ज्ञानेश्वरी का रजत और बदलता छत्तीसगढ़

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— केवल कृष्ण

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में राजनांदगांव की भारोत्तोलक ज्ञानेश्वरी यादव का रजत पदक छत्तीसगढ़ के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि नहीं है। यह उस बदलाव का संकेत भी है, जो पिछले कुछ वर्षों में राज्य की खेल संस्कृति, खेल अधोसंरचना और प्रतिभा विकास की दिशा में दिखाई देने लगा है। जशपुर के धावक अनिमेष कुजूर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बेहतर होती मौजूदगी इस परिवर्तन की दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी है। इन दोनों खिलाड़ियों ने यह साबित किया है कि छत्तीसगढ़ में प्रतिभा की कमी कभी नहीं थी, आवश्यकता केवल उसे पहचानने, तराशने और अवसर देने की थी।

संघर्ष से सफलता तक

ज्ञानेश्वरी यादव की कहानी उन हजारों खिलाड़ियों का प्रतिनिधित्व करती है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस करते हैं। राजनांदगांव के एक साधारण परिवार से आने वाली ज्ञानेश्वरी के पिता बिजली मिस्त्री (इलेक्ट्रीशियन) हैं। आर्थिक चुनौतियों के बीच परिवार ने उनकी खेल यात्रा को नहीं रुकने दिया। वर्षों की कठिन साधना, अनुशासन और निरंतर प्रदर्शन के बल पर उन्होंने भारतीय टीम में जगह बनाई और कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया।

जशपुर के अनिमेष कुजूर का सफर भी कम प्रेरक नहीं है। आदिवासी अंचल से निकलकर उन्होंने भारतीय एथलेटिक्स में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका प्रदर्शन बताता है कि यदि प्रतिभा को सही प्रशिक्षण और प्रतिस्पर्धा का अवसर मिले, तो दूरस्थ क्षेत्रों से भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार हो सकते हैं।

‘गुदड़ी के लालों’ की धरती

छत्तीसगढ़ के अधिकांश सफल खिलाड़ियों की पृष्ठभूमि साधारण रही है। सीमित आर्थिक संसाधन, प्रशिक्षण सुविधाओं की कमी और बड़े शहरों से दूरी जैसी चुनौतियां उनके शुरुआती जीवन का हिस्सा रही हैं। इसके बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ को ऐसे खिलाड़ियों की धरती कहा जाता है, जो कठिन परिस्थितियों से निकलकर अपनी प्रतिभा के दम पर मुकाम हासिल करते हैं।

खेलो इंडिया और नई संभावनाएं

केंद्र सरकार की खेलो इंडिया पहल ने देशभर की तरह छत्तीसगढ़ में भी खेलों के विकास को नई गति दी है। प्रतिभा खोज, छात्रवृत्ति, प्रशिक्षण, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के प्रशिक्षण तंत्र तक पहुंच ने राज्य के खिलाड़ियों के लिए नए अवसर खोले हैं। इससे ग्रामीण और छोटे शहरों की प्रतिभाओं को भी राष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का अवसर मिला।

राज्य सरकार का बढ़ता फोकस

पिछले दो वर्षों में छत्तीसगढ़ सरकार ने भी खेलों को प्राथमिकता देने की दिशा में कई पहलें की हैं। खेल अधोसंरचना का विस्तार, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की मेजबानी, खिलाड़ियों के लिए प्रोत्साहन योजनाएं और प्रशिक्षण सुविधाओं को बेहतर बनाने के प्रयास लगातार किए गए हैं।

ज्ञानेश्वरी के रजत पदक की खबर ऐसे समय आई, जब राज्य में खेलों को लेकर नीतिगत सक्रियता अपने चरम पर है। पदक जीतने से एक दिन पहले उप मुख्यमंत्री एवं खेल एवं युवा कल्याण मंत्री अरुण साव ने विभागीय समीक्षा बैठक में अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि छत्तीसगढ़ को खेल हब बनाने के लिए नई सोच और विजन के साथ काम किया जाए।

उन्होंने निर्माणाधीन खेल परिसरों, स्टेडियमों और मैदानों का निर्माण तेज करने, खिलाड़ियों की जरूरतों के अनुरूप अधोसंरचना विकसित करने, हर महीने प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने, कम उम्र में प्रतिभाओं की पहचान करने, खेलो इंडिया सेंटर्स का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने तथा प्रशिक्षकों और खेल अधिकारियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप स्वयं को लगातार अपडेट रखने के निर्देश दिए। उन्होंने प्रत्येक जिले में सभी खेलों के संघ गठित करने, स्कूलों में नियमित खेल अवधि सुनिश्चित करने और विभिन्न विभागों द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में प्रतिभा खोज अभियान चलाने पर भी जोर दिया।

ये निर्देश केवल प्रशासनिक आदेश नहीं हैं, बल्कि यह संकेत देते हैं कि राज्य अब खेलों को दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखने लगा है।

बस्तर ओलंपिक: खेलों के जरिए सामाजिक बदलाव

छत्तीसगढ़ की खेल नीति का एक महत्वपूर्ण आयाम बस्तर ओलंपिक भी है। नक्सल हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों के युवाओं को खेलों से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू की गई इस पहल में बड़ी संख्या में युवाओं ने भागीदारी की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में बस्तर ओलंपिक का उल्लेख करते हुए इसकी सराहना की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसे शांति, विश्वास और विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया, जबकि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय लगातार इसे युवाओं को सकारात्मक दिशा देने वाला अभियान बताते रहे हैं।

यह पहल बताती है कि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, आत्मविश्वास और राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ाव का भी सशक्त साधन हो सकते हैं।

अभी चुनौतियां बाकी हैं

इन उपलब्धियों के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं। भारोत्तोलन, एथलेटिक्स, तैराकी, शूटिंग और जिम्नास्टिक जैसे खेलों के लिए अत्याधुनिक प्रशिक्षण केंद्र, खेल विज्ञान, स्पोर्ट्स मेडिसिन, फिजियोथेरेपी, पोषण विशेषज्ञ, खेल मनोविज्ञान और उच्च स्तरीय कोचिंग सुविधाओं का विस्तार आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर सफलता के लिए इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना होगा।

पदक से आगे की सोच

ज्ञानेश्वरी यादव का रजत पदक और अनिमेष कुजूर का प्रदर्शन यह संदेश देता है कि छत्तीसगढ़ में प्रतिभा प्रचुर मात्रा में है। अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस व्यवस्था की है, जो इन प्रतिभाओं को बचपन से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का मार्ग तैयार करे।

खेलों का विकास केवल स्टेडियम बनाने से नहीं होता। इसके लिए स्कूलों में खेल संस्कृति, गांवों में प्रतियोगिताएं, प्रशिक्षित कोच, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, आधुनिक अधोसंरचना और खिलाड़ियों के प्रति सामाजिक सम्मान—इन सभी का एक साथ विकसित होना आवश्यक है।

ज्ञानेश्वरी का रजत पदक इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने छत्तीसगढ़ को यह विश्वास दिलाया है कि राज्य का कोई भी खिलाड़ी, चाहे वह किसी छोटे गांव, आदिवासी अंचल या साधारण परिवार से क्यों न आता हो, विश्व मंच पर तिरंगा बुलंद कर सकता है। अब चुनौती इस विश्वास को एक निरंतर परंपरा में बदलने की है। यदि वर्तमान प्रयास इसी दिशा में आगे बढ़ते रहे, तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ की पहचान केवल खनिज, वन और संस्कृति से ही नहीं, बल्कि उभरती खेल प्रतिभाओं से भी होगी।

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