मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 6 अगस्त 2026 को विकसित भारत–रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) – वीबी-जी राम जी के अंतर्गत राज्यव्यापी “मेरी बेटी–मेरा अभिमान” अभियान का शुभारंभ करते हुए एक ऐसी घोषणा की है, जिसका महत्व केवल निर्माण कार्य तक सीमित नहीं है। राज्य सरकार ने 15 अगस्त 2026 से 26 जनवरी 2027 तक ग्रामीण क्षेत्रों के शासकीय विद्यालयों में 286.85 करोड़ रुपये की लागत से 6,671 बालिका शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य रखा है। प्रत्येक शौचालय पर लगभग 4.30 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे। पहली दृष्टि में यह आधारभूत ढांचे का विस्तार प्रतीत होता है, लेकिन यदि इसे शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास के व्यापक संदर्भ में देखें तो यह छत्तीसगढ़ के सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन सकता है।

किसी भी समाज की प्रगति का सबसे बड़ा पैमाना उसकी बेटियों की शिक्षा होती है। संयुक्त राष्ट्र ने भी सतत विकास लक्ष्य (SDG-4) के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और SDG-5 के माध्यम से लैंगिक समानता को वैश्विक विकास का आधार माना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ लगातार इस बात पर बल देते रहे हैं कि विद्यालयों में सुरक्षित पेयजल, स्वच्छ शौचालय और मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार और लैंगिक न्याय का भी प्रश्न है। जिन देशों ने विद्यालयी स्वच्छता पर निवेश किया, वहां बालिकाओं की उपस्थिति, माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच और विद्यालय में बने रहने की दर में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। इसलिए दुनिया भर में अब स्कूलों में शौचालय को “इन्फ्रास्ट्रक्चर” नहीं, बल्कि “शैक्षिक निवेश” माना जाता है।
भारत ने भी पिछले एक दशक में विद्यालयी स्वच्छता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। शिक्षा मंत्रालय के यू-डाइस प्लस (UDISE+) 2025-26 के अनुसार देश के 98.5 प्रतिशत विद्यालयों में बालिकाओं के लिए अलग शौचालय, 99.5 प्रतिशत विद्यालयों में पेयजल तथा 96.9 प्रतिशत विद्यालयों में हाथ धोने की सुविधा उपलब्ध है। यह स्थिति वर्ष 2014 की तुलना में कहीं बेहतर है। लेकिन राष्ट्रीय उपलब्धि के पीछे एक चुनौती अभी भी छिपी हुई है—शौचालयों का नियमित उपयोग, रखरखाव और जलापूर्ति। कई राज्यों में भवन तो बन गए, पर वे कुछ वर्षों में अनुपयोगी हो गए। यही कारण है कि आज नीति-निर्माताओं का ध्यान “निर्माण” से आगे बढ़कर “कार्यशीलता” पर है।
छत्तीसगढ़ की कहानी भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। यू-डाइस प्लस के अनुसार राज्य में अधिकांश विद्यालयों में बालिकाओं के लिए अलग शौचालय उपलब्ध हैं, लेकिन सभी शौचालय कार्यशील नहीं हैं। कई विद्यालयों में पानी की उपलब्धता, नियमित सफाई और रखरखाव जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। ऐसे में 6,671 नए शौचालयों की घोषणा का महत्व केवल संख्या में नहीं, बल्कि इस बात में है कि क्या इससे राज्य के प्रत्येक ग्रामीण विद्यालय में वास्तव में उपयोगी और सम्मानजनक सुविधा उपलब्ध हो सकेगी।
छत्तीसगढ़ में बालिका शिक्षा की यह यात्रा आज शुरू नहीं हुई है। राज्य गठन के बाद से लगातार ऐसी योजनाएं लागू की गईं, जिन्होंने लाखों बेटियों का जीवन बदला। सरस्वती साइकिल योजना ने पहली बार दूरस्थ गांवों की छात्राओं को माध्यमिक विद्यालय तक पहुंचने का साधन दिया। उस समय हजारों बालिकाएं केवल इसलिए पढ़ाई छोड़ देती थीं क्योंकि विद्यालय कई किलोमीटर दूर था। साइकिल ने दूरी कम की और शिक्षा को गति दी। बाद में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों ने अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक और अन्य वंचित वर्गों की छात्राओं को आवासीय शिक्षा का अवसर दिया। छात्रावासों का विस्तार हुआ, निःशुल्क पाठ्यपुस्तक और गणवेश मिले, छात्रवृत्ति योजनाएं बढ़ीं, मध्याह्न भोजन ने गरीब परिवारों का बोझ कम किया और हाल के वर्षों में स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालयों ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की नई उम्मीद जगाई।
