उल्लेख अपने ‘मानस’ में बाबा तुलसी कर गए हैं । वह कहते हैं –
जासु राज प्रिय ,प्रजा दुखारी सो नृप अवसि नरक अधिकारी ।
अर्थात जिसे सिर्फ़ अपना राजत्व प्रिय हो और जिसके राज्य में प्रजा दुःखी हो ,ऐसा राजा जरूर नरक में जाने लायक होता है। क्या आज की इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में ‘राजा-महाराजा ‘ बने हुए लोग को तुलसीदासजी की इन पंक्तियों से कोई सीख या कोई नसीहत लेते होंगे ?
टीप — महाकवि के जीवन दर्शन को समझने के लिए गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित ‘ श्रीरामचरितमानस ‘ का अध्ययन हमें अवश्य करना चाहिए ।इसमें आदरणीय श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी द्वारा सरल शब्दों में की गई टीकाएँ पठनीय और विचारणीय हैं।
*
