पांडुलिपियां, संसदीय समिति, और राज्य सरकारें

यह समाचार साझा करें

WhatsApp Facebook X

पढ़ने की सुविधा

अपनी सुविधा के अनुसार अक्षर और कंट्रास्ट चुनें।

अक्षर आकार

संपादकीय

भारत में सदियों से सुरक्षित पांडुलिपियों की खोज और उनके दस्तावेजीकरण का काम अब एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। केंद्र सरकार की ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण पहल ने इस काम को देशव्यापी अभियान का रूप दिया है। 16 मार्च 2026 को शुरू हुए इस सर्वे का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं है कि पांडुलिपियां कहां-कहां हैं, बल्कि उनका राष्ट्रीय मानचित्र तैयार करना, भौतिक सत्यापन करना, विषय-वस्तु और लिपि के आधार पर सूचीकरण करना तथा आगे संरक्षण और उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटलीकरण की व्यवस्था करना है।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का पारंपरिक ज्ञान केवल राजकीय पुस्तकालयों और बड़े शोध संस्थानों में बंद नहीं है। उसका बड़ा हिस्सा परिवारों, मंदिरों, मठों, निजी संग्रहों और स्थानीय संस्थाओं के पास है। यही कारण है कि सर्वे में आम नागरिकों और पांडुलिपियों के संरक्षकों को भी शामिल किया गया है।

लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल भी पैदा होता है—क्या पांडुलिपियों की संख्या गिन लेना ही संरक्षण है?

निश्चित रूप से नहीं।

मार्च 2026 में संस्कृति मंत्रालय ने बताया था कि देश में आठ लाख से अधिक डिजिटलीकृत पांडुलिपियां विभिन्न डिजिटल माध्यमों में उपलब्ध थीं और उनमें से 1.29 लाख राष्ट्रीय डिजिटल रिपॉजिटरी पर जनता के लिए उपलब्ध थीं। उसी समय राष्ट्रीय सर्वे में 12.97 लाख से अधिक पांडुलिपियों की जानकारी रिपोर्ट हो चुकी थी।

इन आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण अंतर छिपा है। मिली हुई पांडुलिपि, दर्ज की गई पांडुलिपि, डिजिटलीकृत पांडुलिपि और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध पांडुलिपि—चारों एक ही चीज नहीं हैं।

संसदीय स्थायी समिति की 393वीं रिपोर्ट इसी अगले चरण की ओर ध्यान दिलाती है। समिति ने सुझाव दिया है कि सार्वजनिक धन से तैयार प्रत्येक डिजिटलीकृत पृष्ठ और सत्यापित प्रतिलेखन को खुले राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय के रूप में उपलब्ध कराया जाए। प्रतिबंधित संग्रहों के लिए फेडरेटेड लर्निंग जैसी तकनीक अपनाने का सुझाव भी इसी सोच का हिस्सा है।

यह सिफारिश असल में एक बुनियादी सवाल उठाती है—जिस ज्ञान के संरक्षण पर जनता का पैसा खर्च हो रहा है, उसकी पहुंच जनता और शोध समुदाय तक कितनी होगी?

यहीं राज्य सरकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

राज्यों को केवल सर्वेक्षक नहीं, संरक्षक बनना होगा

केंद्र ने राष्ट्रीय ढांचा तैयार किया है, लेकिन भारत की पांडुलिपि-संपदा का वास्तविक भूगोल राज्यों में है। किसी गांव के पुराने घर में रखा तालपत्र, किसी मंदिर की संदूकची में बंद ग्रंथ, किसी वैद्य परिवार की पीढ़ियों पुरानी चिकित्सा-पुस्तिका या किसी मठ में सुरक्षित हस्तलिखित ग्रंथ—इन तक पहुंच राज्य की प्रशासनिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के बिना संभव नहीं है।

इसलिए राज्य सरकारों को अपने स्तर पर राज्य पांडुलिपि मिशन या समन्वित पांडुलिपि प्रकोष्ठ को मजबूत करना चाहिए। संस्कृति, पुरातत्व, उच्च शिक्षा, जनजातीय कार्य, आयुष, अभिलेखागार, भाषा और पुस्तकालय विभागों के बीच स्थायी समन्वय होना चाहिए।

