नागपंचमी पर छत्तीसगढ़ में आस्था का रंग, अखाड़ों से मंदिरों तक गूंजा नाग देवता का जयकारा

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रायपुर, 17 अगस्त 2026।वाय के न्यूज। सावन शुक्ल पंचमी यानी नागपंचमी का पर्व सोमवार को छत्तीसगढ़ में श्रद्धा और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस बार नागपंचमी सावन के तीसरे सोमवार के साथ पड़ने से शिव और नाग आराधना का विशेष संयोग बना है। प्रदेश के गांवों से लेकर शहरों तक नाग देवता की पूजा, शिव मंदिरों में जलाभिषेक, अखाड़ों की परंपराओं और लोक रीति-रिवाजों के बीच पर्व का उल्लास दिखाई दे रहा है।

छत्तीसगढ़ में नागपंचमी केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह पर्व यहां की ग्रामीण और लोक संस्कृति, कृषि जीवन तथा प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की परंपरा से गहराई से जुड़ा है। सावन में खेतों में कृषि कार्य तेज होने के साथ नागपंचमी किसानों के लिए विशेष महत्व रखती है। नागों को खेतों का मित्र मानते हुए उनके प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है और सर्पदंश से परिवार की रक्षा की कामना की जाती है।

छत्तीसगढ़ के अखाड़ों में दिखती है पारंपरिक साधना

प्रदेश के कई हिस्सों में नागपंचमी का संबंध पारंपरिक अखाड़ों और व्यायाम परंपरा से भी रहा है। अखाड़ों में पहलवानों द्वारा व्यायाम, दांव-पेंच और पारंपरिक शारीरिक अभ्यास किए जाते हैं। नागपंचमी का दिन इन अखाड़ों के लिए विशेष अवसर माना जाता है। कई स्थानों पर अखाड़ों की पूजा, गुरु परंपरा का स्मरण और पहलवानों के प्रदर्शन की परंपरा आज भी देखने को मिलती है।

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में अखाड़े केवल कुश्ती के मैदान नहीं रहे हैं, बल्कि वे सामाजिक मेल-जोल, अनुशासन और पारंपरिक शारीरिक संस्कृति के केंद्र भी रहे हैं। नागपंचमी के अवसर पर इनकी गतिविधियां पर्व के सांस्कृतिक पक्ष को सामने लाती हैं।

गांवों में नाग देवता की पूजा और लोक परंपराएं

ग्रामीण अंचलों में नागपंचमी पर घरों और आंगन में नाग-नागिन के प्रतीकात्मक चित्र बनाए जाते हैं। कई परिवार नाग देवता की पूजा कर दूध, लावा, फूल और अन्य पारंपरिक सामग्री अर्पित करते हैं। खेतों में काम करने वाले परिवार इस दिन कृषि भूमि और उसमें रहने वाले जीवों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं।

कई क्षेत्रों में नागपंचमी से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस दिन जमीन खोदने, खेत में अनावश्यक खुदाई करने या जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाने से बचा जाता है। इसके पीछे धार्मिक आस्था के साथ-साथ वर्षा ऋतु में बिलों से बाहर आने वाले जीवों की सुरक्षा का लोक संदेश भी जुड़ा है।

शिवालयों में विशेष पूजा-अर्चना

नागपंचमी और सावन सोमवार के एक साथ पड़ने से प्रदेश के शिव मंदिरों में भी विशेष आयोजन हो रहे हैं। श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक कर बेलपत्र, पुष्प और दूध अर्पित कर रहे हैं। कई मंदिरों में रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र जाप और नाग देवता की पूजा की जा रही है।

छत्तीसगढ़ में भगवान शिव से जुड़े अनेक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां सावन के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। नागपंचमी के अवसर पर शिव और नाग आराधना का यह संबंध और अधिक प्रमुख हो जाता है।

नाग पूजा में छिपा है प्रकृति संरक्षण का संदेश

छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में नागपंचमी का महत्व पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सांप खेतों में चूहों और अन्य जीवों की संख्या नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि ग्रामीण जीवन में उन्हें कृषि व्यवस्था के लिए उपयोगी जीव माना जाता रहा है।

बरसात में सांपों के बिलों में पानी भरने के कारण उनके बाहर निकलने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे समय नागपंचमी लोगों को सर्पों और अन्य जीवों को नुकसान न पहुंचाने तथा सावधानी बरतने का संदेश भी देती है। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार सांपों को दूध पिलाना प्राकृतिक व्यवहार नहीं है; धार्मिक पूजा में प्रतीकात्मक रूप से दूध अर्पित करना अधिक सुरक्षित परंपरा है।

उज्जैन में साल में एक बार नागचंद्रेश्वर के दर्शन

नागपंचमी का राष्ट्रीय धार्मिक महत्व उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर के कारण भी विशेष है। महाकालेश्वर मंदिर परिसर स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट परंपरा के अनुसार नागपंचमी के अवसर पर विशेष रूप से खोले जाते हैं। भगवान शिव और नाग देवता की आराधना के लिए यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

उज्जैन में नागपंचमी के अवसर पर अखाड़ों की पारंपरिक गतिविधियां भी पर्व को विशिष्ट स्वरूप देती हैं। इस बार भी नागपंचमी और सावन सोमवार के संयोग ने धार्मिक वातावरण को और विशेष बना दिया है।

आस्था के साथ परंपरा और प्रकृति का पर्व

छत्तीसगढ़ में नागपंचमी का स्वरूप स्थानीय लोकजीवन से जुड़ा हुआ है। यहां यह पर्व नाग देवता की आराधना, शिव भक्ति, अखाड़ों की परंपरा, कृषि संस्कृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान को एक साथ जोड़ता है। यही वजह है कि आधुनिक समय में भी नागपंचमी केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक-स्मृति और प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध को अभिव्यक्त करने वाला पर्व बनी हुई है।

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