इसी दौरान विद्यालयों में सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन, इन्सिनरेटर और किशोरियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता संबंधी जागरूकता कार्यक्रम भी शुरू हुए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी स्पष्ट किया कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि सुरक्षित और समावेशी वातावरण का निर्माण है। इस दृष्टि से “मेरी बेटी–मेरा अभिमान” अभियान पिछले दो दशकों के प्रयासों की स्वाभाविक अगली कड़ी है।
इन योजनाओं का प्रभाव परिणामों में भी दिखाई देता है। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की परीक्षाओं में पिछले कई वर्षों से बालिकाएं लगातार बालकों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि अवसर मिलने पर प्रतिभा किसी लिंग की मोहताज नहीं होती। समस्या क्षमता की नहीं, बल्कि अवसर और सुविधाओं की होती है।
लेकिन इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बस्तर है। कभी नक्सली हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित रहे दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर और कांकेर जैसे जिलों में शिक्षा सबसे बड़ी चुनौती रही। कई विद्यालय वर्षों तक बंद रहे, शिक्षक नहीं पहुंच सके, छात्रावास प्रभावित हुए और सबसे अधिक नुकसान बालिकाओं की शिक्षा को हुआ। सुरक्षा कारणों से अनेक परिवार किशोरियों को दूर स्थित विद्यालयों में भेजने से हिचकते थे।
आज परिस्थितियां बदल रही हैं। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, सड़क, मोबाइल नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासन की बढ़ती पहुंच ने अनेक क्षेत्रों में सामान्य जीवन को गति दी है। यदि यह सकारात्मक वातावरण स्थायी बनता है, तो छत्तीसगढ़ के सामने एक ऐतिहासिक अवसर होगा। अब विकास की सबसे बड़ी लड़ाई बंदूक से नहीं, बल्कि किताब से जीती जाएगी। जिन गांवों में कभी हिंसा का भय था, वहां यदि आधुनिक विद्यालय, छात्रावास, विज्ञान प्रयोगशालाएं, खेल परिसर और सुरक्षित बालिका शौचालय बनते हैं, तो यह केवल आधारभूत ढांचे का विकास नहीं होगा; यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत होगी।
योजना की चुनौतियां, वैश्विक अनुभव और आगे की राह
हालांकि, किसी भी सार्वजनिक नीति की सफलता उसकी घोषणा या बजट से नहीं, बल्कि उसके धरातल पर दिखने वाले परिणामों से मापी जाती है। 6,671 शौचालयों का निर्माण अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि क्या वे वर्षों तक कार्यशील रहेंगे। भारत में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की विभिन्न रिपोर्टों, संसदीय समितियों और राज्यों के अनुभवों से यह सामने आया है कि अनेक स्थानों पर शौचालय तो बन गए, लेकिन पानी, नियमित सफाई, रखरखाव और निगरानी के अभाव में वे कुछ ही वर्षों में अनुपयोगी हो गए। इसलिए इस अभियान की सबसे बड़ी परीक्षा निर्माण नहीं, बल्कि रखरखाव होगी।
विश्व स्तर पर भी यही अनुभव सामने आया है। यूनिसेफ और यूनेस्को की विद्यालयी जल, स्वच्छता एवं स्वच्छ व्यवहार (WASH in Schools) संबंधी रिपोर्टें बताती हैं कि जिन देशों ने केवल शौचालय बनाए, वहां अपेक्षित परिणाम सीमित रहे। जबकि जहां शौचालयों के साथ स्वच्छ पेयजल, हाथ धोने की व्यवस्था, मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन, स्वास्थ्य शिक्षा और सामुदायिक निगरानी को जोड़ा गया, वहां बालिकाओं की उपस्थिति, विद्यालय में निरंतरता और सीखने के परिणामों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। यही कारण है कि आज दुनिया भर में “स्कूल टॉयलेट” को शिक्षा नीति का अभिन्न हिस्सा माना जाता है, न कि केवल लोक निर्माण विभाग का कार्य।