सबसे पहले राज्य को यह पता होना चाहिए कि उसके पास वास्तव में क्या है।

सर्वेक्षण का लक्ष्य केवल संख्या जुटाना नहीं, बल्कि स्थान, भाषा, लिपि, विषय, काल, सामग्री और स्थिति का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार करना होना चाहिए। इसके बाद जोखिम के आधार पर संरक्षण की प्राथमिकता तय होनी चाहिए।

छत्तीसगढ़ के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी

छत्तीसगढ़ में यह काम और अधिक महत्वपूर्ण है। यहां लिखित पांडुलिपियों के साथ-साथ आदिवासी और लोकसमुदायों में पीढ़ियों से मौखिक रूप से संरक्षित ज्ञान की बड़ी परंपरा है।

बस्तर, सरगुजा और दूसरे अंचलों में वनस्पति, उपचार, कृषि, मौसम, लोकचिकित्सा, अनुष्ठान, धातुकर्म, शिल्प और प्रकृति से जुड़े ज्ञान का बड़ा हिस्सा अभी भी समुदायों के पास है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर पारंपरिक दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है। लेकिन जो ज्ञान मौजूद है, उसका दस्तावेजीकरण न होना स्वयं में एक बड़ी क्षति है।

छत्तीसगढ़ को इसलिए पांडुलिपि सर्वे को केवल पुराने कागज खोजने के अभियान के रूप में नहीं देखना चाहिए। उसे पारंपरिक ज्ञान का राज्यव्यापी डिजिटल अभिलेख बनाने की दिशा में ले जाना चाहिए।

इसके लिए जिला स्तर पर विश्वविद्यालयों, शासकीय महाविद्यालयों, संग्रहालयों, स्थानीय इतिहासकारों, वैद्यों, पुरोहितों, जनजातीय ज्ञानधारकों और समुदायों को जोड़ा जा सकता है।

आयुर्वेद में छिपा ज्ञान सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक

संसदीय समिति की आयुष संबंधी सिफारिश इस पूरी बहस को एक और महत्वपूर्ण आयाम देती है। समिति ने आयुष मंत्रालय के साथ मिलकर पांडुलिपियों में दर्ज औषधीय formulations को राष्ट्रीय शब्दावलियों और वैधानिक फार्माकोपिया से जोड़ने वाली concordance बनाने का सुझाव दिया है।

इसका महत्व केवल इतना नहीं है कि पुराने ग्रंथों को डिजिटल कर दिया जाए। असली महत्व तब होगा जब पुराने नामों, औषधीय द्रव्यों और formulations को मानकीकृत संदर्भों से जोड़ा जा सके और शोधकर्ता उन्हें व्यवस्थित रूप से खोज सकें।

लेकिन यहां वैज्ञानिक सावधानी भी जरूरी है। पांडुलिपि में किसी औषधीय नुस्खे का मिलना उसके चिकित्सकीय प्रभाव का प्रमाण नहीं है। दस्तावेजीकरण पहला चरण है; प्रमाणीकरण, औषधीय पहचान, सुरक्षा और प्रभावशीलता का वैज्ञानिक परीक्षण उसके बाद की प्रक्रिया है।

यही अंतर पारंपरिक ज्ञान को अंधविश्वास और आधुनिकता के बीच फंसने से बचा सकता है।

केवल डिजिटल तस्वीरें भी पर्याप्त नहीं

पांडुलिपि का स्कैन बना देना भी अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। समय के साथ डिजिटल फाइलें भी अनुपयोगी हो सकती हैं। फाइल प्रारूप बदलेंगे, सर्वर बदलेंगे और तकनीक बदलती रहेगी।

इसलिए समिति ने वैज्ञानिक इमेजिंग, क्षतिग्रस्त पन्नों को पढ़ने की तकनीक, सामग्री का रिकॉर्ड, वैज्ञानिक डेटिंग और दीर्घकालीन डिजिटल संरक्षण जैसे उपाय सुझाए हैं।

