आत्मनिर्भर भारत की वैचारिक आधारशिला
(वाय के रिसर्च डेस्क)
राष्ट्रवाद की अवधारणा सामान्यतः संस्कृति, इतिहास, भाषा, भूगोल और राजनीतिक संप्रभुता के संदर्भ में समझी जाती है। किंतु इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रों की शक्ति का निर्धारण केवल सैन्य क्षमता या प्राकृतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि उनके वैज्ञानिक ज्ञान, तकनीकी नवाचार, अनुसंधान क्षमता और बौद्धिक संपदा से होता है। इस परिप्रेक्ष्य में “वैज्ञानिक राष्ट्रवाद” (Scientific Nationalism) आधुनिक राष्ट्र-राज्य की एक अनिवार्य अवधारणा बनकर उभरा है। भारत में इस विचार को सबसे प्रभावशाली रूप से मूर्त रूप देने वाले व्यक्तित्वों में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का स्थान अत्यंत विशिष्ट है।
डॉ. कलाम के लिए राष्ट्रप्रेम का अर्थ था—भारत को ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर आत्मनिर्भर तथा वैश्विक नेतृत्व के योग्य बनाना। यही कारण है कि उनके चिंतन में विज्ञान केवल प्रयोगशाला की गतिविधि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति, आर्थिक समृद्धि, सामाजिक परिवर्तन और रणनीतिक स्वायत्तता का माध्यम था।
वैज्ञानिक राष्ट्रवाद का मूल तत्व—आत्मनिर्भता
कलाम का मानना था कि आर्थिक स्वतंत्रता का आधार तकनीकी स्वतंत्रता है। यदि किसी देश के पास अपनी रक्षा तकनीक, अंतरिक्ष क्षमता, ऊर्जा समाधान, डिजिटल अवसंरचना और अनुसंधान संस्थान नहीं हैं, तो उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता भी सीमित हो जाती है।
इसी सोच के कारण उन्होंने स्वदेशी अनुसंधान, प्रौद्योगिकी विकास, रक्षा उत्पादन और नवाचार को राष्ट्रीय प्राथमिकता माना। एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP), स्वदेशी प्रक्षेपण प्रणाली तथा सामरिक प्रौद्योगिकियों का विकास इसी वैज्ञानिक राष्ट्रवाद की व्यावहारिक अभिव्यक्ति थे।
विज्ञान और राष्ट्रीय सुरक्षा
डॉ. कलाम का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने विकास और सुरक्षा के बीच कृत्रिम विभाजन को अस्वीकार किया। उनके अनुसार—
“शांति की रक्षा केवल आदर्शों से नहीं, बल्कि सक्षम वैज्ञानिक और तकनीकी शक्ति से भी होती है।”
पोखरण-2 परमाणु परीक्षण और स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रम ने भारत को रणनीतिक स्वायत्तता प्रदान की। इससे भारत अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन में अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी भूमिका निभाने में सक्षम हुआ। यह वैज्ञानिक राष्ट्रवाद का ऐसा स्वरूप था, जो आक्रमण नहीं बल्कि विश्वसनीय प्रतिरोध (Credible Deterrence) और राष्ट्रीय सुरक्षा पर आधारित था।
ज्ञान अर्थव्यवस्था और विकसित भारत
डॉ. कलाम ने India 2020 में स्पष्ट किया कि भविष्य का वैश्विक नेतृत्व उन देशों के हाथ में होगा जो ज्ञान अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) का निर्माण करेंगे। इसलिए उन्होंने पाँच प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष बल दिया—
– गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
– वैज्ञानिक अनुसंधान
– सूचना प्रौद्योगिकी
– जैव-प्रौद्योगिकी
– उन्नत विनिर्माण (Advanced Manufacturing)
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, क्वांटम प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और हरित ऊर्जा के क्षेत्रों में भारत की बढ़ती उपस्थिति उसी दूरदृष्टि का विस्तार है।
वैज्ञानिक राष्ट्रवाद बनाम तकनीकी राष्ट्रवाद
डॉ. कलाम का वैज्ञानिक राष्ट्रवाद तकनीकी उपलब्धियों के प्रदर्शन तक सीमित नहीं था। वे विज्ञान को मानव विकास का साधन मानते थे। उनके लिए वैज्ञानिक प्रगति तभी सार्थक थी जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। इसी कारण उन्होंने PURA (Providing Urban Amenities in Rural Areas) जैसी अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें ग्रामीण भारत को शिक्षा, संचार, स्वास्थ्य और रोजगार से जोड़ने का प्रयास था।
अतः उनका वैज्ञानिक राष्ट्रवाद समावेशी था—वह प्रयोगशाला से गाँव तक, मिसाइल से माइक्रोचिप तक और रक्षा से विकास तक एक सतत संबंध स्थापित करता है।
समकालीन प्रासंगिकता
आज जब वैश्विक राजनीति तकनीकी प्रतिस्पर्धा, सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के इर्द-गिर्द पुनर्गठित हो रही है, तब डॉ. कलाम का वैज्ञानिक राष्ट्रवाद और अधिक प्रासंगिक हो गया है।
भारत यदि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है, तो उसे केवल आयात-आधारित विकास मॉडल से आगे बढ़कर अनुसंधान-आधारित अर्थव्यवस्था, उच्च शिक्षा में उत्कृष्टता, नवाचार संस्कृति, वैज्ञानिक निवेश और बौद्धिक संपदा निर्माण पर बल देना होगा। यही डॉ. कलाम के वैज्ञानिक राष्ट्रवाद का वास्तविक संदेश है।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने राष्ट्रवाद को विज्ञान की प्रयोगशाला, कक्षा, अनुसंधान संस्थानों और नवाचार केंद्रों से जोड़कर उसकी नई व्याख्या प्रस्तुत की। उनका विश्वास था कि राष्ट्र की सबसे बड़ी सामरिक शक्ति उसकी वैज्ञानिक क्षमता और सबसे बड़ी पूँजी उसके युवा मस्तिष्क हैं। इसलिए उनका वैज्ञानिक राष्ट्रवाद किसी वैचारिक आग्रह का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, ज्ञान, नवाचार और मानवीय विकास पर आधारित राष्ट्र-निर्माण का दर्शन है।
आज भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियाँ, डिजिटल क्रांति, रक्षा आत्मनिर्भरता और उभरती प्रौद्योगिकी क्षमता इस बात का संकेत हैं कि डॉ. कलाम का स्वप्न केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का मार्गदर्शक दस्तावेज़ है। वैज्ञानिक राष्ट्रवाद की यही अवधारणा भारत को वैश्विक शक्ति बनाने के साथ-साथ ज्ञान-आधारित, समावेशी और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में स्थापित कर सकती है।