दक्षिण एशिया में बांग्लादेश का उदाहरण उल्लेखनीय है। वहां विद्यालयों में अलग शौचालय, किशोरियों के लिए स्वच्छता सुविधाएं और समुदाय आधारित निगरानी व्यवस्था लागू होने के बाद माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं की उपस्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। रवांडा और केन्या ने भी विद्यालयी स्वच्छता को बालिका शिक्षा और महिला सशक्तिकरण से जोड़ते हुए सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए। भारत के भीतर केरल, तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने विद्यालयों में स्वच्छता और रखरखाव की बेहतर व्यवस्था विकसित कर यह दिखाया है कि अच्छी नीति तभी सफल होती है, जब उसके संचालन की व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत हो।
छत्तीसगढ़ के सामने भी यही चुनौती है। यदि 286.85 करोड़ रुपये की इस परियोजना को स्थायी सफलता बनाना है, तो प्रत्येक विद्यालय में नियमित जलापूर्ति, सफाईकर्मी की व्यवस्था, रखरखाव के लिए वार्षिक बजट, विद्यालय प्रबंधन समितियों की जवाबदेही और सामाजिक अंकेक्षण की व्यवस्था भी विकसित करनी होगी। केवल निर्माण कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक शौचालय दिव्यांग-अनुकूल हो, पर्याप्त रोशनी और सुरक्षा हो तथा किशोरियों की आवश्यकताओं के अनुरूप सुविधाएं उपलब्ध हों।
इस अभियान का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—व्यवहार परिवर्तन। केवल भवन बनने से स्वच्छता की संस्कृति विकसित नहीं होती। विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा, किशोरी समूह, अभिभावक बैठकों और महिला स्व-सहायता समूहों की भागीदारी बढ़ानी होगी। यदि छात्राएं स्वयं इस व्यवस्था की भागीदार बनेंगी, तभी यह अभियान स्थायी सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनेगा।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के संदर्भ में यह पहल और भी अधिक महत्व रखती है। वर्षों तक जिन इलाकों में विकास की पहचान सुरक्षा शिविरों और पुलिस चौकियों से होती थी, वहां अब शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास की पहचान बननी चाहिए। यदि बस्तर के किसी दूरस्थ गांव की बेटी आधुनिक विद्यालय में विज्ञान पढ़े, डिजिटल लैब में कंप्यूटर सीखे, खेल मैदान में अभ्यास करे और सम्मानजनक सुविधाओं के साथ शिक्षा पूरी करे, तो यह केवल एक छात्रा की सफलता नहीं होगी; यह लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। नक्सली हिंसा में आई कमी के बाद छत्तीसगढ़ के पास यही अवसर है कि वह “सुरक्षा से समृद्धि” और “समृद्धि से शिक्षा” की नई विकास यात्रा लिखे।
यह भी याद रखना होगा कि शिक्षा में निवेश का प्रतिफल तत्काल नहीं मिलता। एक शौचालय का लाभ अगले चुनाव में नहीं, बल्कि अगले दशक में दिखाई देता है, जब वही छात्रा उच्च शिक्षा प्राप्त कर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी या उद्यमी बनती है। इसलिए शिक्षा और स्वच्छता पर होने वाला व्यय खर्च नहीं, बल्कि सामाजिक पूंजी में निवेश है।
“मेरी बेटी–मेरा अभिमान” अभियान का नाम अपने आप में एक संदेश है। लेकिन किसी भी अभियान का वास्तविक मूल्य उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से तय होता है। यदि 6,671 शौचालय केवल सरकारी आंकड़ों का हिस्सा बनकर रह गए, तो यह अवसर भी अनेक योजनाओं की तरह इतिहास में दर्ज हो जाएगा। लेकिन यदि प्रत्येक शौचालय कार्यशील रहा, प्रत्येक विद्यालय में पानी और स्वच्छता सुनिश्चित हुई, प्रत्येक किशोरी सम्मान के साथ विद्यालय पहुंची और प्रत्येक अभिभावक ने अपनी बेटी की शिक्षा पर भरोसा किया, तो यह अभियान छत्तीसगढ़ की सामाजिक संरचना को बदलने वाला मील का पत्थर सिद्ध होगा।
विकसित छत्तीसगढ़ का रास्ता केवल उद्योगों, निवेश और राजमार्गों से होकर नहीं गुजरता। वह गांव के उस छोटे से विद्यालय से भी होकर गुजरता है, जहां एक बेटी बिना किसी संकोच के कक्षा में बैठती है, सपने देखती है और उन्हें पूरा करने का आत्मविश्वास हासिल करती है। इसलिए 6,671 शौचालयों का निर्माण केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि 6,671 नए अवसरों, 6,671 नई उम्मीदों और लाखों बेटियों के सम्मान में किया गया निवेश है। यदि सरकार इस अभियान को पारदर्शिता, गुणवत्ता और जनभागीदारी के साथ लागू करती है, तो आने वाले वर्षों में यह निर्णय छत्तीसगढ़ की सबसे दूरगामी सामाजिक पहलों में गिना जाएगा।