राज्यों को भी इसी दृष्टि से अपनी डिजिटल संरक्षण नीति बनानी होगी—एक से अधिक सुरक्षित प्रतियां, मानकीकृत मेटाडेटा, नियमित माइग्रेशन और दीर्घकालीन अभिलेखीकरण इसकी अनिवार्य शर्तें होनी चाहिए।

सबसे बड़ा काम अभी बाकी है—पढ़ना

भारत में पांडुलिपियों की संख्या लाखों में हो सकती है, लेकिन उनसे निकला ज्ञान उतना ही मूल्यवान होगा जितना हम उसे पढ़ और समझ पाएंगे।

इसके लिए केवल तकनीक नहीं, पांडुलिपिशास्त्र, पुरालिपिशास्त्र, संस्कृत, प्राकृत, पाली, फारसी, अरबी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, उड़िया, मराठी, छत्तीसगढ़ी और अन्य भारतीय भाषाओं तथा स्थानीय लिपियों के विशेषज्ञों की नई पीढ़ी तैयार करनी होगी।

संसदीय समिति का ‘अक्षर मित्र’ जैसे नागरिक मंच और विश्वविद्यालयों के साथ शोध व्यवस्था का सुझाव इसलिए महत्वपूर्ण है।

एआई कठिन या क्षतिग्रस्त पाठ को पढ़ने में मदद कर सकता है, लेकिन अंतिम सत्यापन के लिए विशेषज्ञ मनुष्य की आवश्यकता बनी रहेगी।

परंपरागत ज्ञान का अधिकार किसका?

राज्यों के लिए इससे जुड़ा एक और प्रश्न महत्वपूर्ण है—किसी समुदाय के पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किसकी अनुमति से और किस उद्देश्य से होगा?

दस्तावेजीकरण का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि समुदाय का ज्ञान सार्वजनिक कर दिया जाए और उसके बाद उसका व्यावसायिक उपयोग कोई भी कर सके।

विशेषकर जनजातीय औषधीय ज्ञान, बीज, वनस्पतियों, उपचार पद्धतियों और पारंपरिक शिल्प के मामले में समुदाय की सहमति, श्रेय, लाभ-साझेदारी और बौद्धिक संपदा की सुरक्षा को व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा।

अब ‘कितनी मिलीं’ से आगे बढ़ने का समय

भारत की पांडुलिपि यात्रा अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। पहले सवाल था—क्या हमारे पास इतना पुराना ज्ञान बचा है?

अब सवाल होना चाहिए—हमने उसे कितना सुरक्षित किया, कितना पढ़ा, कितना प्रमाणित किया और कितने लोगों तक पहुंचाया?

राज्य सरकारों को हर साल सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि उनके राज्य में कितनी पांडुलिपियां मिलीं, कितनी सत्यापित हुईं, कितनी डिजिटलीकृत हुईं, कितनी सार्वजनिक हुईं, कितने ग्रंथों का लिप्यंतरण और अनुवाद हुआ तथा किन विषयों पर शोध शुरू हुआ।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के लिए यह और भी जरूरी है। यहां पांडुलिपियों के साथ लोक और जनजातीय समुदायों का मौखिक ज्ञान भी दस्तावेजीकरण की प्रतीक्षा में है।

पारंपरिक ज्ञान को बचाना अतीत की पूजा नहीं, भविष्य के लिए ज्ञान-संपदा तैयार करना है। लेकिन इसके लिए केवल अभियान, ऐप और आंकड़े पर्याप्त नहीं होंगे। केंद्र को राष्ट्रीय ढांचा देना होगा, राज्यों को स्थानीय जिम्मेदारी उठानी होगी और विश्वविद्यालयों तथा समुदायों को इस प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाना होगा।

तभी पांडुलिपि किसी संग्रहालय की बंद अलमारी में रखी पुरानी वस्तु नहीं रहेगी, बल्कि भारत के भविष्य के शोध, शिक्षा, संस्कृति और नवाचार की जीवित ज्ञान-संपदा बन सकेगी।

पाठकों की पसंद

सबसे अधिक पढ़े गए

पिछले 7 दिनों के आधार पर