नई दिल्ली, 22 अगस्त। वाय के न्यूज। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि व्यक्तित्व अधिकारों का इस्तेमाल इतना व्यापक नहीं हो सकता कि उससे किसी व्यक्ति से जुड़े गलत कामों की जानकारी सार्वजनिक करने या व्यंग्य, पैरोडी और कार्टून जैसी अभिव्यक्तियों पर रोक लग जाए। अदालत ने कहा कि खासकर ऐसी अभिव्यक्ति को केवल व्यक्तित्व अधिकारों के आधार पर नहीं रोका जा सकता, जो किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व या प्रचार अधिकारों का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं करती।
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने यह टिप्पणी फिजिक्स वाला के संस्थापक और शिक्षक अलख पांडे की ओर से दायर मुकदमे की सुनवाई के दौरान की। पांडे ने विभिन्न ऑनलाइन मंचों पर अपने व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों के कथित उल्लंघन का आरोप लगाया था।
अदालत ने कहा कि व्यक्तित्व अधिकारों का दावा जरूरत से ज्यादा व्यापक होने पर उसके गलत इस्तेमाल की आशंका रहती है। उसने अपने पूर्व के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इन अधिकारों का इस्तेमाल व्यंग्य, पैरोडी या कार्टून जैसी अभिव्यक्ति की पूरी विधा को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।
अलख पांडे को इन मामलों में अंतरिम सुरक्षा
हाईकोर्ट ने हालांकि अलख पांडे को अंतरिम राहत देने से पूरी तरह इनकार नहीं किया। अदालत ने तीन तरह की सामग्री के संबंध में प्रथम दृष्टया उनका मामला सही पाया।
इनमें उन्हें यौन रूप से अश्लील तरीके से पेश करने वाली सामग्री, बिना अनुमति उनके व्यक्तित्व का इस्तेमाल कर आर्थिक लाभ कमाने वाली सामग्री और उनकी पहचान की नकल कर उन्हें किसी अन्य व्यक्ति के रूप में पेश करने वाली सामग्री शामिल है।
इन श्रेणियों के संबंध में अदालत ने कुछ प्रतिवादियों के खिलाफ एकतरफा अंतरिम रोक का आदेश दिया। मध्यस्थ मंचों को कुछ आपत्तिजनक ऑनलाइन लिंक हटाने और संबंधित खातों तथा सामग्री के पीछे मौजूद लोगों की आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट सेवा प्रदाता या डोमेन नाम पंजीयक केवल किसी पक्ष के कहने पर वेबसाइट बंद करने का फैसला नहीं कर सकते। उनकी भूमिका तकनीकी जांच तक सीमित रहेगी और अदालत के आदेश के अनुरूप ही कार्रवाई की जाएगी।
इस आदेश का व्यापक अर्थ यह है कि किसी सार्वजनिक व्यक्ति के व्यक्तित्व अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है। अदालत ने व्यक्तित्व अधिकारों की सुरक्षा को स्वीकार करते हुए व्यंग्य, पैरोडी और आलोचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए उपलब्ध क्षेत्र को भी सुरक्षित रखने पर जोर दिया है।
